रबी सीजन में दलहनी फसलों की पैदावार बढ़ाने पर जोर, चार राज्यों के कृषि अधिकारियों और वैज्ञानिकों ने साझा की तकनीक!
आईसीएआर के ऑनलाइन प्रशिक्षण में उन्नत किस्मों, जलवायु अनुकूल खेती, कीट-रोग प्रबंधन और धान के खाली खेतों में दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने पर चर्चा
कानपुर/हैदराबाद, –रबी सीजन में दलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने, किसानों तक उन्नत कृषि तकनीकों को पहुंचाने और देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों ने संयुक्त रूप से ऑनलाइन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। 9 अक्टूबर 2026 को आयोजित इस कार्यक्रम में आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु और केंद्रशासित प्रदेश पुडुचेरी में दलहन उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक सलाह, उन्नत किस्मों और बेहतर फसल प्रबंधन तकनीकों के प्रसार पर जोर दिया गया।
यह कार्यक्रम राष्ट्रीय दलहन मिशन के तहत आयोजित किया गया। इसका आयोजन भारतीय दलहन अनुसंधान संस्थान (ICAR-IIPR), कानपुर, आईसीएआर-आईआईपीआर के क्षेत्रीय केंद्र, धारवाड़ और कृषि प्रौद्योगिकी अनुप्रयोग अनुसंधान संस्थान (ICAR-ATARI), हैदराबाद ने संयुक्त रूप से किया। इसमें कृषि विज्ञान केंद्रों (KVKs), कृषि विश्वविद्यालयों और राज्य कृषि विभागों के अधिकारियों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया।
उत्पादकता का अंतर कम करने पर जोर
आईसीएआर-आईआईपीआर, कानपुर के निदेशक डॉ. जी. पी. दीक्षित ने कहा कि दलहनी फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के लिए जिलों के बीच मौजूद उत्पादन अंतर को कम करना आवश्यक है। इसके लिए किसानों को उन्नत किस्मों, अनुशंसित कृषि पद्धतियों और कम लागत वाले जैव उर्वरकों के उपयोग के बारे में प्रभावी ढंग से जागरूक करना होगा।
उन्होंने क्लस्टर फ्रंटलाइन प्रदर्शन (CFLDs) को किसानों तक नई तकनीक पहुंचाने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। इन प्रदर्शनों के जरिए किसानों को खेतों में उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक खेती के तरीकों का व्यावहारिक अनुभव मिलता है। इससे किसानों को पारंपरिक पद्धतियों और वैज्ञानिक अनुशंसाओं के परिणामों को समझने में मदद मिल सकती है।
दलहनी फसलों में उन्नत बीज, उचित बुवाई प्रबंधन, संतुलित पोषण और समय पर कीट-रोग नियंत्रण जैसे उपाय उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, इन तकनीकों का लाभ लेने के लिए स्थानीय मिट्टी, मौसम और सिंचाई की उपलब्धता के अनुसार कृषि सलाह अपनाना जरूरी है।
जलवायु अनुकूल किस्मों और फसल प्रबंधन पर विशेष ध्यान
आईसीएआर-एटीएआरआई, हैदराबाद के निदेशक डॉ. शैक एन. मीरा ने जलवायु परिवर्तन की परिस्थितियों में दलहन उत्पादन को स्थिर बनाए रखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने जलवायु अनुकूल किस्मों को बढ़ावा देने, कीट एवं रोग प्रबंधन में सुधार करने और फसल की मध्यावधि समीक्षा को प्रभावी बनाने पर जोर दिया।
उन्होंने धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों यानी राइस-फैलो क्षेत्रों में दलहनी फसलों की खेती को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता भी रेखांकित की। ऐसे क्षेत्रों में स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप दलहन उत्पादन अपनाने से उपलब्ध कृषि भूमि का बेहतर उपयोग किया जा सकता है और किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर विकसित हो सकते हैं।
धान के बाद दलहन की खेती विशेष रूप से उन क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है, जहां फसल चक्र, नमी और उपलब्ध समय के अनुसार उपयुक्त किस्मों का चयन किया जाए। इसके लिए कम अवधि में तैयार होने वाली किस्मों, नमी संरक्षण और समय पर बुवाई जैसी तकनीकों पर ध्यान देना आवश्यक है।
