उर्वरकों का संतुलन ही टिकाऊ कृषि टिकाऊ कृषि की कुंजी!

संतुलित उर्वरीकरण से मृदा स्वास्थ्य, उत्पादकता और टिकाऊ कृषि को नई दिशा

नई दिल्ली। फसल की पोषण आवश्यकताओं, मृदा की उर्वरता स्थिति और बदलती जलवायु परिस्थितियों के अनुरूप उर्वरकों का वैज्ञानिक एवं विवेकपूर्ण उपयोग ही संतुलित उर्वरीकरण कहलाता है। इसके अंतर्गत सभी आवश्यक मैक्रोन्यूट्रिएंट्स (नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटाश आदि) तथा माइक्रोन्यूट्रिएंट्स (जिंक, आयरन, बोरॉन आदि) को सही अनुपात, मात्रा, समय और विधि से प्रयोग किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार संतुलित उर्वरीकरण न केवल फसल उत्पादकता बढ़ाने में सहायक है, बल्कि मृदा स्वास्थ्य संरक्षण, पर्यावरण सुरक्षा और दीर्घकालिक कृषि स्थिरता के लिए भी अत्यंत आवश्यक है।

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हरित क्रांति से आत्मनिर्भरता तक का सफर

1960 के दशक में हरित क्रांति ने भारतीय कृषि को नई दिशा दी। धान और गेहूं की उच्च उपज देने वाली किस्मों (HYVs), विस्तारित सिंचाई व्यवस्था और रासायनिक उर्वरकों के व्यापक उपयोग से भारत खाद्यान्न संकट से बाहर निकलकर आत्मनिर्भर राष्ट्र बना। खाद्यान्न उत्पादन में तेज़ वृद्धि से राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई, भूख में उल्लेखनीय कमी आई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली। भारत का यह अनुभव अन्य विकासशील देशों के लिए भी प्रेरणा बना।

बढ़ती उत्पादकता की छिपी चुनौतियां

हालांकि, समय के साथ यह स्पष्ट हुआ कि निरंतर खेती, नाइट्रोजन-प्रधान उर्वरकों पर अत्यधिक निर्भरता और जैविक खादों के घटते उपयोग से मृदा में पोषक तत्वों का असंतुलन उत्पन्न हो गया। इसके परिणामस्वरूप द्वितीयक और सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी, मृदा संरचना में गिरावट, तथा पोषक तत्वों का अपवाह और रिसाव बढ़ा। यह स्थिति फसल वृद्धि, उपज और गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालने लगी।

मृदा स्वास्थ्य पर पड़ता व्यापक असर

विशेषज्ञों के अनुसार मृदा उर्वरता में गिरावट पौधों की चयापचय क्रियाओं को बाधित करती है, कीट एवं रोगों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ाती है और उत्पाद की गुणवत्ता घटाती है। असंतुलित उर्वरीकरण के दुष्परिणाम केवल खेत तक सीमित नहीं रहते, बल्कि जल प्रदूषण, पर्यावरणीय क्षरण और संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को भी बढ़ाते हैं। पोषक तत्वों से वंचित मृदाओं पर उगाई गई फसलों में चारे के लिए आवश्यक खनिजों की कमी पशुधन उत्पादकता को भी प्रभावित करती है।

ICAR के दीर्घकालिक अध्ययन

इन चुनौतियों को समझने और समाधान सुझाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने अखिल भारतीय समन्वित दीर्घकालिक उर्वरक प्रयोग परियोजना (AICRP-LTFE) की शुरुआत की। विभिन्न कृषि-पारिस्थितिक क्षेत्रों में किए गए इन अध्ययनों से यह प्रमाणित हुआ कि तर्कसंगत और संतुलित पोषक तत्व प्रबंधन के बिना उच्च-इनपुट कृषि प्रणाली लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकती।

संतुलित उर्वरीकरण का वैज्ञानिक आधार

संतुलित उर्वरीकरण की अवधारणा जस्टस वॉन लीबिग के “न्यूनतम का नियम” पर आधारित है, जिसके अनुसार फसल की वृद्धि उस पोषक तत्व से सीमित होती है जिसकी उपलब्धता सबसे कम होती है, चाहे अन्य पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में क्यों न हों। यही कारण है कि किसी एक उर्वरक का अत्यधिक प्रयोग समाधान नहीं है, बल्कि सभी आवश्यक पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग अनिवार्य है।

किसानों के लिए बहुआयामी लाभ

संतुलित उर्वरीकरण से फसलें अपनी पूर्ण उत्पादक क्षमता तक पहुँच पाती हैं, जिससे उपज और गुणवत्ता दोनों में सुधार होता है। इससे पोषक तत्व उपयोग दक्षता बढ़ती है, उर्वरक लागत घटती है, मृदा कार्बनिक पदार्थ और जैविक गतिविधि में वृद्धि होती है तथा पर्यावरणीय जोखिम कम होते हैं। यह किसानों के लिए दीर्घकाल में एक लागत-प्रभावी और लाभकारी दृष्टिकोण सिद्ध होता है।

आधुनिक रणनीतियां और नवाचार

आज भारतीय कृषि में एकीकृत पोषक तत्व प्रबंधन (INM), मृदा परीक्षण आधारित अनुशंसाएँ, फसल-विशिष्ट अनुकूलित और फोर्टिफाइड उर्वरक, स्थल-विशिष्ट पोषक तत्व प्रबंधन (SSNM) और पुनर्योजी कृषि जैसी पद्धतियाँ अपनाई जा रही हैं। ये सभी उपाय पोषक तत्वों के सटीक और प्रभावी उपयोग को सुनिश्चित करते हैं।

संतुलित उर्वरीकरण को बढ़ावा देने वाली सरकारी पहल

भारत सरकार मृदा स्वास्थ्य कार्ड योजना, पोषक तत्व आधारित सब्सिडी (NBS), नीम-लेपित यूरिया, पारंपरिक कृषि विकास योजना (PKVY), पीएम-प्रणाम, नैनो उर्वरकों और अनुकूलित/फोर्टिफाइड उर्वरकों के माध्यम से संतुलित उर्वरक उपयोग को प्रोत्साहित कर रही है। इन पहलों का उद्देश्य मृदा स्वास्थ्य बहाल करना, उर्वरक उपयोग दक्षता बढ़ाना और कृषि को पर्यावरण-अनुकूल बनाना है।

सारांश

विशेषज्ञों का मानना है कि संतुलित उर्वरीकरण ही भारतीय कृषि की दीर्घकालिक स्थिरता और उत्पादकता का आधार है। वैज्ञानिक अनुसंधान, तकनीकी नवाचार और किसान-केंद्रित नीतियों के समन्वय से न केवल मृदा स्वास्थ्य सुरक्षित रहेगा, बल्कि आने वाले वर्षों में कृषि क्षेत्र ‘विकसित भारत’ के लक्ष्य को हासिल करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

Source: PIB