पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट अपनाकर कम करें नुकसान, बढ़ाएं गुणवत्ता और पाएं बेहतर बाजार मूल्य : प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह
समस्तीपुर। केले की खेती में किसान पूरे साल मेहनत करते हैं, लेकिन कई बार अच्छी पैदावार मिलने के बावजूद उन्हें अपेक्षित कीमत नहीं मिल पाती। इसकी एक बड़ी वजह कटाई के बाद फलों की गुणवत्ता में आने वाली गिरावट और परिवहन के दौरान होने वाला नुकसान है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि कटाई के बाद फलों का वैज्ञानिक तरीके से प्रबंधन किया जाए तो न केवल नुकसान कम किया जा सकता है, बल्कि किसानों को बाजार में बेहतर दाम भी मिल सकते हैं।

डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के केला अनुसंधान केन्द्र, गोरौल के प्रधान (अतिरिक्त प्रभार) एवं वरिष्ठ कृषि वैज्ञानिक प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह ने बताया कि भारत विश्व का सबसे बड़ा केला उत्पादक देश है। दुनिया के कुल केले उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी लगभग 26 से 27 प्रतिशत है और देश में प्रतिवर्ष करीब 37 से 38 मिलियन टन केले का उत्पादन होता है। इसके बावजूद भारतीय किसानों को अंतरराष्ट्रीय बाजार की तुलना में कम मूल्य मिलता है। इसका प्रमुख कारण कटाई के बाद होने वाली क्षति, गुणवत्ता में कमी और वैज्ञानिक पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन का अभाव है।
उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में सुपरमार्केट, संगठित रिटेल श्रृंखलाएं और निर्यात बाजार केवल आकर्षक, एक समान आकार वाले, रोग-मुक्त और लंबे समय तक सुरक्षित रहने वाले फलों को प्राथमिकता देते हैं। ऐसे में केवल उत्पादन बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि कटाई के बाद फलों की गुणवत्ता बनाए रखना भी उतना ही जरूरी हो गया है।
कटाई के बाद सावधानी से करें फलों की हैंडलिंग

प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह के अनुसार, केले की कटाई के बाद सबसे पहला और महत्वपूर्ण कार्य फलों की सुरक्षित हैंडलिंग है। कटाई के बाद पूरे गुच्छे से फलों को सावधानीपूर्वक अलग-अलग हथ्थों में विभाजित किया जाता है। इस दौरान यह ध्यान रखना आवश्यक है कि फलों पर किसी प्रकार की चोट या दबाव न पड़े। अक्सर किसान इस चरण को सामान्य प्रक्रिया मानकर अनदेखा कर देते हैं, लेकिन हल्की सी चोट भी बाद में काले धब्बों, सड़न और गुणवत्ता में कमी का कारण बन सकती है।
उन्होंने बताया कि कटाई के तुरंत बाद फलों को खुले मैदान या तेज धूप में नहीं रखना चाहिए। ऐसा करने से फलों की नमी तेजी से कम होती है और उनकी ताजगी प्रभावित होती है। इसलिए कटाई के बाद फलों को छायादार स्थान पर रखना बेहतर माना जाता है।
फिटकरी से धुलाई से बढ़ती है स्वच्छता और आकर्षण
प्रो. सिंह ने बताया कि पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन का पहला वैज्ञानिक चरण फलों की धुलाई है। इसके लिए केले के हथ्थों को फिटकरी के घोल में कुछ समय के लिए डुबोया जाता है। इस प्रक्रिया से फलों की सतह पर मौजूद धूल-मिट्टी, लेटेक्स (दूध), कीटों के अवशेष और अन्य अशुद्धियां हट जाती हैं।
उन्होंने कहा कि फिटकरी एक हल्के प्राकृतिक कीटाणुनाशक की तरह भी कार्य करती है। इससे फलों की बाहरी सतह अधिक साफ और चमकदार दिखाई देती है, जिससे बाजार में उनका आकर्षण बढ़ता है। साथ ही प्रारंभिक स्तर पर सूक्ष्मजीवों की संख्या भी कम हो जाती है, जिससे सड़न की संभावना घटती है।
एंटीफंगल उपचार से कम होती है सड़न
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह ने बताया कि धुलाई के बाद फलों को एंटीमाइक्रोबियल एवं एंटीफंगल उपचार दिया जाता है। इसके लिए हाइड्रोजन पेरोक्साइड एवं सिल्वर स्टेबलाइजेशन तकनीक पर आधारित उत्पादों का उपयोग किया जाता है, जो फलों की सतह पर मौजूद बैक्टीरिया, कवक, यीस्ट, वायरस और अन्य रोगजनक सूक्ष्मजीवों को नियंत्रित करने में मदद करते हैं।
