October 8, 2026 12:54 AM

Krishi Times

Archive story

नई दिल्ली में कृषि शोध के भविष्य पर ग्लोबल मंथन!

भारत की कृषि प्राथमिकताओं के अनुरूप CGIAR के शोध और नवाचार को नई दिशा, नई दिल्ली में हुई पहली कंट्री पोर्टफोलियो कोऑर्डिनेशन बैठक

राष्ट्रीय कृषि लक्ष्यों के साथ बेहतर तालमेल, जलवायु-स्मार्ट खेती और नवाचार आधारित कृषि विकास पर जोर

नई दिल्ली, – भारत की कृषि व्यवस्था को अधिक टिकाऊ, उत्पादक और भविष्य की चुनौतियों के अनुरूप बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल के तहत भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के राष्ट्रीय कृषि विज्ञान परिसर (NASC), नई दिल्ली में पहली CGIAR कंट्री पोर्टफोलियो कोऑर्डिनेशन–इंडिया बैठक आयोजित की गई। इस बैठक में CGIAR के विभिन्न अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान केंद्रों और कार्यक्रमों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया तथा भारत में संचालित कृषि अनुसंधान, नवाचार और विकास कार्यक्रमों को एकीकृत दृष्टिकोण से आगे बढ़ाने की रणनीति पर चर्चा की।

विशेषज्ञों का मानना है कि भारत जैसे विशाल कृषि प्रधान देश में जलवायु परिवर्तन, घटते प्राकृतिक संसाधन, बढ़ती खाद्य मांग और किसानों की आय बढ़ाने जैसी चुनौतियों का समाधान केवल समन्वित शोध और नवाचारों के माध्यम से ही संभव है। इसी उद्देश्य से CGIAR के विभिन्न केंद्रों को एक मंच पर लाकर उनकी गतिविधियों को राष्ट्रीय कृषि प्राथमिकताओं के अनुरूप ढालने का प्रयास किया जा रहा है।

क्या है CGIAR और क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल

CGIAR दुनिया का प्रमुख ग्लोबल कृषि अनुसंधान नेटवर्क है, जो खाद्य सुरक्षा, पोषण, जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन और टिकाऊ कृषि विकास के क्षेत्रों में कार्य करता है। इसके अंतर्गत कई अंतरराष्ट्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान कार्यरत हैं, जिनके शोध का लाभ दुनिया भर के किसानों तक पहुंचता है।

भारत लंबे समय से CGIAR संस्थानों के साथ कृषि अनुसंधान और तकनीकी विकास के क्षेत्र में सहयोग करता रहा है। नई पहल का उद्देश्य देश में चल रहे विभिन्न शोध कार्यक्रमों को एक साझा रणनीति के तहत संचालित करना है, ताकि किसानों और कृषि क्षेत्र को अधिक प्रभावी परिणाम मिल सकें।

राष्ट्रीय कृषि प्राथमिकताओं के अनुरूप शोध को बनाने पर जोर

बैठक की अध्यक्षता कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग (DARE) के सचिव तथा आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट ने की। उन्होंने कहा कि भारत की कृषि व्यवस्था तेजी से बदल रही है और इसके सामने नई चुनौतियां भी उभर रही हैं। ऐसे में जरूरी है कि CGIAR और राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा प्रणाली (NARES) मिलकर एक साझा दृष्टिकोण के साथ कार्य करें।

उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने, कृषि उत्पादकता बढ़ाने, पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने और किसानों की आय में वृद्धि के लिए वैज्ञानिक संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है। उन्होंने CGIAR के विभिन्न केंद्रों को राष्ट्रीय प्राथमिकताओं के अनुरूप अनुसंधान कार्यक्रमों को और अधिक मजबूत बनाने का सुझाव दिया।

अनुसंधान और निवेश की कमियों की पहचान पर चर्चा

बैठक का एक प्रमुख उद्देश्य भारत में CGIAR के वर्तमान कार्यों की समीक्षा करना और यह देखना था कि किन क्षेत्रों में अभी और निवेश तथा शोध की आवश्यकता है। चर्चा के दौरान कृषि जैव विविधता संरक्षण, जल संसाधन प्रबंधन, प्राकृतिक खेती, जलवायु-स्मार्ट कृषि, डिजिटल कृषि और छोटे किसानों की आजीविका सुधार जैसे विषय प्रमुख रूप से सामने आए।

विशेषज्ञों ने इस बात पर बल दिया कि सीमांत और छोटे किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों की पहुंच बढ़ाने के लिए अनुसंधान को अधिक व्यवहारिक और क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुरूप बनाना होगा।

