October 29, 2026 12:29 AM

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ICAR-IARI पहुंचे प्रिंस एलोइस, कृषि तकनीक पर चर्चा!

लिकटेंस्टाइन के प्रिंस एलोइस ने किया ICAR-IARI का दौरा, भारत-लिकटेंस्टाइन के बीच कृषि अनुसंधान सहयोग बढ़ाने पर जोर!

नई दिल्ली। 28 अक्टूबर- कृषि अनुसंधान, आधुनिक तकनीक और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों के क्षेत्र में भारत और लिकटेंस्टाइन के बीच सहयोग की संभावनाओं को तलाशने के लिए लिकटेंस्टाइन के हेरिडिटरी प्रिंस एलोइस ने 28 अक्टूबर 2026 को भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-IARI), नई दिल्ली का दौरा किया। इस दौरान जलवायु-अनुकूल खेती, पोषण सुरक्षा, उन्नत फसल प्रजनन, जैव-संवर्धित फसलों और कृषि में निवेश एवं तकनीकी नवाचार जैसे विषयों पर चर्चा हुई।

दौरे का उद्देश्य दोनों देशों के बीच वैज्ञानिक आदान-प्रदान को बढ़ावा देना, संयुक्त अनुसंधान की संभावनाओं को तलाशना और कृषि क्षेत्र में संस्थागत साझेदारी को मजबूत करना था। प्रिंस एलोइस के साथ लिकटेंस्टाइन की उपप्रधानमंत्री एवं विदेश, पर्यावरण और संस्कृति मंत्री सबीन मोनाउनी, विदेश मामलों के कार्यालय के निदेशक मार्टिन फ्रिक, राजनयिक अधिकारी एंड्रियास फोसर तथा सवाना सीड्स के प्रतिनिधि भी मौजूद रहे।

ICAR ने कृषि अनुसंधान और नवाचार की भूमिका को रेखांकित किया

प्रतिनिधिमंडल का स्वागत कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट, ICAR के उपमहानिदेशक डॉ. डी.के. यादव तथा ICAR-IARI के निदेशक डॉ. च. श्रीनिवास राव ने किया।

डॉ. एम.एल. जाट ने प्रतिनिधिमंडल को ICAR के व्यापक कृषि अनुसंधान नेटवर्क और देश के कृषि विकास में उसके योगदान की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि भारत ने खाद्यान्न की कमी वाले देश से खाद्यान्न अधिशेष वाले देश तक का सफर वैज्ञानिक अनुसंधान, प्रभावी नीतियों और विभिन्न हितधारकों के सहयोग से तय किया है।

उन्होंने कृषि को केवल उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय उसे मूल्य शृंखला, पोषण, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय स्थिरता से जोड़ने की आवश्यकता पर जोर दिया। उनके अनुसार, कृषि क्षेत्र में नवाचार को तेजी से किसानों तक पहुंचाने और तकनीकों के व्यावसायीकरण के लिए उद्योगों तथा सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSME) की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

जलवायु-अनुकूल खेती और पोषण सुरक्षा पर चर्चा

बैठक में बदलती जलवायु के बीच कृषि उत्पादन को स्थिर बनाए रखने, प्राकृतिक संसाधनों के टिकाऊ उपयोग और फसलों की गुणवत्ता सुधारने पर विशेष ध्यान दिया गया। चर्चा में ऐसी कृषि तकनीकों की जरूरत रेखांकित की गई, जो उत्पादन बढ़ाने के साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को भी कम कर सकें।

पोषण सुरक्षा के संदर्भ में जैव-संवर्धन (बायोफोर्टिफिकेशन) को महत्वपूर्ण विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसके तहत गेहूं जैसी प्रमुख खाद्य फसलों में जिंक और आयरन जैसे आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाने पर जोर दिया गया। ऐसी फसलें खाद्यान्न उत्पादन के साथ लोगों के पोषण स्तर में सुधार लाने में भी योगदान दे सकती हैं।

इसके अतिरिक्त, जीन एडिटिंग और आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी के उपयोग से अधिक उत्पादक, रोगों एवं प्रतिकूल जलवायु परिस्थितियों के प्रति सहनशील और संसाधनों का कुशल उपयोग करने वाली फसल किस्में विकसित करने की संभावनाओं पर भी विचार किया गया।

