कीट-रोगों से 60 हजार करोड़ का नुकसान, तिलहन क्षेत्र में सुधार की जरूरत!
नई दिल्ली –देश को खाद्य तेलों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत आज “आत्मनिर्भर भारत के लिए खाद्य तेल सुरक्षा” विषय पर राष्ट्रीय तिलहन सम्मेलन का आयोजन किया गया। इस सम्मेलन में देशभर से तिलहन अनुसंधान, कृषि विकास, नीति निर्माण और उद्योग क्षेत्र से जुड़े वैज्ञानिक, विशेषज्ञ, नीति-निर्माता एवं अन्य हितधारक शामिल हुए। सम्मेलन का उद्देश्य खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए एक साझा, ठोस और व्यावहारिक रोडमैप तैयार करना रहा।
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खाद्य तेल आत्मनिर्भरता पर राष्ट्रीय मंथन
सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में खाद्य तेल सुरक्षा से जुड़ी मौजूदा चुनौतियों और संभावनाओं पर गहन चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि भारत आज भी खाद्य तेलों की जरूरत का एक बड़ा हिस्सा आयात के माध्यम से पूरा करता है, जिससे विदेशी मुद्रा पर भारी दबाव पड़ता है। ऐसे में देश के तिलहन क्षेत्र को सशक्त बनाना समय की मांग है।
आयात निर्भरता घटाने की अपार संभावनाएं

मुख्य वक्ता डॉ. एम. एल. जाट, सचिव, कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) तथा महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने कहा कि यदि तिलहन फसलों में मौजूद उपज के अंतर (यील्ड गैप) और फसल हानियों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए, तो भारत खाद्य तेल आयात पर अपनी निर्भरता को काफी हद तक कम कर सकता है। उन्होंने कहा कि देश में उपलब्ध तकनीक और ज्ञान का सही उपयोग अभी भी पूरी तरह नहीं हो पा रहा है।
कीट एवं रोगों से हो रहा भारी आर्थिक नुकसान
डॉ. जाट ने अपने संबोधन में बताया कि तिलहन फसलों में कीट एवं रोगों के कारण हर वर्ष लगभग 60 हजार करोड़ रुपये का नुकसान होता है। यह नुकसान लगभग देश के कुल खाद्य तेल आयात बिल के बराबर है। उन्होंने इसे चिंता का विषय बताते हुए कहा कि यदि इन नुकसानों को कम किया जाए, तो आयात की जरूरत स्वतः घट सकती है और किसानों की आय में भी वृद्धि होगी।
थ्योरी ऑफ चेंज’ पर आधारित रणनीति जरूरी
डॉ. जाट ने तिलहन क्षेत्र में सुधार के लिए एक स्पष्ट ‘थ्योरी ऑफ चेंज’ अपनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि अनुसंधान, नीति और विकास कार्यक्रमों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए। इसके साथ ही स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकों का विकास, मजबूत बीज प्रणाली, प्रभावी विस्तार सेवाएं तथा समयबद्ध और जवाबदेह कार्य योजनाएं तैयार की जानी चाहिए।
खेत तक पहुंचे अनुसंधान का लाभ
उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि प्रयोगशालाओं और अनुसंधान केंद्रों में विकसित तकनीकों का वास्तविक मूल्य तभी है, जब उनका प्रभाव किसानों के खेतों में दिखाई दे। अनुसंधान को परिणामोन्मुख बनाते हुए उसका सीधा लाभ किसानों तक पहुंचाना जरूरी है।
किसान-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान
डॉ. जाट ने तिलहन क्षेत्र से जुड़े सभी वैज्ञानिकों और संस्थानों से किसान-केंद्रित दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि सभी वैज्ञानिक प्रयासों का अंतिम उद्देश्य किसानों की समृद्धि और देश की खाद्य तेल सुरक्षा सुनिश्चित करना होना चाहिए। इसके लिए सभी हितधारकों को अपने दायरे से बाहर निकलकर सामूहिक रूप से काम करना होगा।
तिलहन क्षेत्र को एकजुट करने की पहल
सम्मेलन में तिलहन अनुसंधान एवं विकास से जुड़े विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग और तालमेल बढ़ाने पर भी चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने माना कि यदि अनुसंधान, पैदावार, प्रसंस्करण और विपणन को एकीकृत किया जाए, तो तिलहन क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति संभव है।
आत्मनिर्भर भारत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
राष्ट्रीय तिलहन सम्मेलन को खाद्य तेलों में आत्मनिर्भर भारत के लक्ष्य की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इस सम्मेलन से एक ऐसी कार्ययोजना तैयार होने की उम्मीद है, जो व्यावहारिक, समयबद्ध और परिणामोन्मुख होगी तथा आने वाले वर्षों में देश को खाद्य तेल सुरक्षा प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगी।