नवीन तकनीक से पानामा विल्ट पर नियंत्रण, बिहार में केला किसानों को राहत!
समस्तीपुर/हाजीपुर –बिहार में केले की खेती किसानों की आय का एक प्रमुख और भरोसेमंद साधन बन चुकी है। राज्य की अनुकूल जलवायु, उपजाऊ जलोढ़ मिट्टी और किसानों के लंबे अनुभव ने बिहार को देश के संभावित बड़े केला उत्पादक राज्यों की श्रेणी में ला खड़ा किया है। बावजूद इसके, बीते कुछ वर्षों से पानामा विल्ट (फ्यूजेरियम विल्ट) रोग ने केला उत्पादन के सामने गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। इस घातक रोग से निपटने के लिए वैज्ञानिकों ने अब विज्ञान-आधारित नवीन प्रबंधन तकनीक विकसित की है, जिसे केला उत्पादन को बचाने की दिशा में एक निर्णायक पहल माना जा रहा है।
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इस संबंध में जानकारी देते हुए प्रोफेसर (डॉ.) एस. के. सिंह, प्रोफेसर एवं प्रधान, पौधारोग एवं सूत्रकृमि विभाग, पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चर, पूर्व अन्वेषक, अखिल भारतीय फल अनुसंधान परियोजना तथा अतिरिक्त प्रभार, केला अनुसंधान केंद्र, गोरौल (हाजीपुर) ने बताया कि पानामा विल्ट आज बिहार ही नहीं, बल्कि पूरे देश में केले की खेती के लिए सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक बन चुका है।

मिट्टी में वर्षों तक सक्रिय रहता है रोग
डॉ. सिंह के अनुसार, यह रोग Fusarium oxysporum f. sp. cubense नामक मृदाजनित कवक के कारण होता है, जो पौधों की संवहनी नलिकाओं को अवरुद्ध कर देता है। इससे पौधों में जल और पोषक तत्वों का प्रवाह बाधित हो जाता है। रोगग्रस्त पौधों में पहले पत्तियों का पीला पड़ना, फिर मुरझाना, तने के अंदर भूरे रंग की धारियां दिखना और अंततः पूरा पौधा सूखकर नष्ट हो जाना इसके प्रमुख लक्षण हैं। सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि यह कवक मिट्टी में कई वर्षों तक जीवित रह सकता है, जिससे संक्रमित खेतों में दोबारा केला लगाना अत्यंत कठिन हो जाता है।
बिहार में तेजी से फैल रहा है पानामा विल्ट
बिहार में पानामा विल्ट अब केवल पारंपरिक लंबी किस्मों तक सीमित नहीं रह गया है। मालभोग जैसी लोकप्रिय किस्म इस रोग के कारण कई क्षेत्रों में लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी है, जहां संक्रमण का स्तर 60 प्रतिशत से अधिक दर्ज किया गया है।
राज्य की अल्पान, चम्पा, चीनी चम्पा, कन्थाली और कोठिया जैसी किस्मों में भी रोग की उपस्थिति लगातार बढ़ रही है। इतना ही नहीं, बसराइ, रोबस्टा और ग्रैंड नैन जैसी बौनी और व्यावसायिक किस्मों में ट्रॉपिकल रेस-4 (TR4) का प्रकोप किसानों के लिए नई और बड़ी चुनौती बनकर सामने आया है। विशेषज्ञों के अनुसार TR4 दुनिया भर में केले की खेती के लिए सबसे खतरनाक रूप माना जाता है।
वैज्ञानिकों ने विकसित की समेकित प्रबंधन तकनीक
पानामा विल्ट के बढ़ते खतरे को देखते हुए अखिल भारतीय समन्वित फल अनुसंधान परियोजना और डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वैज्ञानिकों ने एक प्रभावी और समेकित प्रबंधन तकनीक विकसित की है। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य मिट्टी में मौजूद रोगजनक की सक्रियता को कम करना, रोग के प्रसार को रोकना और पौधों की रोग-प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाना है।
इस तकनीक के अंतर्गत रोगमुक्त पौध सामग्री का उपयोग, रोपण से पूर्व गड्ढों की वैज्ञानिक तैयारी, प्रकंदों का रासायनिक उपचार तथा रोपण के बाद समयबद्ध तरीके से खेत में उपचार करने की अनुशंसा की गई है।
88 प्रतिशत तक रोग नियंत्रण में सफलता
डॉ. सिंह ने बताया कि इस समेकित तकनीक के प्रयोग से रेस-1 और रेस-2 के कारण होने वाले पानामा विल्ट रोग में लगभग 88 प्रतिशत तक कमी दर्ज की गई है। यह उपलब्धि किसानों के लिए बड़ी राहत लेकर आई है। हालांकि, TR4 के मामलों में यह तकनीक रोग को पूरी तरह समाप्त नहीं कर पाती, लेकिन रोग की तीव्रता और फैलाव को काफी हद तक नियंत्रित करने में सफल रही है।
देशभर में सफल परीक्षण
इस तकनीक का परीक्षण देश के कई प्रमुख अनुसंधान केंद्रों—पूसा (बिहार), कोयम्बटूर (तमिलनाडु), जोरहाट (असम), कन्नारा (केरल) और मोहनपुर (पश्चिम बंगाल) में किया गया, जहां यह रोग नियंत्रण और उपज वृद्धि के लिहाज से प्रभावी सिद्ध हुई। वैज्ञानिकों का मानना है कि स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीक में मामूली सुधार कर इसे और अधिक उपयोगी बनाया जा सकता है।
किसानों के लिए उम्मीद की नई किरण
कृषि विशेषज्ञ के अनुसार, यदि किसान इस वैज्ञानिक तकनीक को सही समय और सही विधि से अपनाते हैं, तो पानामा विल्ट जैसे घातक रोग से केले की फसल को काफी हद तक सुरक्षित रखा जा सकता है। यह तकनीक न केवल केले की खेती को बचाने में सहायक होगी, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और कृषि को टिकाऊ बनाने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगी।
भविष्य में TR4 के पूर्ण नियंत्रण के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान में यह तकनीक बिहार सहित देशभर के केला किसानों के लिए आशा की एक मजबूत किरण बनकर सामने आई है।
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी अधिकारी-प्रभारी, केला अनुसंधान केन्द्र, गोरौल डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा संपर्क: sksraupusa@gmail.com
फिचर चित्र:प्रतीकात्मक