दक्षिण-दक्षिण सहयोग की संभावनाओं पर भी हुआ विचार

बैठक में भारत की बढ़ती वैश्विक भूमिका को देखते हुए South-South Cooperation (दक्षिण-दक्षिण सहयोग) पर भी चर्चा हुई। विशेषज्ञों ने कहा कि भारत ने कृषि, डेयरी, बीज विकास, डिजिटल तकनीक और जल प्रबंधन के क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। इन अनुभवों को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के विकासशील देशों के साथ साझा किया जा सकता है।

इस तरह का सहयोग न केवल वैश्विक खाद्य सुरक्षा को मजबूत करेगा बल्कि भारतीय कृषि विज्ञान और तकनीक को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान भी दिलाएगा।

राष्ट्रीय संस्थानों के साथ साझेदारी मजबूत करने पर जो

बैठक में इस बात पर सहमति बनी कि CGIAR के केंद्रों और भारत के कृषि विश्वविद्यालयों, आईसीएआर संस्थानों, राज्य कृषि विभागों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) और निजी क्षेत्र के बीच सहयोग को और अधिक मजबूत किया जाए।

विशेषज्ञों ने कहा कि जब तक अनुसंधान प्रयोगशालाओं से निकलकर खेतों तक नहीं पहुंचेगा, तब तक उसका वास्तविक लाभ किसानों को नहीं मिल सकेगा। इसलिए शोध संस्थानों और जमीनी स्तर पर कार्य करने वाले संगठनों के बीच बेहतर समन्वय आवश्यक है।

डॉ. शालेंद्र कुमार निभाएंगे समन्वय की महत्वपूर्ण भूमिका

आईसीआरिसैट (ICRISAT) के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शालेंद्र कुमार को भारत के लिए CGIAR कंट्री पोर्टफोलियो कोऑर्डिनेशन लीड की जिम्मेदारी सौंपी गई है। उनका कार्य विभिन्न CGIAR केंद्रों और कार्यक्रमों को एक मंच पर लाकर देश की कृषि आवश्यकताओं के अनुरूप एक सशक्त और प्रभावी शोध एवं नवाचार पोर्टफोलियो तैयार करना होगा।

उनकी अगुवाई में CGIAR के विभिन्न संस्थानों के बीच सहयोग बढ़ेगा और कृषि विकास से जुड़े कार्यक्रमों की प्रभावशीलता में सुधार होगा।

ग्लोबल वैज्ञानिक नेतृत्व ने दिए रणनीतिक सुझाव

बैठक में CGIAR की मुख्य वैज्ञानिक डॉ. सैंड्रा मिलाच ने समन्वय तंत्र और वैश्विक कृषि अनुसंधान की दिशा पर रणनीतिक मार्गदर्शन दिया। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में कृषि क्षेत्र कई जटिल चुनौतियों का सामना कर रहा है, जिनके समाधान के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा नवाचार बेहद महत्वपूर्ण हैं।

वहीं आईसीआरिसैट के उप महानिदेशक (रिसर्च एंड इनोवेशन) डॉ. स्टैनफोर्ड ब्लेड भी वर्चुअल माध्यम से बैठक में शामिल हुए। उन्होंने CGIAR केंद्रों के बीच ज्ञान साझा करने और अनुसंधान परिणामों को तेजी से किसानों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर बल दिया।

जलवायु परिवर्तन और खाद्य सुरक्षा पर रहेगा विशेष फोकस

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में भारत की कृषि नीति में जलवायु परिवर्तन अनुकूलन, कार्बन-स्मार्ट खेती, जल संरक्षण, पौष्टिक फसलों का विकास और डिजिटल कृषि समाधानों की भूमिका बढ़ेगी। CGIAR और भारतीय संस्थानों के बीच बढ़ता सहयोग इन क्षेत्रों में नए शोध और तकनीकी समाधान विकसित करने में मदद करेगा।

इससे किसानों को मौसम संबंधी जोखिमों से निपटने, लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने में सहायता मिलेगी।

कृषि क्षेत्र के लिए नई संभावनाओं का संकेत

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार यह बैठक केवल एक औपचारिक समन्वय बैठक नहीं थी, बल्कि भारत की कृषि अनुसंधान प्रणाली को वैश्विक वैज्ञानिक नेटवर्क के साथ और अधिक प्रभावी ढंग से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। इससे कृषि अनुसंधान में दोहराव कम होगा, संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा और किसानों की जरूरतों के अनुरूप नई तकनीकों के विकास को गति मिलेगी।

भारत की कृषि को अधिक प्रतिस्पर्धी, टिकाऊ और समावेशी बनाने की दिशा में CGIAR और आईसीएआर का यह संयुक्त प्रयास आने वाले वर्षों में कृषि विकास की नई संभावनाओं का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।