उत्तर भारत में आम उत्पादन के लिए मंजर-पूर्व स्प्रे शेड्यूल पर जोर
वैज्ञानिक प्रबंधन से सुनिश्चित होगा बेहतर फल-सेट और अधिक उपज
समस्तीपुर (बिहार) -आम भारत की प्रमुख फल फसलों में से एक है और उत्तर भारत, विशेषकर बिहार, इसकी व्यावसायिक खेती का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र माना जाता है। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार आम की पैदावार और गुणवत्ता का सीधा संबंध मंजर (पुष्प) निकलने से पूर्व किए गए वैज्ञानिक बाग प्रबंधन से होता है। यदि इस संवेदनशील अवस्था में पोषण, रोग-कीट नियंत्रण और वानस्पतिक (शाकीय) वृद्धि का संतुलन बिगड़ जाए, तो मंजर कमजोर, अनियमित या विलंब से निकलता है, जिसका सीधा असर फल-धारण और कुल उत्पादन पर पड़ता है।
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डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के पूर्व सह निदेशक (अनुसंधान) एवं पोस्ट ग्रेजुएट विभाग, प्लांट पैथोलॉजी एवं नेमेटोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह ने बताया कि वर्तमान समय में जलवायु परिवर्तन, असामान्य ठंड, कोहरा और रोग-कीटों की बढ़ती तीव्रता के कारण आम की खेती में पारंपरिक तरीकों के साथ-साथ अत्याधुनिक और समयबद्ध स्प्रे शेड्यूल अपनाना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
मंजर-पूर्व अवस्था: बाग प्रबंधन की निर्णायक कड़ी
कृषि वैज्ञानिक के अनुसार आम में पुष्प कलिका विभेदन (फ्लावर बड डिफरेंशिएशन) की प्रक्रिया अक्टूबर-नवंबर में शुरू होकर दिसंबर-जनवरी तक पूरी होती है। इसी अवधि में आम का पेड़ यह तय करता है कि वह शाकीय वृद्धि करेगा या पुष्पन की ओर अग्रसर होगा। बिहार की जलवायु परिस्थितियों में यदि इस समय अत्यधिक नाइट्रोजन उर्वरक, अधिक सिंचाई या रोग-कीटों का प्रकोप हो जाए, तो मंजर आने में बाधा उत्पन्न होती है। इसलिए इस अवस्था में विकास नियामकों, सूक्ष्म पोषक तत्वों और रोगनाशकों का संतुलित उपयोग अत्यंत लाभकारी सिद्ध होता है।
फल तुड़ाई के बाद रोगों से सुरक्षा जरूरी
एस.के. सिंह के अनुसार फल तुड़ाई के बाद (अक्टूबर-नवंबर) आम के पेड़ों पर अनेक फफूंदजनित रोगों के बीजाणु सक्रिय रहते हैं। यही बीजाणु आगे चलकर पाउडरी मिल्ड्यू और एन्थ्रेक्नोज जैसे गंभीर रोगों का कारण बनते हैं। इस खतरे को कम करने के लिए कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 0.3 प्रतिशत (3 ग्राम प्रति लीटर पानी) का छिड़काव अत्यंत उपयोगी बताया गया है। यह स्प्रे टहनियों, तने और शाखाओं को रोगमुक्त कर अगली स्वस्थ बढ़वार की मजबूत नींव रखता है।
पुष्प प्रेरण के लिए पोषण प्रबंधन
नवीन अनुसंधानों में यह स्पष्ट हुआ है कि पोटैशियम आधारित पोषक तत्व आम में पुष्पन को प्रोत्साहित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। नवंबर-दिसंबर के दौरान पोटैशियम नाइट्रेट (KNO₃) 1 प्रतिशत या पोटैशियम सल्फेट 1 प्रतिशत का छिड़काव करने से शाकीय वृद्धि नियंत्रित रहती है और पुष्प कलिकाओं का विकास बेहतर होता है। यह तकनीक विशेष रूप से उन बागों के लिए उपयोगी मानी जाती है, जहां हर वर्ष मंजर अनियमित रूप से निकलता है।
पैक्लोब्यूट्राजोल का विवेकपूर्ण उपयोग
