देशी पशुधन किसानों की समृद्धि की कुंजी: शिवराज सिंह चौहान
देसी मवेशी, भैंस, मुर्गी और छोटे पशु भारतीय कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़
नई दिल्ली –केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा है कि देशी पशुधन किसानों की समृद्धि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था और सतत कृषि विकास की कुंजी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि देसी मवेशी, भैंस, मुर्गी और छोटे जुगाली करने वाले पशु केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि भारत की कृषि अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं।
Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!
पशु नस्ल पंजीकरण एवं संरक्षण कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री की सहभागिता
चौहान भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (भाकृअनुप) द्वारा आयोजित पशु नस्ल पंजीकरण प्रमाण पत्र एवं नस्ल संरक्षण पुरस्कार वितरण समारोह–2025 में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए। इस अवसर पर उन्होंने पशुओं की पारिस्थितिक (इकोलॉजिकल) अहमियत पर जोर देते हुए कहा कि भारत का पशुधन से रिश्ता केवल आर्थिक या पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के संतुलन से गहराई से जुड़ा हुआ है।
उन्होंने कहा,
“यह एक संतुलन का रिश्ता है। इस संतुलन में किसी भी प्रकार की गड़बड़ी का सीधा असर पर्यावरण और अंततः धरती की भलाई पर पड़ता है।”
देसी नस्लों के संरक्षण में वैज्ञानिकों और किसानों की सराहना
केंद्रीय मंत्री ने देशभर में देसी पशु नस्लों के संरक्षण में लगे वैज्ञानिकों, संस्थानों और किसान समुदायों की जमकर प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि इनके प्रयास केवल पशुओं को बचाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि ये जैव विविधता की रक्षा, ग्रामीण आजीविका को सशक्त करने और सतत खेती के भविष्य को सुरक्षित करने का कार्य कर रहे हैं।
2019 में शुरू राष्ट्रीय पहल को बताया ऐतिहासिक कदम
चौहान ने देसी पशु नस्लों के संरक्षण के लिए वर्ष 2019 में शुरू की गई राष्ट्रीय पहल का उल्लेख करते हुए इसे एक महत्वपूर्ण और सराहनीय कदम बताया। उन्होंने कहा,
“देसी मवेशी, भैंस, मुर्गी और छोटे पशु हमारी खेती की इकॉनमी की रीढ़ हैं। इनका विकास सीधे किसानों की खुशहाली, स्थायित्व और आय सुरक्षा से जुड़ा है।”
जन आंदोलन बनने की जरूरत
केंद्रीय मंत्री ने इस अभियान को नीतियों और सम्मेलनों से आगे ले जाकर एक जन आंदोलन बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि यह प्रयास गांवों, खेतों और किसान परिवारों तक पहुंचना चाहिए, ताकि इसका वास्तविक प्रभाव जमीनी स्तर पर दिखाई दे।
उन्होंने योगदान देने वालों को सम्मानित करने के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि पहचान और सम्मान से लोगों को प्रेरणा मिलती है और लंबे समय तक सकारात्मक असर सुनिश्चित होता है।
मीडिया से सकारात्मक भूमिका निभाने की अपील
चौहान ने मीडिया से संरक्षण और सतत विकास से जुड़े सकारात्मक प्रयासों को अधिक प्रमुखता देने की अपील की। उन्होंने कहा,
“जो लोग जीवन, प्रकृति और हमारे साझा भविष्य की रक्षा कर रहे हैं, उनके कार्यों को देखा, सुना और सराहा जाना चाहिए।”
विकसित भारत–पशुधन’ का विजन
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए भाकृअनुप के महानिदेशक डॉ. जाट ने कहा कि विकसित भारत–पशुधन का विजन दीर्घकालिक संरक्षण और संसाधनों के जिम्मेदार उपयोग पर केंद्रित है। उन्होंने बताया कि पिछले 15 वर्षों में किसानों की भूमिका निर्णायक रही है और वे नस्ल संरक्षण प्रयासों के केंद्र में हैं।
डॉ. जाट ने जानकारी दी कि वर्ष 2008 से अब तक 242 स्वदेशी पशु नस्लों का पंजीकरण किया जा चुका है। भाकृअनुप का लक्ष्य वर्ष 2047 तक सभी देसी पशु नस्लों का 100 प्रतिशत पंजीकरण सुनिश्चित करना है।
उन्होंने आर्थिक कारणों से मवेशियों की घटती संख्या पर चिंता जताते हुए सुधारात्मक कदम उठाने की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही बताया कि नस्ल पंजीकरण न केवल संरक्षण का माध्यम है, बल्कि इससे जैविक संसाधनों पर संप्रभु अधिकार, किसानों के लिए लाभ-साझाकरण और बौद्धिक संपदा अधिकारों की सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है। जीरो नॉन-डिस्क्रिप्ट एनिमल्स मिशन इसी दिशा में कार्य कर रहा है।
भाकृअनुप की प्रतिबद्धता
इस अवसर पर भाकृअनुप के उप-महानिदेशक (पशुविज्ञान) डॉ. राघवेंद्र भट्टा ने प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए पंजीकृत नस्लों की जानकारी दी और सतत पर्यावरण के लिए उनके संरक्षण के महत्व को रेखांकित किया।
नस्ल संरक्षण पुरस्कार 2025
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने वर्ष 2025 के लिए स्वदेशी पशु नस्लों के संरक्षण में उत्कृष्ट योगदान देने वाले व्यक्तियों और संस्थानों को नस्ल संरक्षण पुरस्कार से सम्मानित किया।
व्यक्तिगत श्रेणी में
-
जीतुल बुरागोहेन को लुइट भैंस के संरक्षण के लिए प्रथम पुरस्कार,
-
कुडाला राम दास को पुंगनूर मवेशी संरक्षण के लिए द्वितीय पुरस्कार प्रदान किया गया।
-
तिरुपति और श्री रामचंद्रन काहनार को सांत्वना पुरस्कार मिले।
संस्थागत श्रेणी में
-
बिनझारपुरी मवेशी प्रमोटर्स एंड प्रोड्यूसर्स सोसाइटी को प्रथम पुरस्कार,
-
तमिलनाडु पशु चिकित्सा एवं पशु विज्ञान विश्वविद्यालय को पुलिक्कुलम मवेशी संरक्षण हेतु द्वितीय पुरस्कार,
-
गाओलाओ मवेशी संरक्षण के लिए तृतीय पुरस्कार प्रदान किया गया।
-
मेचेरी भेड़ संरक्षण हेतु भी विश्वविद्यालय को सांत्वना पुरस्कार मिला।
पृष्ठभूमि
भारत विश्व के सबसे समृद्ध पशु आनुवंशिक संसाधनों वाले देशों में शामिल है। इन्हें ध्यान में रखते हुए भाकृअनुप ने वर्ष 2008 में पशु नस्ल पंजीकरण कार्यक्रम शुरू किया। अब तक 242 स्वदेशी नस्लों का पंजीकरण किया जा चुका है।
सरकार द्वारा जारी राजपत्र अधिसूचनाओं के माध्यम से इन नस्लों को कानूनी संरक्षण और संप्रभु सुरक्षा प्रदान की गई है, जिससे बायोपायरेसी से सुरक्षा, लाभ-साझाकरण और नस्ल-विशिष्ट विकास नीतियों को बढ़ावा मिला है।
पशु नस्ल पंजीकरण प्रमाण पत्र एवं नस्ल संरक्षण पुरस्कार वितरण समारोह–2025 देश के पशुधन क्षेत्र को मजबूत करने, संरक्षण आधारित विकास और किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है।