October 2, 2026 4:41 AM

Krishi Times

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कचरा नहीं, कमाई का जरिया है ‘वेस्ट टू वेल्थ’

कचरे से कमाई तक: देश में तेजी से बढ़ रहा ‘वेस्ट टू वेल्थ’ का मॉडल!

स्वच्छता अभियान से आगे बढ़कर संसाधन प्रबंधन की ओर बढ़ रहा देश

नई दिल्ली। वर्ष 2014 में शुरू किया गया स्वच्छ भारत मिशन अब केवल साफ-सफाई तक सीमित नहीं रह गया है। यह स्वच्छता, कचरा प्रबंधन और लोगों के व्यवहार में बदलाव लाने वाले व्यापक जनआंदोलन का रूप ले चुका है। इसी दिशा में 2017 में शुरू किया गया ‘स्वच्छता ही सेवा’ अभियान नागरिकों की भागीदारी को बढ़ाने का एक महत्वपूर्ण माध्यम बना।

इस अभियान के तहत प्लास्टिक कचरे के प्रबंधन, सार्वजनिक स्थानों की सफाई और कचरा मुक्त वातावरण पर जोर दिया जाता है। अब इसी सोच को एक कदम आगे बढ़ाते हुए ‘वेस्ट टू वेल्थ’ यानी कचरे से संपदा की अवधारणा तेजी से सामने आ रही है।

कचरा नहीं, उपयोगी संसाधन के रूप में देखने की शुरुआत

वेस्ट टू वेल्थ का मूल विचार यह है कि जिस सामग्री को हम बेकार समझकर फेंक देते हैं, उसमें भी आर्थिक और उपयोगी मूल्य हो सकता है। उचित पृथक्करण, पुनर्प्राप्ति, पुन: उपयोग और प्रसंस्करण के जरिए कचरे को खाद, निर्माण सामग्री, हस्तशिल्प, कृषि इनपुट और दूसरे उपयोगी उत्पादों में बदला जा सकता है।

स्वच्छ भारत मिशन-शहरी 2.0 के तहत शहरों में स्रोत पर कचरा पृथक्करण, अपशिष्ट प्रसंस्करण और कचरे के पुन: उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है। खास बात यह है कि यह बदलाव केवल बड़े कचरा प्रसंस्करण संयंत्रों तक सीमित नहीं है। घरों, समुदायों, स्वयं सहायता समूहों और स्थानीय संस्थाओं के स्तर पर भी इसके उदाहरण सामने आ रहे हैं।

संभल की भारत हेम्प एग्रो ने कृषि अवशेष को उपयोगी उत्पाद में बदलकर कृषि के साथ टेक्सटाइल क्षेत्र में नई संभावनाएं पैदा की हैं। कंपनी ने करीब 100 टन हेम्प कृषि अवशेष को हाई-ग्रेड टेक्सटाइल फाइबर में बदलने का दावा किया है। अब कंपनी ने अमेरिका और दक्षिण कोरिया में हेम्प फाइबर के निर्यात के लिए एमओयू भी किए हैं।

कृषि अवशेष से तैयार हो रहा टेक्सटाइल फाइबर

संभल स्थित भारत हेम्प एग्रो कृषि अवशेषों को मूल्यवान औद्योगिक उत्पाद में बदलने की दिशा में एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत कर रही है। कंपनी के फाउंडर आयुष सिंह के अनुसार, वर्ष 2021 में शुरू हुई इस पहल का उद्देश्य हेम्प (भांग) की खेती से निकलने वाले उन अवशेषों का उपयोग करना था, जिन्हें पहले किसान बेकार समझकर फेंक देते थे या जला देते थे। कंपनी ने इन कृषि अवशेषों को कच्चे माल के रूप में इस्तेमाल कर हाई-ग्रेड टेक्सटाइल फाइबर तैयार करने की तकनीक विकसित की है।

यह पहल केवल अपशिष्ट प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि किसानों की आय बढ़ाने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का भी माध्यम बन रही है। कृषि अवशेषों को उपयोगी उत्पाद में बदलने से जहां पर्यावरण प्रदूषण कम करने में मदद मिलती है, वहीं किसानों को अतिरिक्त आय का स्रोत भी प्राप्त होता है। स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग और वैल्यू एडिशन के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर भी सृजित हो रहे हैं।

