Plant and Animal Genome Conference 2026 में भारतीय वैज्ञानिक की बड़ी प्रस्तुति

अमेरिका के सैन डिएगो में अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारतीय धान अनुसंधान की सशक्त उपस्थिति

Dr. Jyothi Badri participated in the Plant and Animal Genome Conference-33 held in San Diego, USA (9–14 January 2026). She delivered an invited talk on integrated breeding approaches for developing climate-resilient and nutritious rice varieties for sustainable farming.

Thank you for reading this post, don't forget to subscribe!

सैन डिएगो (कैलिफोर्निया, अमेरिका), –धान अनुसंधान के क्षेत्र में भारत का नाम वैश्विक स्तर पर रोशन करते हुए प्रख्यात वैज्ञानिक डॉ. ज्योति बद्री ने 9 से 14 जनवरी 2026 तक अमेरिका के कैलिफोर्निया राज्य के सैन डिएगो में आयोजित प्रतिष्ठित प्लांट एंड एनिमल जीनोम कॉन्फ्रेंस–33 (Plant and Animal Genome Conference-33) में सक्रिय सहभागिता की। यह सम्मेलन विश्व स्तर पर पादप एवं पशु जीनोमिक्स के क्षेत्र में नवीनतम शोध, तकनीकों और नीतिगत विमर्श के लिए एक प्रमुख मंच माना जाता है।

सम्मेलन के दौरान आयोजित विशेष कार्यशाला “Harnessing Genomics for Sustainable Rice Farming” में डॉ. ज्योति बद्री को आमंत्रित वक्ता के रूप में शामिल किया गया। यह कार्यशाला अमेरिका के लुइसियाना स्टेट यूनिवर्सिटी एग्रीकल्चरल सेंटर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. प्रसांता के. सुबुधि द्वारा आयोजित की गई थी, जिसमें विश्व के विभिन्न देशों से आए धान वैज्ञानिकों, जीनोमिक्स विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं ने भाग लिया।

जलवायु-सहिष्णु और पोषक धान किस्मों पर केंद्रित व्याख्यान

डॉ. ज्योति बद्री ने अपने आमंत्रित व्याख्यान में “Integrated Breeding Approaches for Development of Climate Resilient and Nutritious Rice Varieties for Sustainable Farming” विषय पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि जलवायु परिवर्तन, बढ़ती जनसंख्या और पोषण सुरक्षा की चुनौतियों के बीच धान जैसी प्रमुख फसल में बहु-गुणों से युक्त किस्मों का विकास समय की आवश्यकता है। इसके लिए पारंपरिक प्रजनन के साथ-साथ जीनोमिक्स आधारित आधुनिक तकनीकों का समन्वय अत्यंत आवश्यक है।

बहु-गुणों का समावेशन: आधुनिक प्रजनन की दिशा

अपने व्याख्यान में डॉ. बद्री ने एलीट आनुवंशिक पृष्ठभूमि में अनेक जटिल गुणों के एक साथ समावेशन (Trait Stacking) की अवधारणा को प्रमुखता से रखा। उन्होंने बताया कि रोग प्रतिरोध, कीट सहनशीलता, सूखा एवं लवणीयता सहनशीलता जैसे गुणों को एक ही किस्म में समाहित कर किसानों के लिए स्थिर और सुरक्षित उत्पादन सुनिश्चित किया जा सकता है।

उन्नत किस्मों और जीनोमिक उपलब्धियों का उल्लेख

डॉ. बद्री ने अपने शोध के ठोस उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कई उन्नत धान लाइनों और किस्मों की जानकारी दी—

  • डीआरआर धान-79, जिसमें ब्लास्ट रोग (Pi54), ब्राउन प्लांट हॉपर (Bph20 + Bph21), गॉल मिज प्रतिरोध के साथ-साथ सूखा सहनशीलता जैसे महत्वपूर्ण गुण मौजूद हैं।

