October 16, 2026 9:52 AM

Krishi Times

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वैज्ञानिक बकरी पालन से आत्मनिर्भर बनेंगी ग्रामीण महिलाएं!

महिला किसान दिवस: वैज्ञानिक बकरी पालन से आत्मनिर्भर बन रहीं ग्रामीण महिलाएं, सीआईआरजी ने दिया तकनीकी मार्गदर्शन

मथुरा में केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान में आयोजित कार्यक्रम में महिला पशुपालकों ने साझा किए अनुभव; बेहतर पोषण, स्वास्थ्य प्रबंधन और बकरी के दूध से मूल्यवर्धित उत्पाद बनाने पर जोर

मथुरा, उत्तर प्रदेश। ग्रामीण महिलाओं की आय बढ़ाने और उन्हें स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने में बकरी पालन महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। वैज्ञानिक तकनीकों, बेहतर पशु प्रबंधन और बाजार की जरूरतों के अनुरूप उत्पाद तैयार करने से यह गतिविधि छोटे और सीमांत परिवारों के लिए आजीविका का मजबूत आधार बन सकती है। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भा.कृ.अ.प.) के केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (सीआईआरजी), मखदूम, मथुरा में महिला किसान दिवस के अवसर पर एक कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में विभिन्न जिलों से पहुंचीं महिला पशुपालकों ने बकरी पालन से जुड़े अपने अनुभव, उपलब्धियां और व्यावहारिक समस्याएं साझा कीं। संस्थान का उद्देश्य महिलाओं को वैज्ञानिक बकरी पालन के प्रति प्रोत्साहित करना, उनकी तकनीकी जानकारी बढ़ाना और पशुपालन को आय एवं आर्थिक आत्मनिर्भरता का प्रभावी माध्यम बनाने के अवसरों से परिचित कराना था।

वैज्ञानिक बकरी पालन से बढ़ सकती है आमदनी

कार्यक्रम की अध्यक्षता संस्थान के निदेशक डॉ. मनीष कुमार चेटली ने की। उन्होंने महिला पशुपालकों की उपलब्धियों की सराहना करते हुए ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका और उनकी आजीविका को मजबूत बनाने में वैज्ञानिक बकरी पालन के महत्व पर जोर दिया।

कार्यक्रम में शामिल महिलाओं ने बताया कि संस्थान के अनुसंधान, प्रशिक्षण और प्रसार गतिविधियों से मिली जानकारी ने उन्हें बकरी पालन की बेहतर पद्धतियां अपनाने के लिए प्रेरित किया। उनके अनुभवों से यह बात सामने आई कि सही तकनीकी मार्गदर्शन मिलने पर बकरी पालन ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वरोजगार और नियमित आय के अवसर विकसित करने में मददगार हो सकता है।

बकरी पालन की सफलता केवल पशुओं की संख्या बढ़ाने पर निर्भर नहीं करती। पशुओं की नस्ल और प्रजनन का उचित चयन, संतुलित आहार, स्वच्छ आवास, समय पर टीकाकरण तथा रोगों की रोकथाम जैसे उपाय उत्पादन और लाभप्रदता को प्रभावित करते हैं। इसलिए छोटे स्तर पर बकरी पालन करने वाले परिवारों के लिए भी वैज्ञानिक जानकारी का महत्व बढ़ जाता है।

किसान-वैज्ञानिक संवाद में उठीं व्यावहारिक समस्याएं

कार्यक्रम के दौरान आयोजित किसान-वैज्ञानिक संवाद में महिला पशुपालकों ने बकरियों के रखरखाव, पोषण, स्वास्थ्य और प्रबंधन से संबंधित समस्याएं वैज्ञानिकों के सामने रखीं। वैज्ञानिकों ने इन सवालों पर चर्चा की और बेहतर प्रबंधन पद्धतियों के बारे में जानकारी देते हुए प्रतिभागियों की शंकाओं का समाधान किया।

इस तरह के संवाद का महत्व इसलिए भी है क्योंकि पशुपालकों को अपने क्षेत्र में चारे की उपलब्धता, पशुओं के स्वास्थ्य, मौसम में बदलाव और देखभाल की लागत जैसी अलग-अलग चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तकनीकी सलाह मिलने से पशुपालकों को निर्णय लेने और नुकसान की आशंका कम करने में मदद मिल सकती है।

पशु आवास से लेकर पोषण प्रबंधन तक मिली जानकारी

कार्यक्रम के अंतर्गत महिला पशुपालकों को संस्थान के विभिन्न पशु शेडों का भ्रमण कराया गया। इस दौरान उन्हें बकरियों के आवास, रखरखाव और वैज्ञानिक प्रबंधन की जानकारी दी गई। पशुओं के लिए स्वच्छ, सुरक्षित और उपयुक्त आवास उनकी सेहत बनाए रखने तथा रोगों के जोखिम को कम करने में महत्वपूर्ण माना जाता है।

