राष्ट्रीय बकरी दिवस पर गूंजा नवाचार का संदेश: 47 वर्षों से बकरी पालकों की आय बढ़ाने में जुटा केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान!
मथुरा, 12 जुलाई। केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी), मखदूम ने अपने 47वें स्थापना दिवस के अवसर पर द्वितीय राष्ट्रीय बकरी दिवस का भव्य आयोजन किया। यह कार्यक्रम केवल एक संस्थागत उत्सव नहीं रहा, बल्कि बकरी पालन को वैज्ञानिक, लाभकारी और टिकाऊ व्यवसाय बनाने की दिशा में देश की उपलब्धियों का प्रदर्शन भी बना। कार्यक्रम में देशभर के वैज्ञानिकों, पशुपालन विशेषज्ञों, शिक्षाविदों, अधिकारियों, शोधार्थियों, विद्यार्थियों और बड़ी संख्या में बकरी पालक किसानों ने भाग लिया।
कार्यक्रम का उद्घाटन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के उप महानिदेशक (कृषि शिक्षा) डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने किया। उनके साथ विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थानों के विशेषज्ञ और अतिथि भी उपस्थित रहे।
वृक्षारोपण से हुई शुरुआत, नवाचारों का हुआ प्रदर्शन
स्थापना दिवस समारोह की शुरुआत वृक्षारोपण अभियान से हुई। इसके बाद दीप प्रज्ज्वलन, वंदे मातरम् और संस्थान की वार्षिक उपलब्धियों से जुड़े प्रकाशनों का विमोचन किया गया। कार्यक्रम के दौरान वैज्ञानिकों, अधिकारियों और कर्मचारियों ने बकरी पालन क्षेत्र को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाने का संकल्प भी लिया।
47 साल की यात्रा: शोध से किसानों तक पहुंचा लाभ
संस्थान के निदेशक डॉ. मनीष कुमार चेटली ने बताया कि पिछले 47 वर्षों में सीआईआरजी ने बकरी नस्ल सुधार, रोग प्रबंधन, पोषण, प्रजनन तकनीक और आधुनिक पशुपालन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। उन्होंने कहा कि संस्थान का उद्देश्य केवल शोध तक सीमित नहीं है, बल्कि उन तकनीकों को सीधे किसानों तक पहुंचाना भी है।
उन्होंने जानकारी दी कि बीते एक वर्ष में संस्थान ने 34 प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें 18 राज्यों के लगभग 2,500 लोगों को प्रशिक्षित किया गया। इसके अलावा 7 तकनीकी पेटेंट दर्ज किए गए, 11 समझौता ज्ञापनों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए और 6 तकनीकों का व्यावसायीकरण किया गया।
‘अजा परी’ बनी बकरी पालकों की नई साथी
बकरी पालकों को स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए संस्थान ने ‘अजा परी’ नामक पशु एम्बुलेंस सेवा भी शुरू की है। इसके माध्यम से बीमार पशुओं तक समय पर चिकित्सा सहायता पहुंचाई जा रही है। इसके साथ ही वैक्सीन किट, हर्बल उत्पाद, जीन एडिटिंग और तकनीकी हस्तांतरण जैसे क्षेत्रों में भी उल्लेखनीय कार्य किए जा रहे हैं।
महिला और छोटे किसानों को मिला विशेष लाभ
संस्थान ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और महिला किसानों के सशक्तिकरण के लिए कई परियोजनाएं चलाई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि सीमांत और भूमिहीन किसानों के लिए बकरी पालन आय का एक भरोसेमंद स्रोत बन सकता है। कम लागत और तेजी से बढ़ने वाली आय के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में इसे “गरीबों की एटीएम” भी कहा जाता है।
युवा वैज्ञानिकों को दिया नवाचार का संदेश
मुख्य अतिथि डॉ. यशपाल सिंह मलिक ने संस्थान की हाइड्रोपोनिक यूनिट, पॉडकास्ट, एकीकृत कृषि प्रणाली और अन्य नवाचारों की सराहना की। उन्होंने कहा कि कृषि और पशुपालन के क्षेत्र में नई तकनीकों का विकास किसानों की आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा। उन्होंने युवा वैज्ञानिकों से किसानों की जरूरतों के अनुरूप तकनीक विकसित करने का आह्वान किया।
पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य सेवा पर भी जोर
राष्ट्रीय बकरी दिवस के अवसर पर वन विभाग, मथुरा के सहयोग से मेगा वृक्षारोपण अभियान चलाया गया। वहीं, फरह स्थित भावी अजा केंद्र परिसर में निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर का आयोजन किया गया, जिसका लाभ किसानों, बकरी पालकों, कर्मचारियों और स्थानीय लोगों ने उठाया।
बकरी पालकों और वैज्ञानिकों का सम्मान
कार्यक्रम के दौरान उत्कृष्ट कार्य करने वाले वैज्ञानिकों, कर्मचारियों और उन्नत बकरी पालक किसानों को सम्मानित किया गया। साथ ही राजस्थान के भरतपुर में तकनीकी सहयोग के लिए एक बकरी पालक स्वयं सहायता समूह का भी शुभारंभ किया गया।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में बकरी पालन की बड़ी भूमिका
विशेषज्ञों का कहना है कि बदलते कृषि परिदृश्य में बकरी पालन किसानों के लिए अतिरिक्त आय का मजबूत माध्यम बन रहा है। केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान की तकनीकें और प्रशिक्षण कार्यक्रम ग्रामीण परिवारों को आत्मनिर्भर बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं। 47 वर्षों की इस यात्रा ने यह साबित किया है कि वैज्ञानिक अनुसंधान और किसानों की भागीदारी मिलकर पशुपालन क्षेत्र में नई संभावनाओं के द्वार खोल सकती है।


























