अश्वगंधा की खेती से कम लागत में अच्छा मुनाफा : जानिए बुवाई, पैदावार की पूरी जानकारी
देश में पारंपरिक औषधीय फसलों की मांग तेजी से बढ़ रही है। आयुर्वेद, न्यूट्रास्यूटिकल्स और कॉस्मेटिक उद्योग के विस्तार ने किसानों के लिए नई संभावनाएं खोल दी हैं। ऐसी ही एक लाभकारी औषधीय फसल है अश्वगंधा (Withania somnifera), जिसे भारतीय जिनसेंग भी कहा जाता है। तनाव, अनिद्रा, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, जोड़ों के दर्द, पुरुष एवं महिला स्वास्थ्य तथा सौंदर्य उत्पादों में इसके व्यापक उपयोग के कारण घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इसकी मांग लगातार बढ़ रही है।
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कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, सही तकनीक अपनाकर किसान कम लागत में अश्वगंधा की खेती से अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
ग्लोबल मंच पर भी गूंजा अश्वगंधा का नाम
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अश्वगंधा के महत्व को अंतरराष्ट्रीय मंच पर रेखांकित किया है। पारंपरिक चिकित्सा पर आयोजित दूसरे World Health Organization (WHO) वैश्विक शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा:
“भारत में इस जड़ी-बूटी का उपयोग सदियों से होता आ रहा है, लेकिन कोविड-19 महामारी के दौरान इसकी वैश्विक मांग में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई।”
प्रधानमंत्री ने बताया कि सम्मेलन में अश्वगंधा पर विशेष वैश्विक चर्चा आयोजित की गई, जिसमें अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों ने इसकी सुरक्षा, गुणवत्ता और चिकित्सीय उपयोग पर विचार-विमर्श किया। उन्होंने वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर समय-परीक्षित उपचारों को वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करने की भारत की प्रतिबद्धता दोहराई।
कोविड-19 के दौरान इम्यूनिटी बढ़ाने वाले उत्पादों की मांग बढ़ने से अश्वगंधा आधारित सप्लिमेंट्स की बिक्री में तेजी आई, जिससे किसानों को बेहतर बाजार मूल्य मिला।
🌿 आयुर्वेद में महत्वपूर्ण औषधीय पौधा
अश्वगंधा को अक्सर “भारतीय जिनसेंग” भी कहा जाता है। आयुर्वेद में इसका उपयोग तनाव कम करने, अनिद्रा दूर करने, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, जोड़ों के दर्द व सूजन में राहत देने तथा पुरुष और महिलाओं के स्वास्थ्य संबंधी कई उत्पादों में किया जाता है। इसके अलावा कई कॉस्मेटिक कंपनियां भी त्वचा और बालों से जुड़े उत्पादों में इसका उपयोग करती हैं। यही कारण है कि इसकी मांग घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी लगातार बढ़ रही है।
🚜 खेत की तैयारी और बुवाई
गेहूं, सरसों या आलू की फसल कटने के बाद खेत को अच्छी तरह जोतकर तैयार किया जाता है। इसके बाद खेत को कुछ समय के लिए खुला छोड़ देना चाहिए, जिससे धूप के कारण हानिकारक कीट और रोगजनक नष्ट हो जाएं।
बुवाई का उपयुक्त समय:
15 सितंबर से 31 अक्टूबर के बीच बुवाई करना सबसे बेहतर माना जाता है।
बीज उपचार:
बुवाई से पहले बीज को बाविस्टिन या कार्बेन्डाजिम से उपचारित करने से फफूंदजनित रोगों से बचाव होता है।
बुवाई का तरीका:
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बीज को रेत या पोटाश के साथ मिलाकर छिड़काव विधि से बो सकते हैं।
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बीज की गहराई 0.5 से 1 सेंटीमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए।
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कतार से कतार की दूरी 30–45 सेंटीमीटर रखी जाती है।
🌾 उर्वरक और पोषक तत्व प्रबंधन
बेहतर उत्पादन के लिए खेत में निम्न उर्वरकों का उपयोग किया जा सकता है:
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डीएपी – 50 किलोग्राम, पोटाश – 50 किलोग्राम, सिंगल सुपर फॉस्फेट (SSP) – 50 किलोग्राम
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जिंक – 5 किलोग्राम, सल्फर – 5 किलोग्राम, इन सभी उर्वरकों को मिट्टी में अच्छी तरह मिला देना चाहिए।
सारांश
अश्वगंधा कम पानी, कम लागत और सीमित संसाधनों में उगाई जाने वाली फसल है। प्रधानमंत्री द्वारा वैश्विक मंच पर इसके महत्व को रेखांकित किए जाने के बाद इसकी विश्वसनीयता और बाजार संभावनाएं और मजबूत हुई हैं।
✅ कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि औषधीय फसलों की बढ़ती मांग को देखते हुए अश्वगंधा की खेती आने वाले वर्षों में किसानों के लिए आय बढ़ाने का मजबूत साधन बन सकती है। कम पानी, कम लागत और बेहतर बाजार कीमत इसे एक आकर्षक खेती विकल्प बनाती है।
