औषधीय और सुगंधित फसलों की बढ़ती मांग: मेंथा खेती किसानों के लिए बन रही ‘हरा सोना’
नई दिल्ली/लखनऊ। भारत में औषधीय और सुगंधित फसलों का इतिहास बेहद समृद्ध और प्राचीन रहा है। आयुर्वेद और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इन फसलों का उपयोग सदियों से होता आ रहा है। बदलते समय के साथ जहां आधुनिक चिकित्सा पद्धतियों का विस्तार हुआ है, वहीं औषधीय पौधों की उपयोगिता आज भी बरकरार है। वर्तमान दौर में देश-विदेश में इनकी बढ़ती मांग ने किसानों को पारंपरिक फसलों से हटकर नकदी फसलों की ओर आकर्षित किया है। इसी कड़ी में मेंथा (पुदीना) की खेती किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है।
देश में मेंथा उत्पादन का बढ़ता दायरा
भारत में मेंथा की खेती बड़े पैमाने पर की जाती है। उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, गुजरात और पंजाब इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं। विशेष रूप से उत्तर प्रदेश को मेंथा उत्पादन का हब माना जाता है। मेंथा एक वार्षिक झाड़ीदार पौधा है, जिससे मेंथॉल युक्त तेल प्राप्त किया जाता है। ग्लोबल स्तर पर मेंथा तेल की मांग करीब 9500 मीट्रिक टन आंकी गई है, जिसमें भारत का योगदान सबसे अधिक है। उत्पादन के मामले में भारत विश्व में पहले स्थान पर काबिज है।
वैज्ञानिक शोध से मिल रही मजबूती
मेंथा की खेती को वैज्ञानिक आधार देने के लिए लखनऊ स्थित केंद्रीय औषधीय एवं सुगंधित पौधा संस्थान (CIMAP) लगातार शोध और नवाचार कर रहा है। संस्थान द्वारा विकसित नई किस्में और उन्नत तकनीकें किसानों की उत्पादकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि वैज्ञानिक तरीकों को अपनाया जाए तो मेंथा की खेती अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हो सकती है।
उपयुक्त मिट्टी और खेत की तैयारी
मेंथा की अच्छी उपज के लिए बलुई दोमट मिट्टी सबसे उपयुक्त मानी जाती है। खेत में जल निकासी की उचित व्यवस्था होनी चाहिए, ताकि पानी का जमाव न हो। इसके अलावा मिट्टी का भुरभुरा होना जरूरी है, जिससे जड़ों तक पर्याप्त वायु संचार बना रहे।
खेती की शुरुआत से पहले खेत की गहरी जुताई करना आवश्यक होता है। पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से की जाती है, इसके बाद 2-3 बार कल्टीवेटर से जुताई कर खेत को समतल किया जाता है। अंतिम जुताई के समय 250 से 300 क्विंटल प्रति हेक्टेयर गोबर की सड़ी खाद या कंपोस्ट डालना फसल के लिए अत्यंत लाभकारी होता है।
तेल उत्पादन और उपयोगिता
मेंथा से प्राप्त होने वाला तेल कई उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल है। इसका उपयोग दवाइयों, सौंदर्य प्रसाधनों, खाद्य पदार्थों, टूथपेस्ट, च्युइंग गम और सुगंधित उत्पादों में बड़े पैमाने पर किया जाता है। सामान्यतः एक हेक्टेयर मेंथा फसल से लगभग 150 किलोग्राम तेल प्राप्त होता है। हालांकि, यदि किसान समय पर रोपाई, सिंचाई और उर्वरकों का संतुलित उपयोग करें तो यह उत्पादन 250 से 300 किलोग्राम तक बढ़ सकता है।
आधुनिक तकनीक से बढ़ रहा मुनाफा
तकनीकी प्रगति ने मेंथा खेती को और अधिक लाभकारी बना दिया है। अब किसान पारंपरिक तरीकों को छोड़कर आधुनिक आसवन (डिस्टिलेशन) संयंत्रों का उपयोग कर रहे हैं। इन संयंत्रों में कम ईंधन की खपत होती है और कम समय में अधिक मात्रा में बेहतर गुणवत्ता का तेल प्राप्त होता है।
कटाई के बाद मेंथा को कुछ समय तक खेत में फैलाकर रखा जाता है, जिससे पत्तियां हल्की पीली हो जाती हैं और तेल निकालने की प्रक्रिया अधिक प्रभावी बनती है। इसके बाद फसल को डिस्टिलेशन संयंत्र में डालकर गर्म किया जाता है, जिससे वाष्पित होकर तेल अलग टैंक में एकत्रित हो जाता है। बचा हुआ अवशेष (जिंगरा) जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जाता है।
फसल प्रबंधन में सावधानी जरूरी
विशेषज्ञों के अनुसार, मेंथा की कटाई से 15-20 दिन पहले सिंचाई बंद कर देनी चाहिए। साथ ही खेत की नियमित निगरानी जरूरी है, ताकि रोग और कीट प्रबंधन समय रहते किया जा सके।
किसानों के लिए सुनहरा अवसर
बढ़ती ग्लोबल मांग और बेहतर कीमतों के चलते मेंथा की खेती किसानों के लिए “हरा सोना” साबित हो रही है। यदि किसान वैज्ञानिक तरीकों, आधुनिक तकनीकों और उचित प्रबंधन को अपनाएं, तो वे कम लागत में अधिक मुनाफा कमा सकते हैं। आने वाले समय में औषधीय और सुगंधित फसलों का बाजार और अधिक विस्तारित होने की संभावना है, जिससे किसानों की आय में स्थायी वृद्धि हो सकती है।
चित्र: प्रतीकात्मक AI


























