🌱 वैज्ञानिक तरीके से पपीता की पौध तैयार करें, मार्च–अप्रैल रोपाई में मिलेगा अधिक पैदावार और मुनाफा!
पूसा/समस्तीपुर -उत्तर भारत में पपीता की खेती तेजी से लोकप्रिय हो रही है। अल्पावधि में फल देने वाली और वर्षभर बाजार में मांग रहने के कारण यह किसानों के लिए लाभकारी फल फसल साबित हो रही है। प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह का मानना है कि मार्च–अप्रैल रोपाई के लिए यदि किसान फरवरी माह में वैज्ञानिक विधि से पौध तैयार कर लें, तो पैदावार और आय दोनों में उल्लेखनीय वृद्धि संभव है।
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Dr. Rajendra Prasad Central Agricultural University के पोस्ट ग्रेजुएट डिपार्टमेंट ऑफ प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) एस.के. सिंह ने बताया कि कम तापमान के कारण फरवरी में पपीता बीजों का अंकुरण प्रभावित होता है। ऐसे में लो कॉस्ट पॉली टनल तकनीक किसानों के लिए अत्यंत कारगर सिद्ध हो रही है।
🌡️ फरवरी की ठंड बनती है चुनौती
उत्तर भारत में फरवरी माह के दौरान न्यूनतम तापमान 10 डिग्री सेल्सियस या उससे कम हो जाता है, जिससे पपीता के बीजों का अंकुरण धीमा पड़ जाता है। परिणामस्वरूप पौध तैयार होने में देरी होती है और मार्च–अप्रैल रोपाई का उपयुक्त समय निकल सकता है। इससे फलन भी देर से शुरू होता है और बाजार में बेहतर दाम का अवसर कम हो जाता है।
🏗️ लो कॉस्ट पॉली टनल: कम लागत में अधिक लाभ
विशेषज्ञ के अनुसार लो कॉस्ट पॉली टनल तकनीक के माध्यम से नर्सरी में नियंत्रित सूक्ष्म जलवायु तैयार की जा सकती है।
इसकी प्रमुख विशेषताएं:
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बाहरी तापमान से 5–7 डिग्री अधिक तापमान
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20–30 माइक्रोन पारदर्शी पॉलीथीन शीट
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बांस या पतली लोहे की सरिया से अर्धवृत्ताकार ढांचा
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छोटे और मध्यम किसानों के लिए सुलभ लागत
इस तकनीक से बीजों का अंकुरण तेज और समान रूप से होता है, जिससे स्वस्थ एवं एकसमान पौध तैयार होती है।
🌱 नर्सरी बेड की वैज्ञानिक तैयारी
1 मीटर चौड़ी और 15 सेंटीमीटर ऊँची क्यारियाँ बनानी चाहिए। मिट्टी भुरभुरी और जल निकास वाली हो। 
प्रति वर्ग मीटर मिश्रण:
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2 किलो सड़ी गोबर खाद या वर्मी कम्पोस्ट
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25 ग्राम ट्राइकोडर्मा
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75 ग्राम संतुलित एनपीके उर्वरक
बुवाई से 8–10 दिन पहले यह मिश्रण मिलाने से लाभकारी सूक्ष्मजीव सक्रिय हो जाते हैं और रोगजनक कम होते हैं।
🌾 उन्नत किस्मों का चयन जरूरी
उच्च उत्पादन के लिए उन्नत एवं संकर किस्मों का चयन महत्वपूर्ण है।
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Red Lady F1 – अधिक उपज और समान फल आकार
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Pusa Delicious – उत्तम स्वाद और गुणवत्ता
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Pusa Nanha – छोटे पौधे, अधिक घनत्व में रोपाई
बीज मात्रा
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सामान्य किस्म: 250–300 ग्राम प्रति हेक्टेयर
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संकर किस्म: 60–70 ग्राम प्रति हेक्टेयर
बीज उपचार
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30 मिनट गुनगुने पानी में भिगोना
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ट्राइकोडर्मा से उपचार
इससे अंकुरण प्रतिशत बढ़ता है और प्रारंभिक रोग संक्रमण कम होता है।
💧 सिंचाई, पोषण और रोग नियंत्रण
नर्सरी में हल्की फुहार से सिंचाई करें। जलभराव से बचें।
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अंकुरण के 10–12 दिन बाद 1% घुलनशील उर्वरक (19:19:19) का छिड़काव
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डैंपिंग ऑफ (आर्द्र गलन) से बचाव हेतु ट्राइकोडर्मा का प्रयोग
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आवश्यकता पड़ने पर 2 ग्राम रिडोमिल एम गोल्ड प्रति लीटर पानी से ड्रेंचिंग
जैविक नियंत्रण उपायों को अधिक टिकाऊ और सुरक्षित माना जा रहा है।
🚜 कब करें मुख्य खेत में रोपाई?

30–35 दिन में पौध रोपाई योग्य हो जाती है।
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ऊँचाई: 15–20 सेंटीमीटर
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5–6 स्वस्थ पत्तियाँ
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सायंकाल रोपाई करना बेहतर
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तुरंत हल्की सिंचाई
📈 कैसे बढ़ाएं आय?
1️⃣ व्यावसायिक नर्सरी से अतिरिक्त कमाई
किसान 2,000–5,000 पौध तैयार कर स्थानीय बाजार में बेच सकते हैं। इससे अलग आय स्रोत विकसित होगा।
2️⃣ ड्रिप और मल्चिंग तकनीक अपनाएं
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पानी की बचत 40–50%
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खरपतवार नियंत्रण
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शुरुआती वृद्धि तेज
3️⃣ बाजार आधारित खेती
मार्च रोपाई से जून–जुलाई में शुरुआती फल बाजार में आते हैं, जब दाम अधिक मिलते हैं।
4️⃣ फसल बीमा और सरकारी योजनाएं
राज्य सरकार एवं राष्ट्रीय बागवानी मिशन के अंतर्गत संरक्षित खेती और पौधशाला पर अनुदान उपलब्ध है।
🟢 सारांश
मार्च–अप्रैल रोपाई के लिए वैज्ञानिक तरीके से पौध तैयार करना पपीता उत्पादन की सफलता की कुंजी है। लो कॉस्ट पॉली टनल तकनीक न केवल अंकुरण और पौध स्वास्थ्य सुधारती है, बल्कि समय पर रोपाई सुनिश्चित कर किसानों की आय में वृद्धि करती है।
यदि किसान वैज्ञानिक सलाह और आधुनिक तकनीकों को अपनाएँ, तो पपीता खेती को लाभकारी और टिकाऊ व्यवसाय में बदला जा सकता है।
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी अधिकारी-प्रभारी, केला अनुसंधान केन्द्र, गोरौल डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा संपर्क: sksraupusa@gmail.com