अत्याधुनिक बागवानी पद्धतियों में पैक्लोब्यूट्राजोल (PBZ) को पुष्प प्रेरण का एक प्रभावी साधन माना जाता है। डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार दिसंबर के अंतिम सप्ताह से जनवरी के प्रथम पखवाड़े के बीच इसका प्रयोग केवल मिट्टी में ड्रेंचिंग के रूप में किया जाना चाहिए। इसकी अनुशंसित मात्रा 1.0 से 1.5 ग्राम सक्रिय तत्व प्रति मीटर कैनोपी व्यास है। यह रसायन जिबरेलिन हार्मोन के संश्लेषण को रोककर शाकीय वृद्धि को सीमित करता है और मंजर निकलने की प्रक्रिया को बढ़ावा देता है। हालांकि, वैज्ञानिकों ने इसे केवल स्वस्थ पेड़ों में, वैकल्पिक वर्षों में और विशेषज्ञ देखरेख में ही प्रयोग करने की सलाह दी है।
मंजर से पहले रोग-कीट नियंत्रण अनिवार्य
जनवरी माह में मंजर निकलने से ठीक पहले पाउडरी मिल्ड्यू, एन्थ्रेक्नोज, आम मिज, थ्रिप्स और हॉपर्स जैसे कीटों का खतरा बढ़ जाता है। इस अवस्था में हेक्साकोनाजोल 0.1 प्रतिशत या डाइफेनोकोनाजोल 0.05 प्रतिशत के साथ इमिडाक्लोप्रिड 0.5 मिली प्रति लीटर या थायमेथोक्साम 0.25 ग्राम प्रति लीटर का संयुक्त छिड़काव अत्यंत प्रभावी पाया गया है। यह स्प्रे मंजर को प्रारंभिक संक्रमण से बचाकर उसकी गुणवत्ता बनाए रखता है।
सूक्ष्म पोषक तत्वों से सुधरेगा फल-सेट
कृषि अनुसंधानों में यह भी सामने आया है कि बोरॉन और जिंक की कमी के कारण पुष्प झड़ने की समस्या बढ़ जाती है। मंजर निकलने से ठीक पहले बोरिक एसिड 0.2 प्रतिशत तथा जिंक सल्फेट 0.5 प्रतिशत के साथ बुझा चूना 0.25 प्रतिशत का छिड़काव करने से परागण क्षमता में वृद्धि होती है और फल-सेट में उल्लेखनीय सुधार देखा गया है।
जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखकर बरतें सावधानी
प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह ने बताया कि बिहार में जनवरी-फरवरी के दौरान कोहरा, पाला और असामान्य ठंड आम की फसल को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकती है। इसलिए छिड़काव हमेशा साफ मौसम में, सुबह 10 बजे से पहले या शाम 3 बजे के बाद ही करना चाहिए। ठंड या पाले की चेतावनी मिलने पर स्प्रे स्थगित करना ही सुरक्षित माना जाता है।
सारांश
कृषि वैज्ञानिक का मानना है कि आम में मंजर आने से पूर्व की अवधि बाग प्रबंधन की सबसे निर्णायक अवस्था होती है। संतुलित पोषण, नियंत्रित शाकीय वृद्धि, समयबद्ध रोग-कीट प्रबंधन और आधुनिक विकास नियामकों के विवेकपूर्ण उपयोग से बिहार और उत्तर भारत के किसान एकसार, स्वस्थ और मजबूत मंजर प्राप्त कर सकते हैं। इससे न केवल फल-धारण बढ़ेगा, बल्कि उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में स्थायी सुधार संभव होगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण):
यह जानकारी सामान्य वैज्ञानिक अनुशंसाओं पर आधारित है। क्षेत्र, किस्म, जलवायु और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार तकनीकी सुझावों में परिवर्तन संभव है। अतः अधिक सटीक एवं क्षेत्र-विशेष मार्गदर्शन के लिए नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र (KVK), कृषि विश्वविद्यालय या मान्यता प्राप्त कृषि संस्थान से परामर्श अवश्य करें।
प्रो. (डॉ.) एस. के. सिंह विभागाध्यक्ष, पादप रोग विज्ञान एवं नेमेटोलॉजी अधिकारी-प्रभारी, केला अनुसंधान केन्द्र, गोरौल डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा संपर्क: sksraupusa@gmail.com