हरित क्रांति से आधुनिक कृषि तकनीक तक IARI का योगदान

ICAR-IARI के निदेशक डॉ. च. श्रीनिवास राव ने संस्थान की ऐतिहासिक उपलब्धियों और भारत की हरित क्रांति में उसके योगदान की जानकारी दी। उन्होंने कृषि उत्पादकता बढ़ाने और देश की पोषण सुरक्षा मजबूत करने में संस्थान की निरंतर भूमिका को रेखांकित किया।

ICAR के उपमहानिदेशक डॉ. डी.के. यादव ने फसल विज्ञान प्रभाग की उपलब्धियों पर प्रकाश डालते हुए जलवायु-अनुकूल, जैव-संवर्धित और कम कृषि-इनपुट की जरूरत वाली फसल किस्मों के विकास एवं व्यावसायीकरण की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि कृषि की भावी रणनीति में उत्पादकता बढ़ाने के साथ उर्वरकों, पानी और अन्य संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग तथा पर्यावरण संरक्षण को भी प्राथमिकता देनी होगी।

जेनेटिक्स डिवीजन में वैज्ञानिकों से किया संवाद

लिकटेंस्टाइन के प्रतिनिधिमंडल ने ICAR-IARI के जेनेटिक्स डिवीजन का दौरा किया। यहां वैज्ञानिकों ने संस्थान द्वारा विकसित विभिन्न फसल किस्मों की जानकारी दी। इस संवाद के दौरान उभरती कृषि तकनीकों और उनके संभावित उपयोगों पर विचारों का आदान-प्रदान हुआ।

प्रतिनिधिमंडल ने IARI एलुमनी एसोसिएशन का भी दौरा किया, जहां सदस्यों ने संस्थान के पूर्व विद्यार्थियों और कृषि विज्ञान से जुड़े समुदाय के साथ संवाद किया। इस अवसर पर प्रिंस एलोइस ने IARI एलुमनी परिसर में पौधारोपण भी किया। यह पहल पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास के महत्व को रेखांकित करती है।

धान की खेती में विदेशी निवेश और तकनीक के प्रभाव पर रिपोर्ट जारी

दौरे के दौरान प्रिंस एलोइस ने IARI एलुमनी एसोसिएशन कार्यालय में “FDI, Innovation and Technology in Rice Cultivation: The Case of Savannah Seeds” शीर्षक वाली सामाजिक-आर्थिक प्रभाव अध्ययन रिपोर्ट का अनावरण किया।

भारतीय अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंध अनुसंधान परिषद (ICRIER) के अर्थशास्त्री डॉ. अशोक गुलाटी ने अध्ययन के प्रमुख निष्कर्ष प्रस्तुत किए। रिपोर्ट में धान की खेती के संदर्भ में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI), तकनीकी नवाचार और आधुनिक तकनीकों के सामाजिक-आर्थिक पहलुओं पर प्रकाश डाला गया।

इस अध्ययन का विषय कृषि में निवेश और तकनीकी बदलावों के प्रभाव को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। कृषि क्षेत्र में पूंजी, अनुसंधान और तकनीकी नवाचार का प्रभाव किसानों, उत्पादन प्रणालियों तथा कृषि मूल्य शृंखला पर किस तरह पड़ता है, यह भविष्य की कृषि नीतियों और निवेश रणनीतियों के लिए उपयोगी विषय है।

भारत-लिकटेंस्टाइन कृषि सहयोग की नई संभावनाएं

इस दौरे से दोनों देशों के बीच कृषि अनुसंधान, वैज्ञानिक ज्ञान के आदान-प्रदान और संस्थागत साझेदारी को आगे बढ़ाने की संभावनाएं सामने आईं। जलवायु परिवर्तन, पोषण सुरक्षा और संसाधनों पर बढ़ते दबाव के बीच ऐसी साझेदारियां कृषि क्षेत्र को अधिक सक्षम और टिकाऊ बनाने में योगदान दे सकती हैं।

भारत के व्यापक कृषि अनुसंधान तंत्र और लिकटेंस्टाइन से जुड़े प्रतिनिधिमंडल के बीच संवाद से फसल सुधार, आधुनिक जैव-प्रौद्योगिकी, कृषि निवेश और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों जैसे क्षेत्रों में सहयोग के नए रास्ते तलाशने का अवसर मिला।

कृषि क्षेत्र के लिए प्रमुख संदेश: भविष्य की खेती में केवल अधिक उत्पादन पर्याप्त नहीं होगा। ऐसी तकनीकों, फसल किस्मों और निवेश मॉडलों की जरूरत होगी, जो किसानों की उत्पादकता और आर्थिक संभावनाओं को बेहतर बनाने के साथ पोषण सुरक्षा तथा पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूत करें।