September 22, 2026 12:41 AM

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पश्चिम बंगाल में मत्स्य पालन और जलीय कृषि को नई दिशा देने की तैयारी!

पश्चिम बंगाल में मत्स्य पालन को नई रफ्तार, 6 जलाशयों के विकास को ₹49.95 करोड़!

कोलकाता, 21 सितंबर 2026। पश्चिम बंगाल में मत्स्य पालन और जलीय कृषि की विशाल संभावनाओं को उत्पादन, उत्पादकता, निर्यात और मछुआरों की आय से जोड़ने के लिए केंद्र और राज्य सरकार ने विकास की नई रूपरेखा पर मंथन किया। मत्स्य पालन विभाग, भारत सरकार की ओर से कोलकाता में आयोजित उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक में जलाशय मत्स्य पालन, समुद्री मत्स्य पालन, झींगा एवं केकड़ा पालन, कोल्ड-चेन, मछली बंदरगाह, डिजिटल पंजीकरण और निर्यात ढांचे को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया।

बैठक की सह-अध्यक्षता केंद्रीय मत्स्य पालन, पशुपालन एवं डेयरी तथा पंचायती राज मंत्री राजीव रंजन सिंह और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने की। एक दशक से अधिक समय बाद आयोजित इस उच्चस्तरीय समीक्षा बैठक का उद्देश्य राज्य की अब तक कम उपयोग हुई मत्स्य क्षमता को सामने लाकर उसे आधुनिक जलीय कृषि, बेहतर बुनियादी ढांचे और बाजार से जोड़ना रहा।

6 जलाशयों के विकास के लिए ₹83.25 करोड़ की परियोजना

बैठक में पश्चिम बंगाल के 6 जलाशयों के विकास के लिए ₹83.25 करोड़ की लागत वाली परियोजना को प्रशासनिक स्वीकृति दी गई। इसमें ₹49.95 करोड़ केंद्रीय हिस्सेदारी होगी। जलाशय मत्स्य पालन का विस्तार राज्य के उन क्षेत्रों में मछली उत्पादन बढ़ाने का माध्यम बन सकता है, जहां पारंपरिक कृषि के साथ मत्स्य पालन को एक अतिरिक्त आय स्रोत के रूप में विकसित किया जा सकता है।

₹5,000 करोड़ के निर्यात को ₹15,000–20,000 करोड़ तक बढ़ाने की संभावना

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि पश्चिम बंगाल देश का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक राज्य है, लेकिन उत्पादकता, जलीय कृषि, मूल्य संवर्धन और निर्यात के क्षेत्र में अभी काफी संभावनाएं मौजूद हैं। राज्य से वर्तमान में लगभग ₹5,000 करोड़ के मत्स्य उत्पादों का निर्यात हो रहा है। जलीय कृषि और निर्यात आधारित बुनियादी ढांचे के विस्तार से इसे ₹15,000–20,000 करोड़ तक ले जाने की क्षमता बताई गई।

विशेष रूप से सुंदरबन को उच्च मूल्य वाली मत्स्य प्रजातियों और निर्यात केंद्र के रूप में विकसित करने पर जोर दिया गया। ब्लैक टाइगर झींगा, मड क्रैब, हिल्सा और सजावटी मछलियां ऐसे क्षेत्र हैं, जिनमें बेहतर उत्पादन तकनीक, गुणवत्ता नियंत्रण, प्रसंस्करण और बाजार संपर्क से किसानों और मछुआरों को अधिक मूल्य मिल सकता है।

एक दशक में देश का मछली उत्पादन लगभग दोगुना

बैठक में देश के मत्स्य क्षेत्र में हुई वृद्धि का भी उल्लेख किया गया। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार भारत का मछली उत्पादन 2014 में 95.7 लाख टन से बढ़कर 197.75 लाख टन हो गया है। इसी अवधि में मत्स्य निर्यात बढ़कर ₹73,890 करोड़ पहुंच गया।

आने वाले समय में पीएमएमएसवाई 2.0 के माध्यम से गुणवत्तापूर्ण मत्स्य बीज, चारा, रोग प्रबंधन, कोल्ड-चेन, मछली पकड़ने के बंदरगाह, लैंडिंग सेंटर और गहरे समुद्र में मछली पकड़ने की क्षमता को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया गया।

सुंदरबन और तटीय जिलों पर विशेष फोकस

मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने उत्तर 24 परगना, दक्षिण 24 परगना और सुंदरबन में मत्स्य पालन की संभावनाओं को रेखांकित किया। उन्होंने पीएमएमएसवाई, राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल मंच और पीएम-एमकेएसएसवाई जैसी पहलों के प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर दिया।

गहरे समुद्र में जाने वाले मछुआरों की सुरक्षा के लिए संचार प्रणाली, वायरलेस कनेक्टिविटी, नियंत्रण कक्ष और आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र को मजबूत करने की आवश्यकता भी सामने रखी गई। इसके साथ ही मछली पकड़ने के बंदरगाहों, कोल्ड-चेन, आपूर्ति श्रृंखला और तटीय गांवों के बुनियादी ढांचे में सुधार की जरूरत बताई गई।