महिलाओं ने संस्थान की फीड एवं चारा निर्माण इकाई का भी भ्रमण किया, जहां उन्हें संतुलित आहार और पोषण प्रबंधन के बारे में बताया गया। बकरियों की उम्र, शारीरिक अवस्था और उत्पादन संबंधी जरूरतों के अनुसार आहार की व्यवस्था करना उनके विकास और उत्पादकता के लिए जरूरी है। पर्याप्त पोषण से पशुओं के स्वास्थ्य, प्रजनन क्षमता और उत्पादन संबंधी प्रदर्शन को बेहतर बनाने में सहायता मिल सकती है।

बकरी के दूध से मूल्यवर्धित उत्पादों की संभावनाएं

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण हिस्सा संस्थान की जीपीटी प्रयोगशाला का भ्रमण रहा। यहां महिला पशुपालकों को बकरी के दूध से विभिन्न मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने की प्रक्रिया और उनसे जुड़ी संभावनाओं की जानकारी दी गई।

पारंपरिक पशुपालन को उद्यमिता से जोड़ने के लिए केवल कच्चे दूध या जीवित पशुओं की बिक्री पर निर्भर रहने के बजाय प्रसंस्करण, उत्पाद विविधीकरण और बाजार से जुड़ाव पर भी ध्यान देना जरूरी है। हालांकि, ऐसे उत्पादों का व्यावसायिक उत्पादन शुरू करने से पहले गुणवत्ता, स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा मानकों, लागत और स्थानीय बाजार की मांग का आकलन करना आवश्यक है।

यदि महिला पशुपालकों को तकनीकी प्रशिक्षण के साथ उत्पाद निर्माण, पैकेजिंग, विपणन और वित्तीय प्रबंधन की जानकारी भी मिले, तो बकरी पालन आधारित छोटे उद्यमों के विकास की संभावनाएं मजबूत हो सकती हैं।

प्रशिक्षण और तकनीकी सहयोग से मजबूत होगी महिला उद्यमिता

ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की आर्थिक भागीदारी बढ़ाने के लिए पशुपालन एक उपयोगी माध्यम है। बकरी पालन में अपेक्षाकृत छोटे स्तर से शुरुआत करने की संभावना इसे अनेक ग्रामीण परिवारों के लिए आकर्षक बनाती है। फिर भी, लाभप्रदता सुनिश्चित करने के लिए पशुओं की उचित देखभाल, रोग नियंत्रण, चारे की लागत, बाजार तक पहुंच और उपलब्ध संसाधनों का सही आकलन आवश्यक है।

केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान प्रशिक्षण, क्षमता विकास और वैज्ञानिक तकनीकों के प्रसार के माध्यम से महिला पशुपालकों को बेहतर पद्धतियां अपनाने के लिए प्रोत्साहित कर रहा है। संस्थान में आयोजित महिला किसान दिवस कार्यक्रम ने वैज्ञानिकों और पशुपालकों के बीच संवाद बढ़ाने तथा महिलाओं के अनुभवों को साझा करने का अवसर प्रदान किया।

कार्यक्रम का समन्वय डॉ. अनुपम कृष्ण दीक्षित, प्रधान वैज्ञानिक, डॉ. नितिका शर्मा, प्रधान वैज्ञानिक और डॉ. चेतना गंगवार, वरिष्ठ वैज्ञानिक ने किया।

महिला किसान दिवस पर आयोजित यह पहल इस बात को रेखांकित करती है कि ग्रामीण महिलाओं को वैज्ञानिक ज्ञान, व्यावहारिक प्रशिक्षण और उद्यमिता संबंधी सहयोग उपलब्ध कराकर बकरी पालन को अधिक व्यवस्थित एवं लाभकारी बनाया जा सकता है। पशुपालन को आजीविका से आगे बढ़ाकर ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित करने में महिलाओं की भागीदारी और उनकी तकनीकी क्षमता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सारांश:

महिला पशुपालकों के आर्थिक सशक्तीकरण के लिए वैज्ञानिक प्रशिक्षण के साथ बाजार संपर्क, पशु स्वास्थ्य सेवाओं, गुणवत्तापूर्ण चारे और मूल्यवर्धन की सुविधाओं तक पहुंच भी जरूरी है। इन पहलुओं पर समन्वित प्रयास बकरी पालन को ग्रामीण महिलाओं के लिए टिकाऊ आजीविका और स्वरोजगार का बेहतर विकल्प बनाने में मदद कर सकते हैं।