October 10, 2026 1:09 AM

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भारतीय डेयरी मॉडल की ग्लोबल पहचान!

छोटे किसानों की समृद्धि के लिए भारतीय सहकारी डेयरी मॉडल दूसरे देशों के लिए उपयोगी: डॉ. मीनेश शाह

IFAD के उच्चस्तरीय संवाद में NDDB अध्यक्ष ने साझा किया भारत का अनुभव, छोटे पशुपालकों की आय, बाजार तक पहुंच और डिजिटल पशुधन प्रबंधन पर दिया जोर

नई दिल्ली। भारत का सहकारी डेयरी मॉडल छोटे किसानों और पशुपालकों की आर्थिक स्थिति मजबूत करने के साथ-साथ ग्रामीण आजीविका और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। इस मॉडल को समान परिस्थितियों वाले अन्य विकासशील देशों में भी स्थानीय जरूरतों के अनुरूप अपनाया जा सकता है। राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के अध्यक्ष डॉ. मीनेश शाह ने नई दिल्ली स्थित संयुक्त राष्ट्र भवन (UN House) में आयोजित एक उच्चस्तरीय संवाद के दौरान यह बात कही।

अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) की ओर से आयोजित ‘डायलॉग ऑन स्मॉलहोल्डर प्रायोरिटीज एंड ऑपर्च्युनिटीज फॉर साउथ-साउथ कोऑपरेशन’ में डॉ. शाह ने पैनलिस्ट के रूप में भाग लिया। यह कार्यक्रम IFAD के अध्यक्ष अल्वारो लारियो की भारत यात्रा के दौरान आयोजित किया गया। संवाद का उद्देश्य छोटे किसानों की प्राथमिकताओं, ग्रामीण विकास की चुनौतियों और विकासशील देशों के बीच कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र में सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा करना था।

भारत के डेयरी सहकारी मॉडल की ग्लोबल उपयोगिता

संवाद में डॉ. मीनेश शाह ने कहा कि भारत का सहकारी डेयरी मॉडल उन देशों के लिए उपयोगी साबित हो सकता है, जहां बड़ी संख्या में छोटे और सीमांत किसान पशुपालन के माध्यम से अपनी आजीविका चलाते हैं। भारत में डेयरी क्षेत्र लगभग आठ करोड़ ग्रामीण परिवारों की आजीविका और खाद्य सुरक्षा को समर्थन देता है। यह क्षेत्र ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देने, रोजगार के अवसर पैदा करने और परिवारों को नियमित आय उपलब्ध कराने में भी महत्वपूर्ण योगदान देता है।

उन्होंने बताया कि भारतीय सहकारी डेयरी व्यवस्था की प्रमुख विशेषताओं में छोटे दुग्ध उत्पादकों को संगठित करना, उनके लिए दूध की नियमित खरीद और बाजार तक पहुंच सुनिश्चित करना तथा किसानों के स्वामित्व वाली संस्थाओं को मजबूत बनाना शामिल है। इस व्यवस्था के माध्यम से उत्पादकों को संगठित बाजार से जोड़ने और दूध की बिक्री से होने वाले मूल्य का बड़ा हिस्सा किसानों तक पहुंचाने का प्रयास किया जाता है।

डॉ. शाह के अनुसार, सहकारी डेयरी मॉडल में उपभोक्ता द्वारा दूध के लिए खर्च की गई राशि का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा दुग्ध उत्पादकों तक पहुंचता है। इससे किसानों को उनके उत्पादन का बेहतर आर्थिक लाभ दिलाने और बिचौलियों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलती है।

छोटे पशुपालकों को बाजार और तकनीक से जोड़ना जरूरी

डॉ. शाह ने कहा कि छोटे पशुपालकों की आय बढ़ाने के लिए केवल दूध उत्पादन में वृद्धि पर्याप्त नहीं है। इसके साथ ही दूध की खरीद, संग्रहण, प्रसंस्करण, विपणन और भुगतान की व्यवस्था को मजबूत करना भी आवश्यक है। किसान-स्वामित्व वाली संस्थाएं इन गतिविधियों को व्यवस्थित करके छोटे उत्पादकों को बाजार में बेहतर अवसर उपलब्ध करा सकती हैं।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि तकनीक का लाभ गांवों में अंतिम स्तर तक पहुंचना चाहिए। डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से पशुधन से संबंधित जानकारी और गतिविधियों का रिकॉर्ड तैयार करने से प्रबंधन, निगरानी और सेवाओं की उपलब्धता में सुधार की संभावनाएं बढ़ती हैं।

