बीज संकट से जूझती खेती: बेहतर बीज मौजूद, लेकिन किसानों तक पहुंच अब भी बड़ी चुनौती!

भारत और अफ्रीका में कम बीज प्रतिस्थापन दर से घट रही पैदावार, ICRISAT के मॉडल से दिखी नई उम्मीद!

कृषि क्षेत्र में बीज को उत्पादन और खाद्य सुरक्षा की बुनियाद माना जाता है, लेकिन भारत और अफ्रीका के लाखों किसान आज भी दशकों पुराने बीजों पर निर्भर हैं। बदलते जलवायु परिदृश्य और पोषण जरूरतों के बावजूद उन्नत किस्मों का उपयोग सीमित बना हुआ है, जिससे खेती की उत्पादकता और किसानों की आय पर असर पड़ रहा है।

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पुराने बीज बना रहे हैं खेती को कमजोर!

विशेषज्ञों के अनुसार, कम बीज प्रतिस्थापन दर और नई किस्मों के धीमे प्रसार के कारण किसान हर साल पुराने बीजों का पुन: उपयोग करते हैं। इससे समय के साथ बीज की गुणवत्ता, शुद्धता और उत्पादन क्षमता घटती जाती है।
इसके चलते फसलें नई बीमारियों, कीटों और जलवायु परिवर्तन के दबाव को सहन नहीं कर पातीं और किसानों की जोखिम बढ़ती जाती है।

वैज्ञानिक प्रगति के बावजूद पहुंच में कमी!

आज कृषि विज्ञान में तेजी से प्रगति हुई है। जीनोमिक्स, ब्रीडिंग और जलवायु अनुकूलन के जरिए बेहतर बीज विकसित किए गए हैं।
भारत के सूखा प्रभावित क्षेत्रों में नई पीढ़ी के बाजरा हाइब्रिड 28% तक अधिक उत्पादन दे रहे हैं। वहीं अफ्रीका में बायोफोर्टिफाइड बाजरा किस्मों से आयरन और जिंक की मात्रा बढ़ाकर पोषण सुधारने में मदद मिल रही है।

समस्या ‘उपलब्धता’ नहीं, ‘पहुंच’ की है!

भारत स्थित ICRISAT मुख्यालय में प्रशिक्षण सत्र के दौरान 15 देशों के प्रतिभागी

विशेषज्ञ मानते हैं कि चुनौती बेहतर बीज विकसित करने की नहीं, बल्कि उन्हें तेजी से किसानों तक पहुंचाने की है। इसके लिए मजबूत, वैज्ञानिक और व्यापक बीज वितरण प्रणाली की जरूरत है।

ICRISAT का मॉडल बना उदाहरण!

अंतरराष्ट्रीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) का कार्य इस दिशा में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। यह संस्थान न केवल उन्नत किस्में विकसित करता है, बल्कि उन्हें किसानों तक पहुंचाने के लिए एकीकृत और साक्ष्य-आधारित प्रणाली भी विकसित करता है।
संस्थान के वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं के प्रयासों को वैश्विक स्तर पर भी सराहना मिली है।

मलावी में ‘सीड रिवॉल्विंग फंड’ से बदलाव!

मलावी में ICRISAT के सहयोग से ‘सीड रिवॉल्विंग फंड’ मॉडल ने खेती की तस्वीर बदल दी है। इस मॉडल में बीज एक बार नहीं, बल्कि लगातार चक्र में किसानों तक पहुंचता है।
किसानों को बीज उत्पादन के लिए प्रशिक्षित किया जाता है और उन्हें अनुसंधान संस्थानों से जोड़ा जाता है।

किसानों को मिल रहा स्थिर बाजार और आय!

इस मॉडल के तहत किसानों को अनुबंध के माध्यम से स्थिर बाजार मिलता है, जिससे वे मूल्य अस्थिरता के जोखिम से बचते हैं।
मलावी के एक किसान ने 20 वर्षों में 2,500 टन से अधिक प्रमाणित बीज का उत्पादन किया, जिससे हजारों किसानों को लाभ मिला।

1.5 लाख से अधिक किसानों तक पहुंच!

इस पहल के जरिए मलावी में 1,200 टन से अधिक फाउंडेशन बीज तैयार हुआ और 1.5 लाख से ज्यादा किसानों तक उन्नत बीज पहुंचे। इससे मूंगफली और अरहर जैसी फसलों की पैदावार और किसानों की आय में सुधार हुआ है।

बीज प्रणाली में सभी की भूमिका जरूरी!

विशेषज्ञों के अनुसार, केवल अनुसंधान संस्थान ही इस समस्या का समाधान नहीं कर सकते।
बीज कंपनियों, वितरकों और बाजार से जुड़े सभी पक्षों का सहयोग जरूरी है, ताकि बड़े स्तर पर प्रमाणित बीज का उत्पादन और वितरण हो सके।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ी चुनौती!

जलवायु परिवर्तन के कारण स्थिति और गंभीर हो रही है। पर्यावरण तेजी से बदल रहा है, जबकि नई किस्मों का विकास और उनका प्रसार अपेक्षाकृत धीमा है।
इससे वैज्ञानिक नवाचार और किसानों की वास्तविक जरूरतों के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है।

समाधान: मजबूत प्रणाली और निवेश!

जानकारों का मानना है कि इस अंतर को पाटने के लिए दीर्घकालिक निवेश, संस्थागत मजबूती और किसानों को केंद्र में रखकर योजनाएं बनानी होंगी।
बीज प्रतिस्थापन दर बढ़ाने, नई किस्मों को तेजी से अपनाने और किसान-आधारित बीज उद्यमों को बढ़ावा देना जरूरी है।

भारत और अफ्रीका के लिए बड़ा अवसर!

भारत का विशाल बीज तंत्र यह दिखाता है कि बड़े स्तर पर बदलाव संभव है, लेकिन इसमें गति, गुणवत्ता और समावेशिता बढ़ाने की जरूरत है।
वहीं अफ्रीका में शुरुआत से ही मजबूत और लचीली बीज प्रणाली विकसित करने का अवसर मौजूद है।

निष्कर्ष: बीज ही तय करेंगे खेती का भविष्य!

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले समय में कृषि का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि किसान हर सीजन में कौन से बीज बोते हैं।
ऐसे में मजबूत बीज वितरण प्रणाली में निवेश करना खाद्य सुरक्षा और किसानों की समृद्धि के लिए सबसे प्रभावी कदम साबित हो सकता है।

चित्र: सौजन्य ICRISAT