छोटे खाद डिब्बे से घर में शुरू हुआ बदलाव

रसोई के गीले कचरे से तैयार हो रही खाद

कई भारतीय परिवारों में रसोई के जैविक कचरे को खाद में बदलने की परंपरा पहले से रही है। अब यही घरेलू व्यवहार आधुनिक अपशिष्ट प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा बन रहा है।

आंध्र प्रदेश के विजयवाड़ा में वरिष्ठ नागरिक के. सुब्बलक्ष्मी ने घरेलू स्तर पर गीले कचरे के प्रबंधन का उदाहरण पेश किया है। उनकी रसोई से निकलने वाले जैविक कचरे को अलग करके खाद में बदला जाता है और इस खाद का इस्तेमाल घर के बगीचे में किया जाता है। इससे उस कचरे को खुले में फेंकने की जरूरत कम हुई, जो पहले स्थानीय स्वच्छता व्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ बन सकता था।

घर से निकला प्रयोग बना जागरूकता का माध्यम

चंडीगढ़ में भी कोविड-19 महामारी के दौरान कमलजीत कौर देओल ने घर में गीले रसोई कचरे से खाद बनाने की शुरुआत की। शुरुआत में यह एक घरेलू प्रयोग था, लेकिन बाद में उन्होंने इसे लोगों को घरेलू कंपोस्टिंग के प्रति जागरूक करने वाली गतिविधियों से जोड़ा।

ऐसे उदाहरण यह बताते हैं कि कचरा प्रबंधन की शुरुआत किसी बड़े संयंत्र से ही हो, यह जरूरी नहीं है। घर में गीले और सूखे कचरे को अलग करना और जैविक कचरे का स्थानीय स्तर पर उपयोग करना भी व्यापक बदलाव की नींव बन सकता है।

सिद्दीपेट में सीखने के लिए तैयार हुआ ‘स्वच्छ बाड़ी’

तेलंगाना के सिद्दीपेट में ‘स्वच्छ बाड़ी’ जैसे अपशिष्ट प्रबंधन शिक्षण केंद्र समुदायों को व्यावहारिक तरीके से कचरा प्रबंधन समझाने का काम कर रहे हैं। यहां घरेलू खाद बनाने से लेकर सामुदायिक स्तर पर जैविक कचरे के प्रबंधन तक की जानकारी दी जाती है।

इसी तरह के केंद्रों को 141 नगरपालिका क्षेत्रों में विकसित करने की योजना बनाई गई है। इसका उद्देश्य केवल जानकारी देना नहीं, बल्कि लोगों को व्यवहारिक रूप से कचरे के सही प्रबंधन से जोड़ना है।

घरेलू कंपोस्टिंग का एक अतिरिक्त लाभ यह है कि गीला कचरा लैंडफिल तक पहुंचने से पहले ही स्थानीय स्तर पर संसाधित हो जाता है। इससे कचरे की मात्रा घटाने के साथ खाद के रूप में एक उपयोगी उत्पाद भी तैयार होता है।

जब जलकुंभी बनी महिलाओं की आय का जरिया

असम में समस्या बने पौधे को हस्तशिल्प में बदला

कचरे से संसाधन बनाने की अवधारणा केवल घरेलू कचरे तक सीमित नहीं है। कई जगह ऐसे प्राकृतिक पदार्थों का भी उपयोग किया जा रहा है, जिन्हें लंबे समय से पर्यावरणीय या प्रबंधन संबंधी चुनौती माना जाता रहा है।

असम के मोरीगांव जिले के बोरचिला गांव में जलकुंभी इसका एक उदाहरण है। स्थानीय रूप से ‘पानी मेटेका’ के नाम से जानी जाने वाली जलकुंभी मीठे पानी के जलाशयों में तेजी से फैलने वाला जलीय पौधा है। इसकी अधिक वृद्धि नदियों, तालाबों और झीलों में मछली पकड़ने, परिवहन और अन्य गतिविधियों को प्रभावित कर सकती है।

