लीची अब सिर्फ मौसमी फल नहीं! वैल्यू एडिशन तकनीक से सालभर होगी कमाई

बीज और छिलके से भी होगा मुनाफा, लीची स्क्वैश और शहद से बढ़ेगी आय!

दिल्ली – लीची जैसी शीघ्र नष्ट होने वाली फसल को सालभर बाजार में उपलब्ध कराना और किसानों की आय बढ़ाना अब संभव हो रहा है। राष्ट्रीय लीची अनुसंधान संस्थान, मुजफ्फरपुर के शोध सहयोगी डॉ. चमन कुमार ने Krishi Times से विशेष बातचीत में बताया कि संस्थान का मुख्य फोकस लीची में वैल्यू एडिशन और बाय-प्रोडक्ट उपयोग पर है, ताकि पैदावार से लेकर प्रसंस्करण और विपणन तक किसानों को अधिक लाभ मिल सके।

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क्यों जरूरी है लीची में वैल्यू एडिशन?

डॉ. चमन कुमार

डॉ. चमन कुमार के अनुसार लीची अत्यंत पेरिशेबल (जल्दी खराब होने वाली) फसल है। सीमित शेल्फ लाइफ के कारण किसानों को अक्सर उचित मूल्य नहीं मिल पाता। ऐसे में प्रसंस्करण (Processing), पैकेजिंग और वैज्ञानिक संरक्षण तकनीकें अपनाकर लीची को लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है और देश-विदेश के बाजारों तक पहुंचाया जा सकता है।

लीची स्क्वैश: सालभर आय का जरिया

संस्थान द्वारा विकसित लीची स्क्वैश किसानों के लिए आय का बड़ा स्रोत बन रहा है। इसमें लगभग 25% शुद्ध लीची पल्प का उपयोग किया जाता है और इसकी शेल्फ लाइफ करीब तीन महीने होती है। संस्थान किसानों को इसके निर्माण की ट्रेनिंग भी देता है, जिससे वे स्वयं प्रसंस्करण इकाई स्थापित कर सकते हैं।

कैंड लीची (लीची रसगुल्ला): पारंपरिक स्वाद, आधुनिक तकनीक

लीची के बीज निकालकर उसे चीनी की चाशनी में संरक्षित कर “कैंड लीची” या लीची रसगुल्ला तैयार किया जाता है। रेफ्रिजरेटेड स्थिति में इसकी शेल्फ लाइफ लगभग एक वर्ष तक रहती है। वर्तमान में इसका उपयोग डेजर्ट, खीर और अन्य मिठाई उत्पादों में बढ़ रहा है, जिससे बाजार की संभावनाएं भी बढ़ी हैं।

लीची शहद: मधुमक्खी पालन से अतिरिक्त कमाई

लीची के फूल आने के मौसम में बागानों में मधुमक्खी बॉक्स लगाए जाते हैं। मधुमक्खियां फूलों से नेक्टर एकत्र कर लीची हनी तैयार करती हैं। संस्थान की हनी प्रोसेसिंग यूनिट में शहद को शुद्ध कर पैकेजिंग की जाती है। किसानों को न्यूनतम शुल्क पर यह सुविधा और प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जाता है, जिससे वे फसल के साथ-साथ मधुमक्खी पालन से भी अतिरिक्त आय कमा सकें।

लीचमिश और लीची नट: नई बाजार पहचान

ऑस्मोटिक डिहाइड्रेशन और हॉट एयर ड्राइंग तकनीक से तैयार “लीचमिश” किशमिश जैसा उत्पाद है, जिसमें नमी की मात्रा 15% तक लाई जाती है। वहीं “लीची नट” छिलके सहित सुखाकर तैयार किया जाता है, जिसे लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है। दोनों उत्पाद घरेलू और निर्यात बाजार में संभावनाएं रखते हैं।

बाय-प्रोडक्ट उपयोग: भविष्य का बड़ा अवसर

डॉ. चमन कुमार ने बताया कि लीची फल का लगभग 30% हिस्सा बीज होता है, जिसमें करीब 35% स्टार्च पाया जाता है। संस्थान बीज से स्टार्च निष्कर्षण की तकनीक विकसित कर रहा है।
इसके अलावा लीची के छिलके में एंटीऑक्सीडेंट, फिनोल, एंटी-कैंसर और एंटी-एजिंग तत्व पाए जाते हैं। इनका निष्कर्षण कर कॉस्मेटिक और फार्मास्यूटिकल उद्योग में उपयोग की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं।

किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में पहल

संस्थान किसानों को प्रसंस्करण, पैकेजिंग, शहद उत्पादन और वैल्यू एडेड उत्पादों के निर्माण की नियमित ट्रेनिंग दे रहा है। इससे लीची केवल एक मौसमी फल न रहकर सालभर आय देने वाली फसल बन सकती है।

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