  • IL19101, जो बैक्टीरियल ब्लाइट (xa8 + Xa21), ब्लास्ट (Pi1 + Pi20 + Pi38 + Pib + Pi54) तथा गॉल मिज (Gm8) के प्रति उच्च स्तर का प्रतिरोध प्रदर्शित करती है।

  • IL19471, जिसमें बैक्टीरियल ब्लाइट (xa5 + xa8), ब्लास्ट (Pi9 + Pi + Pi20) के साथ सूखा सहनशीलता का गुण पाया जाता है।

कठिन गुणों की आनुवंशिक संरचना पर गहन शोध

डॉ. बद्री ने उन गुणों की आनुवंशिक संरचना (Genetic Architecture) के सटीक विश्लेषण पर भी प्रकाश डाला, जिन्हें सुधारना परंपरागत रूप से कठिन माना जाता है। उन्होंने बताया कि उप-प्रजातीय संकरण से विकसित RILs के माध्यम से qCT7 नामक महत्वपूर्ण जीन की पहचान की गई, जो केवल अर्ध-बौनेपन तक सीमित न रहकर तने की मजबूती, कोशिका भित्ति की संरचना और तने के यांत्रिक गुणों को लक्ष्य बनाकर चयन की नई संभावनाएं खोलता है।

शीथ ब्लाइट प्रतिरोध और जैव-संपोषण पर जोर

उन्होंने शीथ ब्लाइट रोग प्रतिरोध के लिए अपनाए गए समेकित मैपिंग दृष्टिकोण की जानकारी दी, जिसमें इंडिका लैंडरेस ‘फौगाक’ से प्राप्त स्थिर जीनोमिक क्षेत्रों की पहचान की गई है, जो पौधे की ऊंचाई से स्वतंत्र हैं।

इसके साथ ही उन्होंने जैव-संपोषित किस्म डीआरआर धान-48 का उल्लेख किया, जो कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स (Low GI), उच्च जिंक मात्रा, लवणीयता सहनशीलता और बैक्टीरियल ब्लाइट प्रतिरोध (xa5 + xa13 + Xa21) जैसे बहु-आयामी गुणों से युक्त है। यह किस्म पोषण सुरक्षा के दृष्टिकोण से विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

उप-प्रजातीय संकरण से बढ़ी आनुवंशिक विविधता

डॉ. बद्री ने इंडिका और ट्रॉपिकल जापोनिका के उप-प्रजातीय संकरण को धान सुधार की एक प्रभावी रणनीति बताया। उन्होंने कहा कि इस पद्धति से आनुवंशिक विविधता का विस्तार होता है और जलवायु सहनशीलता व उपज स्थिरता के लिए नवीन एलील्स को एलीट किस्मों में सफलतापूर्वक समाहित किया जा सकता है।

इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण डीआरआर धान-87 है, जो उप-प्रजातीय संकरण से विकसित की गई है। इसमें ट्रॉपिकल जापोनिका के मोटे तने, अधिक जैवभार, मजबूत जड़ प्रणाली और बेहतर प्रकाश संश्लेषण क्षमता जैसे गुणों को एलीट इंडिका पृष्ठभूमि में सफलतापूर्वक जोड़ा गया है, जो Improved Plant Architecture की अवधारणा को साकार करता है।

ग्लोबल मंच पर भारतीय कृषि विज्ञान की मजबूती

डॉ. ज्योति बद्री की इस विस्तृत और वैज्ञानिक प्रस्तुति ने यह स्पष्ट किया कि जीनोमिक्स आधारित समेकित प्रजनन दृष्टिकोण अपनाकर जलवायु परिवर्तन के अनुरूप, पोषणयुक्त और टिकाऊ धान किस्मों का विकास संभव है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर यह सहभागिता भारतीय धान अनुसंधान की वैज्ञानिक क्षमता और वैश्विक योगदान को मजबूती से स्थापित करती है।

Source: IIRR