समुद्र में अब दिशा भी सटीक और पकड़ भी मजबूत! 🌊🐟
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह के कार निकोबार में मछुआरों के लिए शुरू की गई ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (GPS) पहल ने पारंपरिक मत्स्य आजीविका को तकनीकी आधार देकर एक नई दिशा दी है। सटीक नेविगेशन उपकरणों की उपलब्धता ने न केवल मछली पकड़ने की दक्षता बढ़ाई है, बल्कि स्थानीय समुदाय के पोषण और आय स्तर में भी उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया गया है।
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पारंपरिक अनुभव से आधुनिक तकनीक तक का सफर
निकोबारी समुदाय की जीवनशैली सदियों से समुद्र पर निर्भर रही है। पारंपरिक ज्ञान और अनुभव के आधार पर मछली पकड़ने की तकनीकें विकसित हुईं, लेकिन समुद्र की अनिश्चित प्रकृति, मौसम की अचानक खराबी और नेविगेशन उपकरणों की कमी के कारण अक्सर नावें रास्ता भटक जाती थीं। इससे उत्पादकता प्रभावित होती थी और कई बार जान का जोखिम भी उत्पन्न हो जाता था।

विशेषज्ञों का मानना है कि तटीय और द्वीपीय क्षेत्रों में सटीक नेविगेशन तकनीक की कमी मत्स्य उत्पादकता का एक बड़ा अवरोध रही है। ऐसे में GPS उपकरणों का परिचय स्थानीय जरूरतों के अनुरूप एक रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
डीएसटी के एसईईडी कार्यक्रम के तहत तकनीकी हस्तक्षेप
इस चुनौती को ध्यान में रखते हुए सेंट्रल आइलैंड टेक्नोलॉजिकल रिसर्च इंस्टीट्यूट ने विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के एसईईडी (SEED) कार्यक्रम के अंतर्गत स्थानीय समुद्री परिस्थितियों के अनुकूल GPS उपकरण उपलब्ध कराए।
तकनीक को केवल वितरित करने तक सीमित न रखकर मछुआरों को इसके उपयोग का प्रशिक्षण भी दिया गया। सर्वेक्षणों के माध्यम से उनकी आवश्यकताओं का आकलन किया गया और जनजातीय परिषद के सहयोग से तकनीक को अपनाने के लिए प्रेरित किया गया।
उत्पादन में 168% तक की वृद्धि
परियोजना के तहत कार निकोबार में एक तटीय मत्स्य पालन सूचना केंद्र स्थापित किया गया है। 5 GPS उपकरण सीधे जनजातीय मछुआरों को प्रदान किए गए हैं, जबकि 5 अन्य उपकरण सामुदायिक उपयोग के लिए उपलब्ध कराए गए हैं।
सटीक नेविगेशन और उत्पादक मत्स्य क्षेत्रों की पहचान के कारण अब मछुआरे कम समय में अधिक मछली पकड़ पा रहे हैं। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, दैनिक मछली पकड़ने की मात्रा में औसतन 168 प्रतिशत तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
पोषण सुरक्षा और आय वृद्धि की दोहरी उपलब्धि
मछलियों की बढ़ी उपलब्धता से स्थानीय परिवारों के आहार में ताजे प्रोटीन और आवश्यक पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ी है। इससे कुपोषण की समस्या में कमी आने की उम्मीद जताई जा रही है।
टीटॉप गांव के जुनैद और चुचुचा गांव के अब्दुल सत्तार जैसे मछुआरों ने अब स्थानीय बाजारों में अपनी मछलियां बेचना शुरू कर दिया है। इससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है और आजीविका के नए अवसर खुले हैं।
विश्लेषकों के अनुसार, यह पहल केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह “ब्लू इकॉनमी” की दिशा में एक ठोस कदम है, जहां तकनीक, पारंपरिक ज्ञान और सामुदायिक सहभागिता मिलकर सतत विकास का मॉडल तैयार करते हैं।
दीर्घकालिक प्रभाव और संभावनाएं
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस मॉडल को अंडमान-निकोबार के अन्य द्वीपों और देश के अन्य तटीय क्षेत्रों में भी विस्तार दिया जाए, तो मत्स्य क्षेत्र में उत्पादकता, सुरक्षा और आय वृद्धि के व्यापक परिणाम सामने आ सकते हैं।
GPS तकनीक ने कार निकोबार के मछुआरों को समुद्र में दिशा ही नहीं दी, बल्कि उनके आर्थिक और सामाजिक जीवन में भी स्थिरता और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त किया है। यह पहल इस बात का उदाहरण है कि जब विज्ञान स्थानीय जरूरतों से जुड़ता है, तो वह जमीनी स्तर पर ठोस परिवर्तन ला सकता है।