महिलाओं ने जलकुंभी में खोजा कारोबार

बोरचिला गांव की महिलाओं ने जलकुंभी को हटाने के साथ-साथ उसका उपयोग करने का रास्ता खोजा। पौधे को सुखाकर और प्रसंस्कृत करके उससे विभिन्न प्रकार के हस्तशिल्प उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं।

असम राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन के सहयोग से चल रही इस पहल से जुड़ी महिलाओं के लिए अतिरिक्त आय का अवसर बना है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इसमें भाग लेने वाली महिलाएं इस गतिविधि से प्रति माह कम से कम 10,000 रुपये तक की आय अर्जित कर रही हैं।

यह मॉडल दिखाता है कि किसी समस्या के रूप में देखी जाने वाली सामग्री भी स्थानीय उद्यमिता और आजीविका का आधार बन सकती है, बशर्ते उसके उपयोग और बाजार की संभावनाओं को पहचाना जाए।

पटना में नारियल कचरे से तैयार हो रहे उपयोगी उत्पाद

रोजाना 25-30 टन नारियल छिलके का प्रबंधन

शहरी क्षेत्रों में नारियल का कचरा भी लंबे समय से चुनौती बना हुआ है। पटना में प्रतिदिन करीब 25 से 30 मीट्रिक टन नारियल के छिलके और अन्य अवशेष निकलने का अनुमान है। पहले इस कचरे का बड़ा हिस्सा लैंडफिल तक पहुंच जाता था।

इस समस्या से निपटने के लिए पटना नगर निगम ने दानापुर क्षेत्र में नारियल अपशिष्ट प्रसंस्करण केंद्र स्थापित किया है। इसका उद्देश्य नारियल के छिलके, रेशे और अन्य अवशेषों को अलग-अलग उपयोगी उत्पादों में बदलना है।

खाद, कॉयर और कोकोपीट से बन रहा मूल्य

प्रसंस्करण के दौरान नारियल कचरे से अलग-अलग उपयोगी सामग्री तैयार की जा सकती है। गीले जैविक अवशेषों से जैविक खाद तैयार की जाती है। नारियल के रेशों का इस्तेमाल कॉयर रस्सी, चटाई, पैकेजिंग, हस्तशिल्प और अन्य उपयोगों में किया जा सकता है।

इसी तरह कोकोपीट कृषि और बागवानी के लिए उपयोगी सामग्री है। नर्सरी, पौध तैयार करने और छत पर बागवानी जैसे क्षेत्रों में इसका इस्तेमाल बढ़ रहा है।

संयंत्र की प्रारंभिक प्रसंस्करण क्षमता लगभग 10 टन प्रतिदिन बताई गई है। इसे कई शिफ्टों में संचालित कर भविष्य में करीब 30 टन प्रतिदिन तक बढ़ाने की योजना है।

कचरे से रोजगार और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा

नारियल अपशिष्ट के प्रसंस्करण से दोहरा लाभ दिखाई देता है। एक तरफ लैंडफिल में जाने वाले कचरे की मात्रा कम हो सकती है, वहीं दूसरी तरफ खाद, कॉयर और कोकोपीट जैसे उत्पादों के जरिए आर्थिक गतिविधियां पैदा होती हैं।

कृषि और बागवानी के लिए उपयोगी उत्पाद तैयार होने से यह मॉडल ग्रामीण और शहरी अर्थव्यवस्था के बीच एक नया जुड़ाव भी बना सकता है।

जब कचरा बना सार्वजनिक आकर्षण

वेस्ट टू वंडर पार्क से बदली सोच

वेस्ट टू वेल्थ की अवधारणा का एक और रूप सार्वजनिक स्थानों के विकास में दिखाई देता है। बेकार लोहे, धातु, ऑटोमोबाइल पार्ट्स और अन्य सामग्रियों को कलात्मक संरचनाओं और सार्वजनिक स्थलों में इस्तेमाल किया जा रहा है।

चंडीगढ़ का रॉक गार्डन इसका चर्चित उदाहरण है, जहां औद्योगिक और घरेलू कचरे से रचनात्मक संरचनाएं तैयार की गई हैं। इसी दिशा में चंडीगढ़ में करीब 1.75 एकड़ क्षेत्र में वेस्ट टू वंडर पार्क विकसित किया गया है। यहां लोहे की चादरों, छड़ों, पंखों और ऑटोमोबाइल के पुराने हिस्सों जैसी बेकार सामग्रियों का इस्तेमाल संरचनाएं तैयार करने में किया गया है।