इस संदर्भ में उन्होंने राष्ट्रीय डिजिटल पशुधन मिशन का उल्लेख किया। इसके तहत पशुओं को डिजिटल पहचान और रिकॉर्ड व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में काम किया जा रहा है, जिससे पशुधन से संबंधित गतिविधियों का व्यवस्थित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करने में सहायता मिल सकती है। ऐसी व्यवस्थाएं भविष्य में पशु स्वास्थ्य सेवाओं, उत्पादकता प्रबंधन और पशुपालकों तक लक्षित सुविधाएं पहुंचाने में उपयोगी हो सकती हैं।

दूसरे देशों में मॉडल अपनाने के लिए स्थानीय जरूरतों का आकलन जरूरी

डॉ. मीनेश शाह ने स्पष्ट किया कि भारत के सफल अनुभवों को अन्य देशों के साथ साझा किया जा सकता है, लेकिन किसी भी मॉडल को पूरी तरह उसी रूप में दूसरे देश में लागू करना व्यावहारिक नहीं होगा। प्रत्येक देश की कृषि व्यवस्था, पशुधन संसाधन, बाजार संरचना, नीतिगत परिस्थितियां और किसानों की जरूरतें अलग-अलग होती हैं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप सहकारी संस्थाओं और डेयरी विकास की रणनीति तैयार करना जरूरी है।

उन्होंने सुझाव दिया कि IFAD और संबंधित साझेदार देश मिलकर सबसे पहले अपनी जरूरतों और मौजूदा व्यवस्थाओं का आकलन करें। इसके बाद सहयोग की संभावनाओं, संस्थागत कमियों, मांग और भागीदारी की इच्छा की पहचान करते हुए उपयुक्त कार्ययोजना तैयार की जाए।

डॉ. शाह ने छोटे स्तर पर प्रायोगिक परियोजनाएं शुरू करने का सुझाव भी दिया। इन परियोजनाओं के परिणामों का मूल्यांकन करने के बाद सफल मॉडलों को व्यापक स्तर पर लागू किया जा सकता है। इससे संसाधनों का बेहतर उपयोग करने और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप प्रभावी व्यवस्था विकसित करने में मदद मिलेगी।

NDDB ने सहयोग, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन की पेशकश की

डॉ. शाह ने आश्वासन दिया कि NDDB ऐसे देशों को डेयरी सहकारी संस्थाओं के विकास, मॉडल तैयार करने, प्रशिक्षण देने और कार्यान्वयन के दौरान मार्गदर्शन उपलब्ध कराने में सहयोग करने के लिए तैयार है। यह सहयोग संबंधित देशों की आवश्यकताओं और परिस्थितियों के अनुसार विकसित किया जा सकता है।

उन्होंने संकेत दिया कि भारत का अनुभव केवल दूध उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि छोटे उत्पादकों को संगठित करने, किसान-स्वामित्व वाली संस्थाओं को मजबूत बनाने और बाजार के साथ उनका स्थायी संबंध विकसित करने में भी उपयोगी है।

विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने लिया भाग

इस उच्चस्तरीय संवाद का संचालन IFAD इंडिया के कंट्री डायरेक्टर जेम्स मार्क डी सूजा शील्ड्स ने किया। कार्यक्रम में वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग की निदेशक एस. दिव्यदर्शिनी, NABARD के अध्यक्ष शाजी के.वी., ICRISAT के डॉ. शालेंद्र कुमार, नई दिल्ली स्थित RIS के महानिदेशक डॉ. सचिन कुमार शर्मा तथा भारत में संयुक्त राष्ट्र के रेजिडेंट कोऑर्डिनेटर स्टीफन प्रिसनर सहित विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

कार्यक्रम में छोटे किसानों की आजीविका को मजबूत बनाने, कृषि एवं पशुपालन आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने और विकासशील देशों के बीच ज्ञान तथा संस्थागत अनुभव साझा करने के अवसरों पर चर्चा हुई।

भारत के सहकारी डेयरी मॉडल का अनुभव यह दर्शाता है कि छोटे उत्पादकों को संगठित संस्थागत ढांचे, सुनिश्चित बाजार, तकनीकी सहायता और बेहतर प्रबंधन से जोड़कर ग्रामीण आय को मजबूत किया जा सकता है। यदि इन अनुभवों को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप अपनाया जाए, तो दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से अन्य देशों में भी छोटे किसानों और पशुपालकों के लिए नए अवसर विकसित किए जा सकते हैं।