September 18, 2026 3:04 PM

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कार्बन बचाया, किसानों ने कमाया: 2,550 किसानों को मिला भुगतान!

कार्बन क्रेडिट से किसानों की बढ़ी आय: पंजाब-हरियाणा के 2,550 किसानों को मिला पहला डिजिटल भुगतान!

लुधियाना। भारत में कृषि कार्बन बाज़ार अब नीतिगत चर्चा से आगे बढ़कर खेतों तक पहुंचने लगा है। इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए पंजाब और हरियाणा के 2,550 छोटे किसानों को पुनर्योजी (Regenerative) कृषि अपनाने के बदले कार्बन क्रेडिट आधारित डिजिटल भुगतान जारी किया गया। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू), लुधियाना में आयोजित कार्यक्रम में कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के महानिदेशक डॉ. एम.एल. जाट ने किसानों के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) की शुरुआत की।

यह भुगतान ग्रो इंडिगो के ‘आदि कार्बन कार्यक्रम’ के तहत किया गया है, जिसे वर्ष 2019 में आईसीएआर के वैज्ञानिक सहयोग से शुरू किया गया था। इस पहल को भारत में किसानों को उनकी कृषि भूमि में कार्बन संचयन (Carbon Sequestration) के लिए आर्थिक प्रोत्साहन देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।

पुनर्योजी खेती से मिला कार्बन क्रेडिट का लाभ

कार्यक्रम के अंतर्गत किसानों ने 2019 से 2022 के बीच डायरेक्ट सीडेड राइस (DSR), कम जुताई (Minimum Tillage) और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी जलवायु-अनुकूल तकनीकों को अपनाया। इन तरीकों से ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी और मिट्टी में कार्बन की मात्रा बढ़ने के प्रभावों का वैज्ञानिक आकलन एवं स्वतंत्र सत्यापन किया गया। इसके आधार पर कार्बन क्रेडिट जारी किए गए।

वर्तमान में यह कार्यक्रम देश के सात राज्यों में 20 लाख एकड़ से अधिक क्षेत्र और एक लाख से अधिक किसानों तक पहुंच चुका है। कार्यक्रम के तहत अंतरराष्ट्रीय मानक Verra VM0042 पद्धति के अनुसार कृषि कार्बन क्रेडिट जारी किए गए हैं।

किसानों को मिले ₹3,000 से ₹15,000 तक

पहले चरण में लगभग 30 हजार एकड़ भूमि और 50 हजार से अधिक कार्बन क्रेडिट शामिल किए गए। किसानों को उनके हिस्से के कार्बन क्रेडिट के आधार पर लगभग ₹3,000 से ₹15,000 तक का भुगतान मिला।

ग्रो इंडिगो ने किसानों को भुगतान कार्बन क्रेडिट की बिक्री पूरी होने से पहले ही अपने फंड से डिजिटल माध्यम से उपलब्ध कराया, ताकि किसानों को आय प्राप्त करने के लिए लंबा इंतजार न करना पड़े। किसानों को दो विकल्प दिए गए थे—पहला, निश्चित प्रारंभिक भुगतान प्राप्त करना और दूसरा, क्रेडिट बिक्री के बाद शुद्ध कार्बन राजस्व का 75 प्रतिशत हिस्सा लेना।

पानी बचा, पराली जलाने में आई कमी

कार्यक्रम के आकलन के अनुसार 2019-2022 के दौरान शामिल खेतों में अपनाई गई तकनीकों से लगभग 45 अरब लीटर पानी की बचत हुई। साथ ही दो लाख टन से अधिक फसल अवशेषों को जलने से बचाया गया, जिससे अनुमानित 1,000 टन पीएम 2.5 प्रदूषक कणों के उत्सर्जन को रोका जा सका।

विशेषज्ञों का मानना है कि DSR तकनीक पारंपरिक धान रोपाई की तुलना में कम पानी का उपयोग करती है, जबकि फसल अवशेष प्रबंधन से पराली जलाने की समस्या कम होती है। इससे वायु गुणवत्ता सुधारने के साथ-साथ मिट्टी की उर्वरता भी बेहतर होती है।

