उत्तर-पूर्व भारत में औषधीय पौधों का भंडार, आयुर्वेद और आधुनिक चिकित्सा के लिए अहम🌿
▶ उत्तर-पूर्व बना औषधीय संपदा का केंद्र
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गुवाहाटी/नई दिल्ली –भारत का उत्तर-पूर्वी क्षेत्र औषधीय पौधों की अपार विविधता के लिए जाना जाता है। हाल ही में जारी एक मैपिंग रिपोर्ट के अनुसार अरुणाचल प्रदेश, सिक्किम, मेघालय, असम, नागालैंड, मिजोरम, मणिपुर और त्रिपुरा में बड़ी संख्या में ऐसे पौधे पाए जाते हैं, जिनका उपयोग आयुर्वेद, यूनानी और आधुनिक चिकित्सा में किया जाता है।
▶ विविध जलवायु से समृद्ध जैव विविधता
विशेषज्ञों के मुताबिक यह क्षेत्र तीन प्रमुख भौगोलिक भागों—बंगाल-असम के मैदान, पूर्वी हिमालय और पूर्वांचल पहाड़ी क्षेत्र—में फैला हुआ है। अलग-अलग जलवायु और ऊंचाई के कारण यहां विविध प्रकार के औषधीय पौधे विकसित होते हैं, जो इसे जैव विविधता का हॉटस्पॉट बनाते हैं।
▶ प्रमुख औषधीय पौधों की भरमार

इस क्षेत्र में पाई जाने वाली प्रमुख औषधीय प्रजातियों में सर्पगंधा (Rauvolfia serpentina), अश्वगंधा (Withania somnifera), गिलोय (Tinospora cordifolia), जटामांसी (Nardostachys jatamansi) और कुटकी (Picrorhiza kurroa) शामिल हैं। ये पौधे उच्च रक्तचाप, तनाव, प्रतिरक्षा बढ़ाने और पाचन संबंधी समस्याओं के इलाज में उपयोगी माने जाते हैं।
▶ दुर्लभ और उच्च मूल्य वाली जड़ी-बूटियां
इसके अलावा पिप्पली (Piper longum), अशोक (Saraca asoca), चिरायता (Swertia chirata) और अगर (Aquilaria agallocha) जैसी जड़ी-बूटियां भी इस क्षेत्र की खास पहचान हैं। टैक्सस (Taxus wallichiana) जैसे दुर्लभ पौधे कैंसर रोधी दवाओं में इस्तेमाल होते हैं, जिससे इनका महत्व और बढ़ जाता है।
▶ पारंपरिक ज्ञान और जनजातीय विरासत
जानकारों का कहना है कि उत्तर-पूर्व भारत की जनजातीय परंपराओं में इन औषधीय पौधों का विशेष स्थान है। स्थानीय समुदाय पीढ़ियों से इनका उपयोग घरेलू उपचार में करते आ रहे हैं। अब सरकार और वैज्ञानिक संस्थान इस पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक अनुसंधान के साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं।
▶ सरकारी पहल और किसानों के लिए अवसर
राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB), आयुष मंत्रालय के तहत, इन पौधों के संरक्षण और व्यावसायिक उपयोग को बढ़ावा दे रहा है। इससे किसानों को आय के नए अवसर मिल रहे हैं और औषधीय खेती को प्रोत्साहन मिल रहा है।
▶ संरक्षण की चुनौती और भविष्य की राह
हालांकि, विशेषज्ञ चेतावनी देते हैं कि जलवायु परिवर्तन के कारण इन पौधों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। ऐसे में इनके संरक्षण, संवर्धन और सतत उपयोग पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। उत्तर-पूर्व भारत का यह औषधीय खजाना देश की स्वास्थ्य प्रणाली और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे सकता है।