August 26, 2026 10:21 PM

Krishi Times

पीएम-आशा योजना: किसानों को MSP का सहारा, 2026-27 में ₹7,200 करोड़ का बजट

MSP पर सरकार का बड़ा दांव, किसानों को मिलेगा मूल्य सुरक्षा कवच!

नई दिल्ली। किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य दिलाने और उन्हें मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचने से बचाने के लिए केंद्र सरकार की प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (पीएम-आशा) महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। सितंबर 2018 में शुरू की गई यह पहल न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था को मजबूत करने के साथ-साथ कृषि जिंसों की कीमतों में अत्यधिक उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने का प्रयास करती है।

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वित्त वर्ष 2026-27 में पीएम-आशा के लिए ₹7,200 करोड़ का बजट प्रावधान किया गया है। इससे पहले 2024-25 में योजना के तहत वास्तविक व्यय ₹5,437.99 करोड़ रहा, जबकि 2025-26 के बजट में ₹6,941.36 करोड़ का प्रावधान था। बढ़ता बजट सरकार के मूल्य समर्थन और किसानों की आय सुरक्षा पर बढ़ते जोर को दर्शाता है।

चार योजनाओं के जरिए किसानों को मूल्य सुरक्षा

पीएम-आशा एकीकृत ढांचे के तहत चार प्रमुख घटकों को शामिल करती है—

मूल्य समर्थन योजना (PSS) मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF) मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS)

बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS)

इन योजनाओं को फसल और बाजार की परिस्थितियों के अनुसार लागू किया जाता है, ताकि किसानों को उनकी उपज का बेहतर मूल्य मिल सके और उपभोक्ताओं के लिए आवश्यक खाद्य वस्तुओं की कीमतों में भी संतुलन बना रहे।

PSS: MSP से नीचे भाव गिरने पर सरकारी खरीद

मूल्य समर्थन योजना (PSS) के तहत जब बाजार भाव MSP से नीचे चला जाता है तो पात्र किसानों से MSP पर फसलों की खरीद की जाती है। मुख्य रूप से दालों, तिलहन और खोपरा की खरीद नेफेड और NCCF जैसी केंद्रीय नोडल एजेंसियों के माध्यम से राज्य सरकारों के अनुरोध पर की जाती है।

2024-25 से PSS के तहत सामान्यतः किसी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के उत्पादन के 25 प्रतिशत तक खरीद की अनुमति है। हालांकि घरेलू दलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने के उद्देश्य से तुअर, उड़द और मसूर की खरीद राज्य उत्पादन के 100 प्रतिशत तक की अनुमति दी गई है।

PSF: बफर स्टॉक से कीमतों पर नियंत्रण

मूल्य स्थिरीकरण कोष (PSF) के माध्यम से दाल, प्याज और आलू जैसी आवश्यक वस्तुओं का बफर स्टॉक तैयार किया जाता है। कटाई के समय खरीद और जरूरत के अनुसार गैर-फसल अवधि में बाजार में स्टॉक जारी करने से कीमतों में अचानक वृद्धि को नियंत्रित करने में मदद मिलती है।

PSF को पीएम-आशा में शामिल किया गया है, जबकि इसके संचालन की जिम्मेदारी उपभोक्ता मामलों के विभाग के पास बनी हुई है।

PDPS: बिना सरकारी खरीद के किसानों को मूल्य अंतर का भुगतान

मूल्य अंतर भुगतान योजना (PDPS) में किसानों की फसल की भौतिक खरीद नहीं की जाती। इसके बजाय अधिसूचित बाजारों में MSP और वास्तविक बाजार मूल्य के बीच अंतर का भुगतान सीधे पात्र किसानों के बैंक खातों में किया जाता है।

यह भुगतान MSP के अधिकतम 15 प्रतिशत तक हो सकता है। योजना मुख्य रूप से तिलहन के लिए उपयोग की जाती है और इससे बड़े पैमाने पर सरकारी खरीद के लिए आवश्यक भंडारण एवं लॉजिस्टिक व्यवस्था का दबाव कम होता है।

MIS: टमाटर, प्याज और आलू जैसी फसलों के लिए राहत

बाजार हस्तक्षेप योजना (MIS) उन जल्दी खराब होने वाली कृषि एवं बागवानी उपज के लिए है, जिन पर MSP लागू नहीं होता। टमाटर, प्याज और आलू जैसे उत्पाद इसके प्रमुख उदाहरण हैं।

जब बाजार कीमतें पिछले सामान्य सत्र की तुलना में कम से कम 10 प्रतिशत गिर जाती हैं, तब MIS के जरिए हस्तक्षेप किया जा सकता है। इसका उद्देश्य विशेष रूप से बंपर उत्पादन के दौरान किसानों को अत्यधिक कम कीमतों से बचाना है।

MSP और लागत के बीच बढ़ा अंतर

सरकार के अनुसार 2026-27 में कई प्रमुख फसलों का MSP उनकी उत्पादन लागत से काफी ऊपर है।

  • धान (सामान्य): लागत ₹1,627/क्विंटल, MSP ₹2,441 — अंतर ₹814
  • सोयाबीन (पीला): लागत ₹3,805/क्विंटल, MSP ₹5,708 — अंतर ₹1,903
  • गेहूं: लागत ₹1,239/क्विंटल, MSP ₹2,585 — अंतर ₹1,346
  • जूट: लागत ₹3,662/क्विंटल, MSP ₹5,925 — अंतर ₹2,293

