October 9, 2026 3:21 AM

Krishi Times

Archive story

मरुस्थल में खेती बचाने का उपाय: वर्षाजल प्रबंधन!

वर्षाजल संरक्षण से बदलेगी शुष्क क्षेत्रों की खेती, पोकरण में किसानों को दिया गया प्रशिक्षण

पोकरण (जैसलमेर)। राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्रों में जल संकट और अनिश्चित वर्षा किसानों के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। ऐसे में वर्षाजल का संरक्षण और उसका वैज्ञानिक उपयोग खेती को अधिक लाभकारी और टिकाऊ बना सकता है। इसी उद्देश्य से कृषि विज्ञान केन्द्र (केवीके), पोकरण में ग्रामीण विकास विज्ञान समिति (ग्राविस) के उपकेंद्र सांकड़ा द्वारा संचालित एसएबीएल परियोजना तथा यूरोपीय यूनियन के सहयोग से “वर्षाजल प्रबंधन एवं शुष्क भूमि कृषि” विषय पर एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया।

कार्यक्रम में खैतासर और माधोपुरा गांवों के किसान एवं महिला कृषकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। प्रशिक्षण का मुख्य उद्देश्य ग्रामीण समुदायों में जल सुरक्षा को मजबूत करना तथा वर्षा आधारित खेती की उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध कराना था।

कम वर्षा वाले क्षेत्रों में जल संरक्षण की बढ़ी अहमियत

कृषि विज्ञान केन्द्र, पोकरण के वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं अध्यक्ष डॉ. दशरथ प्रसाद ने बताया कि जैसलमेर देश के सबसे कम वर्षा वाले जिलों में शामिल है। ऐसे क्षेत्रों में प्रत्येक बूंद पानी का संरक्षण कृषि की स्थिरता और किसानों की आय बढ़ाने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कहा कि वर्षाजल संग्रहण, संरक्षण और उसका कुशल प्रबंधन अपनाकर किसान सूखे की परिस्थितियों से बेहतर तरीके से मुकाबला कर सकते हैं। किसानों को जल संरक्षण से जुड़ी विभिन्न सरकारी योजनाओं का लाभ लेने तथा सामुदायिक जल संरचनाओं के निर्माण एवं संरक्षण में सक्रिय भागीदारी करने की सलाह दी गई।

भूजल पुनर्भरण और रबी फसलों को मिलेगा लाभ

डॉ. प्रसाद ने बताया कि खेतों में जल संरक्षण संरचनाओं के निर्माण से भूजल स्तर में सुधार हो सकता है, जिससे रबी मौसम में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता बढ़ेगी। उन्होंने किसानों को मेड़बंदी, फार्म पोंड, रूफटॉप रेन वाटर हार्वेस्टिंग और सामुदायिक जल संरचनाओं के विकास की तकनीकी जानकारी दी।

साथ ही उन्होंने शुष्क क्षेत्रों के लिए उपयुक्त फसलें और उन्नत किस्में अपनाने पर जोर देते हुए कहा कि बदलती जलवायु परिस्थितियों में फसल विविधीकरण किसानों के जोखिम को कम करने का प्रभावी उपाय है।

सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने की सलाह

वैज्ञानिक डॉ. राम निवास ने वर्षा आधारित खेती में कृषक समूहों और सामुदायिक निर्णय प्रक्रिया की भूमिका पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जल संसाधनों का सामूहिक प्रबंधन गांव स्तर पर बेहतर परिणाम दे सकता है।

उन्होंने किसानों को ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली जैसी सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों को अपनाने की सलाह दी, जिससे कम पानी में अधिक क्षेत्र की सिंचाई संभव हो सके और जल उपयोग दक्षता बढ़े।

किचन गार्डन से पोषण और अतिरिक्त आय की संभावना

सस्य वैज्ञानिक डॉ. कृष्ण गोपाल व्यास ने ग्रामीण परिवारों में किचन गार्डन की उपयोगिता पर विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने बताया कि घर के आसपास उपलब्ध खाली भूमि तथा रसोई और स्नानघर से निकलने वाले पानी का उपयोग कर परिवार अपनी जरूरत की ताजी और पौष्टिक सब्जियां, फल तथा फूल उगा सकता है।

उन्होंने कहा कि किचन गार्डन न केवल पोषण सुरक्षा को मजबूत करता है, बल्कि परिवार के खर्च को कम करने और अतिरिक्त आय का स्रोत बनने में भी सहायक हो सकता है।

किसानों ने सीखी व्यवहारिक तकनीकें

प्रशिक्षण के दौरान किसानों और महिला प्रतिभागियों की जिज्ञासाओं का समाधान किया गया। इसके अलावा उन्हें कृषि विज्ञान केन्द्र के प्रायोगिक प्रदर्शनों का भ्रमण भी कराया गया, जहां वर्षाजल संरक्षण और शुष्क भूमि कृषि से जुड़ी तकनीकों का प्रदर्शन किया गया।

कार्यक्रम में ग्राविस के प्रतिनिधि सोहन कंवर, जेठू सिंह सहित बड़ी संख्या में महिला कृषकों ने भाग लिया। इनमें शायरों देवी, डिंपल, नीजर कंवर, कमला कंवर, कुंता कंवर, गंगा कंवर और मीना सहित अन्य प्रतिभागी शामिल रहे।

जलवायु परिवर्तन के दौर में बढ़ रही ऐसी पहलों की आवश्यकता

विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण वर्षा की अनिश्चितता बढ़ रही है। ऐसे में वर्षाजल प्रबंधन, सूक्ष्म सिंचाई और शुष्क भूमि कृषि तकनीकों का प्रसार किसानों को जल संकट से बचाने के साथ-साथ कृषि उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। पोकरण में आयोजित यह प्रशिक्षण इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है।