दिल्ली में भी कचरे से तैयार हुईं कलात्मक संरचनाएं

दिल्ली के वेस्ट टू वंडर पार्क में भी औद्योगिक अपशिष्ट, रद्दी धातु और लैंडफिल से प्राप्त पुराने ऑटोमोबाइल पार्ट्स का इस्तेमाल प्रतिकृतियां और विभिन्न संरचनाएं बनाने में किया गया है।

इस तरह के पार्क केवल मनोरंजन या शहरी सौंदर्यीकरण तक सीमित नहीं हैं। ये नागरिकों को यह समझाने का माध्यम भी बन सकते हैं कि कचरे की उपयोगिता उसके फेंके जाने के बाद खत्म नहीं होती।

कचरे के साथ नवीकरणीय ऊर्जा का इस्तेमाल

वेस्ट टू वंडर पार्क में स्वच्छ ऊर्जा से जुड़ी व्यवस्थाओं को भी जोड़ा गया है। यहां 50 किलोवाट की संयुक्त क्षमता वाले सौर पेड़ और छत पर सौर पैनल लगाए गए हैं।

इस तरह के संयोजन से सार्वजनिक स्थानों पर नवीकरणीय ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के साथ बिजली उत्पादन और संभावित राजस्व सृजन के अवसर भी तैयार किए जा सकते हैं।

अपशिष्ट प्रबंधन से आगे बढ़ रही चक्रीय अर्थव्यवस्था

इन अलग-अलग उदाहरणों में एक समान बात दिखाई देती है—कचरे को अंतिम निपटान की सामग्री मानने के बजाय संसाधन के रूप में देखना।

रसोई का गीला कचरा खाद बन सकता है, जलकुंभी हस्तशिल्प का कच्चा माल बन सकती है, नारियल के अवशेष खाद और कोकोपीट जैसे उत्पादों में बदल सकते हैं और रद्दी धातु सार्वजनिक कला का हिस्सा बन सकती है।

स्रोत पर पृथक्करण सबसे महत्वपूर्ण कड़ी

हालांकि वेस्ट टू वेल्थ की पूरी श्रृंखला तभी प्रभावी हो सकती है जब कचरे को शुरुआत में ही अलग किया जाए। गीले, सूखे और अन्य प्रकार के कचरे का उचित पृथक्करण प्रसंस्करण और पुनर्चक्रण को आसान बनाता है।

यही वजह है कि भविष्य के अपशिष्ट प्रबंधन में केवल कचरा उठाने की व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी। स्रोत पर पृथक्करण, स्थानीय प्रसंस्करण, पुन: उपयोग, पुनर्चक्रण और बाजार से जुड़ाव—इन सभी को एक साथ मजबूत करना होगा।

कचरे में छिपी है नई अर्थव्यवस्था की संभावना

‘वेस्ट टू वेल्थ’ का सबसे बड़ा बदलाव केवल कचरा कम करना नहीं, बल्कि सोच में बदलाव है। जब बेकार समझी जाने वाली सामग्री को संसाधन के रूप में देखा जाता है, तो उसके साथ रोजगार, स्थानीय उद्यम, कृषि उपयोग और पर्यावरण संरक्षण की संभावनाएं भी जुड़ जाती हैं।

भारत में घरेलू कंपोस्टिंग से लेकर महिला समूहों के हस्तशिल्प, नारियल अपशिष्ट प्रसंस्करण और वेस्ट टू वंडर पार्क तक के उदाहरण बताते हैं कि चक्रीय अर्थव्यवस्था केवल बड़े उद्योगों का विषय नहीं है। इसकी शुरुआत घर, गांव, बाजार, नगर निकाय और स्थानीय समुदाय से भी हो सकती है।

आने वाले समय में कचरे का बेहतर पृथक्करण और स्थानीय स्तर पर उसका मूल्यवर्धन स्वच्छ शहरों के साथ-साथ नई आजीविका, स्थानीय रोजगार और संसाधन दक्षता का आधार बन सकता है। यही बदलाव ‘कचरे से संपदा’ की अवधारणा को जमीन पर वास्तविक रूप देने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।