उन्होंने कहा कि इस प्रकार का उपचार फलों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में सहायक होता है। इससे भंडारण और परिवहन के दौरान सड़न कम होती है तथा फलों की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है। हालांकि किसी भी पोस्ट-हार्वेस्ट उत्पाद का उपयोग करते समय निर्माता के निर्देशों, खाद्य सुरक्षा मानकों और निर्यात संबंधी नियमों का पालन करना आवश्यक है।
सुखाने की प्रक्रिया को न करें नजरअंदाज
प्रो. सिंह ने बताया कि उपचार के बाद फलों को सीधे पैक करना उचित नहीं होता। पहले उन्हें जालीदार प्लेटफॉर्म पर रखकर अच्छी तरह सुखाया जाता है। इसके लिए उच्च गति वाले पंखों का उपयोग किया जाता है ताकि अतिरिक्त पानी पूरी तरह निकल जाए।
उन्होंने कहा कि यदि फलों की सतह पर नमी बनी रहती है तो बाद में फफूंद विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसलिए सुखाने की प्रक्रिया पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे अक्सर किसान नजरअंदाज कर देते हैं।
वैज्ञानिक पैकिंग से घटता है परिवहन नुकसान
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह के अनुसार, बाजार तक सुरक्षित पहुंचाने के लिए पैकिंग की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। निर्यात योग्य और उच्च गुणवत्ता वाले केले को विशेष रूप से तैयार किए गए कॉरुगेटेड फाइबर बोर्ड (CFB) बॉक्स में पैक किया जाता है।
उन्होंने बताया कि पैकिंग के दौरान रोगग्रस्त या क्षतिग्रस्त फलों को अलग कर दिया जाता है और केवल अच्छी गुणवत्ता वाले फलों को ही बॉक्स में रखा जाता है। आवश्यकता पड़ने पर फोम नेट, लाइनर या अन्य कुशनिंग सामग्री का उपयोग किया जाता है, जिससे परिवहन के दौरान फलों को नुकसान न पहुंचे। बॉक्स में पर्याप्त वेंटिलेशन भी रखा जाता है ताकि फल लंबे समय तक सुरक्षित रहें।
निर्यात के लिए कोल्ड चेन जरूरी
प्रो. सिंह ने कहा कि यदि केले को दूरस्थ बाजारों या निर्यात के लिए भेजना हो तो कोल्ड चेन व्यवस्था अनिवार्य हो जाती है। इसमें प्री-कूलिंग, नियंत्रित तापमान, उचित आर्द्रता और रेफ्रिजरेटेड परिवहन शामिल हैं।
उन्होंने बताया कि कोल्ड चेन के उपयोग से फलों की गुणवत्ता लंबे समय तक बनी रहती है और परिवहन के दौरान होने वाला नुकसान काफी कम हो जाता है। यही कारण है कि विकसित देशों के बाजारों में कोल्ड चेन को पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन का अभिन्न हिस्सा माना जाता है।
वैज्ञानिक प्रबंधन से बढ़ेगी किसानों की आय
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह ने कहा कि वैज्ञानिक पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन अपनाने से फलों की चमक, आकार, गुणवत्ता और बाजार स्वीकार्यता में सुधार होता है। इससे सड़न कम होती है, शेल्फ लाइफ बढ़ती है और सुपरमार्केट तथा निर्यात बाजारों में बेहतर कीमत मिलने की संभावना बढ़ जाती है।
उन्होंने बताया कि बेहतर ग्रेडिंग और गुणवत्ता के कारण किसानों को अपने उत्पाद का अधिक मूल्य प्राप्त होता है, जिससे उनकी शुद्ध आय में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। साथ ही फसल की बर्बादी कम होने से कृषि क्षेत्र में संसाधनों का बेहतर उपयोग भी सुनिश्चित होता है।
केवल उत्पादन नहीं, गुणवत्ता भी है जरूरी
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह ने कहा कि आज के प्रतिस्पर्धी कृषि बाजार में सफलता केवल अधिक उत्पादन पर निर्भर नहीं करती, बल्कि गुणवत्ता पर भी आधारित होती है। यदि किसान कटाई के बाद वैज्ञानिक धुलाई, स्वच्छता, उचित उपचार, नियंत्रित सुखाने, आधुनिक पैकिंग और कोल्ड चेन प्रबंधन को अपनाएं तो वे अपने केले को घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय बाजार में भी प्रतिस्पर्धी बना सकते हैं।
उन्होंने किसानों से अपील करते हुए कहा कि “अच्छी खेती से उत्पादन बढ़ता है, लेकिन वैज्ञानिक पोस्ट-हार्वेस्ट प्रबंधन उस उत्पादन को बेहतर गुणवत्ता और अधिक मुनाफे में बदलने का काम करता है। इसलिए खेती के साथ-साथ कटाई के बाद की तकनीकों पर भी समान ध्यान देना समय की मांग है।”


























