चक्रिय कृषि मॉडल से बढ़ेगी किसानों की आय!

कृषि अपशिष्ट बनेगा कमाई का जरिया!

कृषि अपशिष्ट से 18,000 मेगावाट बिजली की क्षमता, चक्रिय कृषि मॉडल से ‘अपशिष्ट से संपदा’ की दिशा में बड़ा कदम

3,926 करोड़ की सहायता, 42 हजार से अधिक कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित; गोबरधन योजना के तहत 979 बायोगैस संयंत्र संचालित

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बढ़ता कृषि अपशिष्ट बना पर्यावरणीय चुनौती!

देश में कृषि उत्पादन बढ़ने के साथ-साथ कृषि अपशिष्ट की मात्रा भी तेजी से बढ़ रही है। अनुमान है कि भारत में प्रतिवर्ष लगभग 350 मिलियन टन कृषि अपशिष्ट उत्पन्न होता है। इसमें फसल अवशेष, भूसा, पुआल, पशु मल, प्रसंस्करण उप-उत्पाद और खाद्य अपशिष्ट शामिल हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार, यदि इन अवशेषों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन नहीं किया गया, तो वायु, जल और मृदा प्रदूषण की समस्या और गंभीर हो सकती है। खुले में पराली जलाने से न केवल वायु गुणवत्ता प्रभावित होती है, बल्कि मिट्टी की उर्वरता भी घटती है और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन बढ़ता है।

18,000 मेगावाट स्वच्छ ऊर्जा की संभावना!

नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के आकलन के अनुसार, भारत के कृषि अवशेषों में प्रतिवर्ष 18,000 मेगावाट से अधिक विद्युत उत्पादन की क्षमता है।

कृषि अपशिष्ट को बायोमास ऊर्जा, बायोगैस और कम्प्रेस्ड बायोगैस (CBG) में बदलकर स्वच्छ ऊर्जा का उत्पादन किया जा सकता है। इसके अलावा, अवशेषों से तैयार जैविक खाद मृदा स्वास्थ्य सुधारने और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करने में सहायक है।

फसल अवशेष प्रबंधन पर 3,926 करोड़ रुपये खर्च!

सरकार ने वर्ष 2018-19 से 2025-26 के बीच फसल अवशेष प्रबंधन (CRM) पहल के तहत 3,926 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता प्रदान की है।

इस योजना के अंतर्गत:

  • 42,000 से अधिक कस्टम हायरिंग केंद्र स्थापित किए गए हैं।

  • 3.24 लाख से अधिक अवशेष प्रबंधन मशीनें किसानों को उपलब्ध कराई गई हैं।

इन-सीटू प्रबंधन के तहत अवशेषों को खेत में ही मल्च या जैविक खाद के रूप में उपयोग किया जा रहा है, जबकि एक्स-सीटू प्रबंधन में इन्हें एकत्र कर ऊर्जा, कंपोस्ट और बायोगैस उत्पादन में इस्तेमाल किया जा रहा है।

गोबरधन योजना: अपशिष्ट से ऊर्जा और खाद!

गैल्वनाइजिंग ऑर्गेनिक बायो-एग्रो रिसोर्सेज धन (गोबरधन) योजना के तहत गोबर, फसल अवशेष और खाद्य अपशिष्ट को जैविक खाद और कम्प्रेस्ड बायोगैस में परिवर्तित किया जा रहा है।

14 जनवरी 2026 तक देश के 51.4 प्रतिशत जिलों में 979 बायोगैस संयंत्र संचालित हो रहे हैं। सरकार ने पारदर्शिता और कार्यकुशलता बढ़ाने के लिए एकीकृत गोबरधन पोर्टल भी शुरू किया है।

सीबीजी को कार्बन क्रेडिट व्यापार में शामिल करने और जैविक खाद के लिए सरलीकृत मानकों को लागू करने जैसे कदमों से निजी निवेश को भी बढ़ावा मिला है।

कृषि अवसंरचना कोष से मजबूत हो रही मूल्य शृंखला!

वर्ष 2020-21 में शुरू किए गए कृषि अवसंरचना कोष (AIF) के तहत कटाई उपरांत बुनियादी ढांचे के विकास के लिए संस्थागत ऋण प्रदान किया जा रहा है।

वर्ष 2025 तक:

  • 1,13,419 परियोजनाओं के लिए 66,310 करोड़ रुपये स्वीकृत किए गए।

  • 30,202 कस्टम हायरिंग सेंटर,

  • 22,827 प्रसंस्करण इकाइयाँ,

  • 15,982 गोदाम,

  • 2,454 शीतगृह परियोजनाएँ स्थापित की गईं।

इन परियोजनाओं से कटाई उपरांत नुकसान कम करने, मूल्य संवर्धन बढ़ाने और किसानों की आय में वृद्धि की दिशा में ठोस परिणाम मिल रहे हैं।

पशुपालन अवसंरचना विकास कोष की भूमिका!

आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत 15,000 करोड़ रुपये की राशि के साथ पशुपालन अवसंरचना विकास कोष (AHIDF) की शुरुआत की गई।

इसका उद्देश्य दुग्ध एवं मांस प्रसंस्करण, पशु आहार उत्पादन और अपशिष्ट प्रबंधन में निजी निवेश को बढ़ावा देना है। इससे पशुपालन क्षेत्र में चक्रिय मॉडल को मजबूती मिल रही है और जैविक उर्वरक एवं बायोगैस उत्पादन को प्रोत्साहन मिल रहा है।

जल प्रबंधन और अपशिष्ट जल का पुन: उपयोग!

जल शक्ति मंत्रालय द्वारा राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन, पीएमकेएसवाई-वाटरशेड विकास और जल जीवन मिशन–हर घर जल जैसी योजनाओं के माध्यम से अपशिष्ट जल के उपचार और पुन: उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है।

ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति 55 लीटर प्रतिदिन सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराने का लक्ष्य तय किया गया है, जिससे जल संरक्षण और सतत जल प्रबंधन को बढ़ावा मिल रहा है।

एसडीजी के अनुरूप चक्रिय कृषि!

चक्रिय कृषि, सतत विकास लक्ष्य (SDG-2) के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य भूख समाप्त करना, खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है।

वैश्विक स्तर पर वर्ष 2022 में 1.05 अरब टन खाद्य अपशिष्ट उत्पन्न हुआ, जिसमें 60 प्रतिशत घरेलू स्तर पर पैदा हुआ। ऐसे में कृषि और खाद्य अपशिष्ट का पुनर्चक्रण जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।

सतत समृद्धि की आधारशिला!

कृषि अपशिष्ट को समस्या के बजाय संसाधन के रूप में देखने की सोच ही चक्रिय अर्थव्यवस्था की मूल भावना है।

गोबरधन, फसल अवशेष प्रबंधन, कृषि अवसंरचना कोष और पशुपालन अवसंरचना विकास कोष जैसी पहलें यह दर्शाती हैं कि लक्षित नीतियों और मजबूत अवसंरचना के माध्यम से कृषि अपशिष्ट को ऊर्जा, जैविक उर्वरक और रोजगार के अवसरों में बदला जा सकता है।

यदि इन पहलों को व्यापक स्तर पर लागू किया जाए, तो भारत न केवल पर्यावरण संरक्षण में अग्रणी भूमिका निभा सकता है, बल्कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा दे सकता है।

Source: PIB