आईसीएआर की वैज्ञानिक भूमिका रही अहम

इस पहल में आईसीएआर और उसके विभिन्न संस्थानों ने ग्रीनहाउस गैस लेखांकन, क्रॉप मॉडलिंग, मिट्टी के नमूनों का विश्लेषण, उपकरणों के सत्यापन, फील्ड टीम प्रशिक्षण तथा सैटेलाइट एवं रिमोट सेंसिंग आधारित निगरानी जैसे क्षेत्रों में तकनीकी सहायता प्रदान की।

आईसीएआर–भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली तथा आईसीएआर–एग्रीकल्चरल टेक्नोलॉजी एप्लीकेशन रिसर्च इंस्टीट्यूट (ATARI) सहित कई संस्थानों ने कार्यक्रम के वैज्ञानिक ढांचे को मजबूत बनाने में योगदान दिया।

किसानों की अतिरिक्त आय का नया स्रोत

डॉ. एम.एल. जाट ने कहा कि यह पहल दर्शाती है कि वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित क्लाइमेट-स्मार्ट कृषि तकनीकें छोटे किसानों के लिए अतिरिक्त आय का स्रोत बन सकती हैं। उन्होंने कहा कि जल संरक्षण, मिट्टी की सेहत सुधारने और वायु प्रदूषण कम करने वाली तकनीकों को अपनाने से किसानों और पर्यावरण दोनों को लाभ मिलेगा।

ग्रो इंडिगो की कार्यकारी निदेशक डॉ. उषा बरवाले ज़ेहर ने इसे भारत में किसानों को मिट्टी में संचित कार्बन के लिए भुगतान किए जाने का पहला उदाहरण बताया। उन्होंने कहा कि यह मॉडल भविष्य में कृषि क्षेत्र के लिए हरित आय (Green Income) का नया रास्ता खोल सकता है।

पराली प्रबंधन में पंजाब बना उदाहरण

पंजाब में फसल अवशेष प्रबंधन के सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं। सरकारी आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2025 में धान कटाई सीजन के दौरान राज्य में खेतों में आग लगने की 5,114 घटनाएं दर्ज की गईं, जो निगरानी शुरू होने के बाद सबसे कम संख्या है। यह 2021 की तुलना में 93 प्रतिशत और 2022 की तुलना में 90 प्रतिशत की कमी दर्शाती है।

मोगा जिले का रानसिंह कलां गांव भी एक मॉडल के रूप में उभरा है, जहां किसानों ने लगातार छह वर्षों तक 1,310 एकड़ क्षेत्र में पराली नहीं जलाने का रिकॉर्ड कायम रखा है।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ रही पुनर्योजी कृषि की स्वीकार्यता

भारत की अध्यक्षता में जून 2026 में इंदौर में आयोजित 16वीं ब्रिक्स कृषि मंत्रियों की बैठक में जलवायु-सहिष्णु और टिकाऊ खेती को बढ़ावा देने के लिए “ब्रिक्स नेटवर्क ऑफ सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस ऑन एग्रोइकोलॉजी एंड रीजेनरेटिव एग्रीकल्चर” स्थापित करने पर सहमति बनी। इसकी प्रारंभिक मेजबानी आईसीएआर–भारतीय कृषि प्रणाली अनुसंधान संस्थान (IIFSR), मोदीपुरम करेगा।

किसानों के लिए क्या है संदेश?

विशेषज्ञों के अनुसार आने वाले वर्षों में कार्बन क्रेडिट आधारित कृषि मॉडल किसानों के लिए अतिरिक्त आय का नया माध्यम बन सकता है। यदि किसान DSR, कम जुताई, फसल विविधीकरण, मिट्टी संरक्षण और फसल अवशेष प्रबंधन जैसी तकनीकों को अपनाते हैं, तो उन्हें न केवल उत्पादन लागत कम करने में मदद मिलेगी, बल्कि कार्बन बाजार से भी आय अर्जित करने के अवसर मिल सकते हैं।

यह पहल इस बात का संकेत है कि भविष्य की खेती केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि कार्बन संरक्षण, जल बचत और पर्यावरणीय सेवाओं को भी किसानों की आय से जोड़ने की दिशा में आगे बढ़ेगी।