2025-26 में 25.43 लाख टन मछली उत्पादन

पश्चिम बंगाल के मत्स्य पालन एवं पशु संसाधन विकास विभाग के प्रभारी मंत्री राजेश महता ने बताया कि राज्य ने 2025-26 में 25.43 लाख मीट्रिक टन मछली उत्पादन दर्ज किया है। राज्य देश के प्रमुख मछली बीज उत्पादक क्षेत्रों में भी शामिल है।

उन्होंने बेहतर बीज, गुणवत्तापूर्ण चारा, फार्म प्रबंधन और रोग नियंत्रण के जरिए उत्पादकता बढ़ाने पर जोर दिया। निर्यात बढ़ाने के लिए ट्रेसबिलिटी, नियामकीय अनुपालन, कोल्ड-चेन, मूल्य संवर्धन और बाजार संपर्क को मजबूत करना महत्वपूर्ण बताया गया।

पीएमएमएसवाई के तहत राज्य में ₹102.23 करोड़ केंद्रीय हिस्से और ₹66.48 करोड़ राज्य हिस्से की मत्स्य गतिविधियां जुटाई गई हैं।

32 लाख लोगों की आजीविका से जुड़ा क्षेत्र

पश्चिम बंगाल के मत्स्य पालन विभाग के सचिव शुभांजन दास के अनुसार, राज्य में मत्स्य पालन क्षेत्र लगभग 32 लाख लोगों की आजीविका से जुड़ा है। फ्रेजरगंज, काकद्वीप, शंकरपुर और पेटुआघाट जैसे मछली पकड़ने के बंदरगाहों के उन्नयन से संबंधित परियोजनाओं में तेजी लाने की जानकारी भी दी गई।

राज्य ने बायोफ्लॉक, केज कल्चर और सॉफ्ट-शेल क्रैब फार्मिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को बढ़ावा देने, बांकुड़ा और पुरुलिया में जलाशय मत्स्य पालन विकसित करने तथा राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल मंच पर मछुआरों का पंजीकरण बढ़ाने की दिशा में भी अपनी प्राथमिकताएं रखीं।

वैज्ञानिक संस्थानों की विशेषज्ञता से बढ़ेगा उत्पादन

बैठक में ICAR-CIFA, ICAR-CIBA, ICAR-CMFRI, ICAR-CIFRI, केंद्रीय शीतजल मत्स्य अनुसंधान संस्थान और ICAR-NBFGR सहित विभिन्न संस्थानों ने तकनीकी सहयोग की संभावनाएं प्रस्तुत कीं।

वैज्ञानिक संस्थानों ने मड क्रैब, सीबास, ब्लैक टाइगर झींगा, केज कल्चर, समुद्री शैवाल, समुद्री कृषि और सजावटी मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में विविधीकरण पर जोर दिया। दार्जिलिंग और कलिम्पोंग में रेनबो ट्राउट पालन की संभावनाओं को भी रेखांकित किया गया।

इसके अलावा गुणवत्तापूर्ण ब्रूडस्टॉक, हैचरी प्रमाणन, आनुवंशिक संसाधनों का संरक्षण, जैव सुरक्षा, रोग निगरानी और मछली बीज की गुणवत्ता सुधारने को उत्पादन बढ़ाने की आधारभूत जरूरत बताया गया।

किसानों और मछुआरों के लिए क्या मायने?

पश्चिम बंगाल में मत्स्य क्षेत्र के विस्तार का सीधा असर छोटे मछली किसानों, मछुआरों, हैचरी संचालकों, झींगा एवं केकड़ा पालकों, प्रसंस्करण इकाइयों और ग्रामीण युवाओं पर पड़ सकता है। उत्पादन से आगे बढ़कर प्रसंस्करण, कोल्ड-चेन, ब्रांडिंग और निर्यात पर जोर देने से प्रति किलोग्राम उत्पाद का बेहतर मूल्य हासिल करने की संभावना बनती है।

विशेष रूप से जलाशय मत्स्य पालन और आधुनिक जलीय कृषि तकनीकों को छोटे किसानों तक पहुंचाने से कम उपयोग हो रहे जल संसाधनों को अतिरिक्त ग्रामीण आय के स्रोत में बदला जा सकता है।

आगे की रणनीति

बैठक में केंद्र और राज्य के बीच बेहतर समन्वय, परियोजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन, वैज्ञानिक संस्थानों की तकनीकी मदद, डिजिटल पंजीकरण, आधुनिक मत्स्य तकनीकों का विस्तार और निर्यात गुणवत्ता मानकों के पालन को आगे की रणनीति का हिस्सा बनाया गया।

कुल मिलाकर, पश्चिम बंगाल के लिए रणनीति अब केवल मछली उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं, बल्कि उत्पादन से प्रसंस्करण और प्रसंस्करण से निर्यात तक पूरी वैल्यू चेन विकसित करने की दिशा में दिखाई देती है। सुंदरबन और तटीय क्षेत्रों की विशिष्ट परिस्थितियों के साथ जलाशय मत्स्य पालन, आधुनिक जलीय कृषि और उच्च मूल्य वाली प्रजातियों पर फोकस राज्य के मत्स्य क्षेत्र को नई आर्थिक संभावनाओं से जोड़ सकता है।