इस तरह MSP और उत्पादन लागत के बीच का अंतर किसानों को मूल्य सुरक्षा देने के साथ प्रमुख फसलों की खेती को आर्थिक रूप से प्रोत्साहित करने में मदद करता है।

डिजिटल तकनीक से खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता

पीएम-आशा के क्रियान्वयन में डिजिटल तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाया गया है। आधार आधारित प्रमाणीकरण, e-NAM, e-Samridhi और e-Samyukti जैसे डिजिटल माध्यमों से किसानों के पंजीकरण, खरीद और भुगतान प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर दिया गया है।

पूर्व-पंजीकृत किसानों से सीधी खरीद, बायोमेट्रिक प्रमाणीकरण तथा खरीद केंद्रों के विस्तार से बिचौलियों पर निर्भरता कम करने और किसानों को सीधे लाभ पहुंचाने की कोशिश की गई है।

कृषि अवसंरचना से खेत से बाजार तक मजबूत कड़ी

किसानों को केवल MSP उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। फसल कटाई के बाद भंडारण, परिवहन और बाजार तक पहुंच भी किसानों की आय के लिए महत्वपूर्ण है।

सरकार के अनुसार कृषि अवसंरचना कोष (AIF) के तहत 2,14,437 परियोजनाओं के लिए ₹96,426 करोड़ के ऋण स्वीकृत किए गए हैं। वहीं e-NAM ने 23 राज्यों और 4 केंद्र शासित प्रदेशों की 1,656 मंडियों को जोड़ा है।

e-NAM पर 4,776 FPO पंजीकृत हैं, जबकि 7,334 FPO को ONDC से जोड़ा गया है। इसके अलावा कृषि विपणन अवसंरचना की 25,081 परियोजनाओं और 992.6 लाख मीट्रिक टन क्षमता वाले 50,249 गोदामों को मंजूरी दी गई है।

बिहार में पहली बार संगठित मसूर खरीद

बिहार में पीएम-आशा के तहत NCCF के माध्यम से पहली बार संगठित स्तर पर मसूर की खरीद शुरू की गई है। खरीद प्रक्रिया को मजबूत करने के लिए 48 PACS और FPO को जोड़ा गया है।

10 अगस्त 2026 तक NCCF ने 1,042.65 मीट्रिक टन मसूर खरीदी। इसके लिए 358 किसानों का पंजीकरण हुआ और 285 किसानों को लाभ मिला। इसी अवधि में NAFED ने 1,814.13 मीट्रिक टन मसूर की खरीद की, जिसमें 495 किसान पंजीकृत हुए और 455 किसानों को लाभ मिला।

छत्तीसगढ़ में भी खरीद नेटवर्क का विस्तार

छत्तीसगढ़ में 200 PACS और 12 FPO के नेटवर्क के जरिए पीएम-आशा के तहत खरीद व्यवस्था को मजबूत किया गया है।

10 अगस्त 2026 तक NCCF ने 18,392.228 मीट्रिक टन चना, 22.231 मीट्रिक टन मसूर और 1,035.0205 मीट्रिक टन सरसों खरीदी। इस प्रक्रिया में 21,721 किसानों का पंजीकरण हुआ और 13,790 किसानों को लाभ मिला।

इसी अवधि में NAFED ने 17,020.65 मीट्रिक टन चना और 355.05 मीट्रिक टन मसूर खरीदी। इसके तहत 46,146 किसान पंजीकृत हुए और 13,673 किसानों को लाभ मिला।

किसानों की आय सुरक्षा पर फोकस

पीएम-आशा का उद्देश्य केवल सरकारी खरीद तक सीमित नहीं है। इसका व्यापक लक्ष्य MSP, बाजार हस्तक्षेप, मूल्य स्थिरीकरण, डिजिटल पारदर्शिता और कृषि अवसंरचना को एक-दूसरे से जोड़कर किसानों के लिए मजबूत मूल्य सुरक्षा तंत्र तैयार करना है।

दालों, तिलहन और खोपरा जैसी फसलों की समय पर खरीद, अतिरिक्त खरीद केंद्रों का विस्तार और डिजिटल पंजीकरण किसानों को बाजार से जोड़ने में मदद कर रहे हैं। बिहार और छत्तीसगढ़ में खरीद के आंकड़े भी बताते हैं कि स्थानीय PACS और FPO को जोड़कर सरकारी खरीद की पहुंच को गांवों तक ले जाने का प्रयास किया जा रहा है।

सारांश

पीएम-आशा किसानों के लिए MSP से बाजार तक मूल्य सुरक्षा की एक महत्वपूर्ण कड़ी बन रही है। बढ़े हुए बजट, डिजिटल खरीद व्यवस्था, भंडारण एवं विपणन अवसंरचना और दाल-तिलहन की खरीद के विस्तार से सरकार का जोर किसानों को बेहतर कीमत दिलाने तथा कृषि बाजार को अधिक व्यवस्थित बनाने पर है। इसका प्रभावी क्रियान्वयन छोटे और सीमांत किसानों के लिए खास तौर पर महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि बेहतर खरीद व्यवस्था उन्हें मजबूरी में कम कीमत पर फसल बेचने से बचाने में मदद करती है।