उन्नत किस्मों से लेकर कीट-रोग नियंत्रण तक की जानकारी
प्रशिक्षण के दौरान आईसीएआर-आईआईपीआर के वैज्ञानिकों ने रबी सीजन में उगाई जाने वाली प्रमुख दलहनी फसलों की उन्नत एवं अधिक उपज देने वाली किस्मों, उत्पादन तकनीकों और कृषि संबंधी सलाह पर तकनीकी प्रस्तुतियां दीं।
वैज्ञानिकों ने फसलों को प्रभावित करने वाले प्रमुख कीटों और रोगों की पहचान तथा उनके प्रबंधन से जुड़े उपायों की जानकारी भी साझा की। इसका उद्देश्य कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य कृषि विभागों के अधिकारियों को नवीनतम तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराना था, ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में किसानों को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप सलाह दे सकें।
दलहन की खेती में समय पर बुवाई, प्रमाणित बीजों का उपयोग, उचित पौध संख्या, संतुलित उर्वरक प्रबंधन और समेकित कीट प्रबंधन जैसी गतिविधियां महत्वपूर्ण हैं। इसके साथ ही जैव उर्वरकों का उचित उपयोग मिट्टी की उर्वरता और पोषक तत्वों की उपलब्धता बेहतर बनाने में सहायक हो सकता है।
कृषि विज्ञान केंद्रों के जरिए किसानों तक पहुंचेगी तकनीक
कार्यक्रम में 126 से अधिक प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। इनमें कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और राज्य कृषि विभागों के अधिकारी शामिल थे। आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु के कृषि विभागों से उप निदेशक और संयुक्त निदेशक स्तर के अधिकारियों ने भी भागीदारी की।
प्रशिक्षण में वैज्ञानिक संस्थानों, कृषि विश्वविद्यालयों और राज्य सरकार के विभागों के बीच समन्वय मजबूत करने पर जोर दिया गया। कृषि विज्ञान केंद्र इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि वे वैज्ञानिकों की अनुशंसाओं को किसानों तक पहुंचाने, खेतों में प्रदर्शन आयोजित करने और स्थानीय समस्याओं के समाधान में सहायता करते हैं।
दलहन आत्मनिर्भरता के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
भारत में दलहन फसलें किसानों की आय, मिट्टी की सेहत और खाद्य सुरक्षा के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं। चना, मसूर, मटर और अन्य दलहनी फसलें प्रोटीन का प्रमुख स्रोत हैं। इनमें से कई फसलें अपनी जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणुओं की मदद से वायुमंडलीय नाइट्रोजन का स्थिरीकरण भी करती हैं, जिससे फसल प्रणाली और मिट्टी की उर्वरता को लाभ मिल सकता है।
देश में दलहन पैदावार बढ़ाने के लिए केवल उन्नत बीज उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं है। किसानों को समय पर बीज, वैज्ञानिक सलाह, कीट-रोग नियंत्रण, बाजार की जानकारी और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल तकनीक भी उपलब्ध करानी होगी। रबी सीजन में खाली खेतों का उपयोग, फसल विविधीकरण और बेहतर कृषि प्रबंधन इस दिशा में उपयोगी साबित हो सकते हैं।
राष्ट्रीय दलहन मिशन के अंतर्गत आयोजित यह प्रशिक्षण कार्यक्रम वैज्ञानिक अनुसंधान और खेत स्तर पर तकनीक के प्रसार के बीच समन्वय मजबूत करने की पहल है। इसका वास्तविक लाभ इस बात पर निर्भर करेगा कि प्रशिक्षण में साझा की गई तकनीकों को राज्यों के कृषि विभाग और कृषि विज्ञान केंद्र कितनी प्रभावी तरीके से किसानों तक पहुंचाते हैं।
कृषि क्षेत्र के लिए संदेश:
रबी सीजन में दलहन पैदावार बढ़ाने के लिए उन्नत किस्मों, जलवायु अनुकूल खेती, वैज्ञानिक फसल प्रबंधन और संस्थागत समन्वय को एक साथ आगे बढ़ाना जरूरी है। इससे किसानों को बेहतर उत्पादन के अवसर मिल सकते हैं और देश की दलहन आत्मनिर्भरता के लक्ष्य को मजबूती मिल सकती है।





























