ICRISAT: रोपाई तकनीक से बदलेगी अरहर की खेती की तस्वीर!

अरहर की खेती में रोपाई तकनीक से 20 प्रतिशत तक बढ़ सकती है पैदावार: ICRISAT शोध

हैदराबाद –दलहन फसलों में प्रमुख अरहर (पिजनपी) की खेती को लेकर एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक निष्कर्ष सामने आया है। अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT) के नवीनतम शोध के अनुसार, यदि अरहर की खेती में सीधी बुवाई के स्थान पर रोपाई (ट्रांसप्लांटिंग) तकनीक अपनाई जाए, तो पैदावार में लगभग 20 प्रतिशत तक की वृद्धि संभव है। यह तकनीक न केवल किसानों की आय बढ़ाने में सहायक है, बल्कि वर्षा आधारित क्षेत्रों में खेती को जलवायु परिवर्तन के जोखिमों से भी अधिक सुरक्षित बनाती है।

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ICRISAT के शोध में बताया गया है कि रोपाई तकनीक अपनाने से अरहर की उत्पादकता 2.5 टन प्रति हेक्टेयर से बढ़कर लगभग 3 टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच सकती है। इसके साथ ही फसल की अवधि भी कम होती है, जिससे किसानों को कम समय में बेहतर उत्पादन प्राप्त हो सकता है।

क्या है अरहर की रोपाई तकनीक

रोपाई पद्धति में अरहर के बीजों को सीधे खेत में बोने के बजाय पहले छोटी नर्सरी में पौध तैयार की जाती है। बाद में इन स्वस्थ और विकसित पौधों को सही समय पर मुख्य खेत में लगाया जाता है। इससे फसल की शुरुआती अवस्था मजबूत होती है और पौधों की वृद्धि बेहतर ढंग से हो पाती है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इस तकनीक से मिट्टी में उपलब्ध नमी का अधिकतम उपयोग संभव होता है और शुरुआती सूखे, अनियमित मानसून तथा कम वर्षा जैसी परिस्थितियों से फसल को सुरक्षा मिलती है।

वर्षा आधारित क्षेत्रों के लिए कारगर समाधान

भारत में अरहर की खेती का बड़ा हिस्सा वर्षा आधारित क्षेत्रों में होता है। वर्तमान में इन क्षेत्रों में अरहर की औसत उपज 0.8 से 0.9 टन प्रति हेक्टेयर ही है, जबकि वैज्ञानिक रूप से इसकी संभावित पैदावार 1.8 से 2.5 टन प्रति हेक्टेयर तक मानी जाती है। इस अंतर का प्रमुख कारण पारंपरिक कृषि पद्धतियां और जलवायु संबंधी चुनौतियां हैं।

ICRISAT के शोध में यह स्पष्ट हुआ है कि रोपाई तकनीक अपनाकर इस उत्पादकता अंतर को स्थायी रूप से कम किया जा सकता है और किसानों को अधिक लाभ दिलाया जा सकता है।

वैज्ञानिकों ने जताया भरोसा

ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि रोपाई एक पुरानी और सिद्ध कृषि पद्धति है, जिसने धान जैसी सिंचित फसलों में उत्पादन क्रांति लाई है।
उन्होंने कहा, हमारे शोध से यह साबित हुआ है कि यही तकनीक वर्षा आधारित परिस्थितियों में अरहर जैसी फसलों की पूरी व्यावसायिक क्षमता को सामने ला सकती है।”

संस्थान में किए गए विभिन्न फील्ड ट्रायल्स में यह पाया गया कि रोपाई से उगाई गई अरहर की फसल ने अलग-अलग जलवायु परिस्थितियों में सीधी बुवाई वाली फसल की तुलना में लगातार बेहतर प्रदर्शन किया।

मजबूत जड़ प्रणाली से बढ़ती है सहनशीलता

ICRISAT के अनुसार, रोपाई से तैयार पौधों की जड़ें अधिक मजबूत और गहराई तक विकसित होती हैं, जिससे पौधे पानी और पोषक तत्वों का बेहतर अवशोषण कर पाते हैं। यही कारण है कि ऐसी फसलें सूखा, कम वर्षा और मौसम की अनिश्चितताओं का बेहतर सामना कर पाती हैं।

ICRISAT के उप महानिदेशक (अनुसंधान एवं नवाचार) डॉ. स्टैनफोर्ड ब्लेड ने बताया कि रोपाई तकनीक से फसल की अवधि 12 से 18 दिन तक कम हो जाती है। इससे फसल जल्दी पकती है और कटाई के समय मिट्टी में नमी की कमी का जोखिम कम हो जाता है।
उन्होंने कहा, कई बार सबसे प्रभावी समाधान नई तकनीक में नहीं, बल्कि बुनियादी विज्ञान और पारंपरिक तरीकों को आधुनिक संदर्भ में अपनाने में होता है।”

ओडिशा में बड़े पैमाने पर विस्तार की पहल

इस तकनीक को किसानों तक व्यापक स्तर पर पहुंचाने के उद्देश्य से ICRISAT ने ओडिशा में एक बहु-हितधारक परामर्श बैठक का आयोजन किया। इस बैठक में शोध संस्थानों, कृषि विस्तार एजेंसियों, राज्य सरकार के अधिकारियों और किसानों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया।

बैठक के दौरान अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में टिकाऊ अरहर उत्पादन हेतु पौध रोपाई प्रोटोकॉल जारी किया गया। इसका उद्देश्य रोपाई तकनीक को मानकीकृत करना और खेत स्तर पर गुणवत्ता व एकरूपता सुनिश्चित करना है।

इस अवसर पर ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने आधिकारिक रूप से इस प्रोटोकॉल का विमोचन किया।

किसानों से मिला सकारात्मक फीडबैक

ओडिशा सरकार के कृषि विभाग का प्रतिनिधित्व कर रहे  अरुण कुमार बेहरा ने कहा कि फील्ड ट्रायल्स के परिणाम उत्साहजनक हैं और किसानों से भी इस तकनीक को लेकर सकारात्मक प्रतिक्रिया मिली है।
उन्होंने कहा कि यह पहल राज्य में दलहन उत्पादन बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है।

इस शोध और परीक्षण कार्य का नेतृत्व ICRISAT के वैज्ञानिक डॉ. रमेश सिंह, डॉ. शलंदर कुमार और डॉ. गजानन सावरगांवकर ने किया।

किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में अहम कदम

कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अरहर की रोपाई तकनीक को नीति समर्थन और विस्तार सेवाओं के माध्यम से बड़े पैमाने पर लागू किया जाता है, तो इससे न केवल दलहन उत्पादन में वृद्धि होगी, बल्कि किसानों की आय, खाद्य सुरक्षा और जलवायु सहनशील कृषि को भी मजबूती मिलेगी।