पीएमएमएसवाई के तहत शीतजल मत्स्य क्षेत्र में ₹2,299 करोड़ से अधिक का निवेश | उत्तराखंड में ₹317 करोड़ की परियोजनाएं स्वीकृत, 2028-29 तक 1,500 रेसवे बनाने का लक्ष्य!
मुनस्यारी/पिथौरागढ़, 18 अक्टूबर। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्रों में शीतजल मत्स्य पालन को आजीविका और कारोबार का मजबूत माध्यम बनाने की दिशा में केंद्र सरकार ने प्रयास तेज किए हैं। मत्स्य विभाग, भारत सरकार के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने रविवार को पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी का दौरा कर ट्राउट मछली पालन की प्रगति की समीक्षा की। इस दौरान उन्होंने स्थानीय मत्स्य किसानों से संवाद किया और सहकारी समितियों की ओर से अपनाई जा रही रेनबो ट्राउट पालन की गतिविधियों का जायजा लिया।
डॉ. लिखी ने नामजला ट्राउट फार्म और जोहार मत्स्य स्वायत्त सहकारिता से जुड़े किसानों के साथ बातचीत में उनके अनुभवों और चुनौतियों को जाना। उन्होंने स्थानीय सहकारी संस्थाओं की पहल की सराहना करते हुए कहा कि शीतजल मत्स्य पालन पहाड़ी क्षेत्रों में किसानों की आय बढ़ाने, आजीविका के नए विकल्प विकसित करने और सीमावर्ती गांवों की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
ग्लेशियर से निकलने वाली नदियां ट्राउट पालन के लिए अनुकूल
मुनस्यारी में गोरी गंगा नदी की हिमनदीय जलधाराओं और अनुकूल तापमान के कारण रेनबो ट्राउट पालन की अच्छी संभावनाएं हैं। यहां स्थानीय स्तर पर शुरू हुई मत्स्य पालन गतिविधियां अब धीरे-धीरे अर्ध-व्यावसायिक स्वरूप ले रही हैं। इससे किसानों को पारंपरिक आजीविका के साथ आय का अतिरिक्त स्रोत मिल रहा है।
ट्राउट जैसी उच्च मूल्य वाली मछली की मांग को देखते हुए इस क्षेत्र में उत्पादन, प्रसंस्करण, भंडारण और बाजार तक पहुंच मजबूत करने की जरूरत है। स्थानीय सहकारी समितियां इस दिशा में किसानों को संगठित करने और उत्पादन गतिविधियों को बढ़ावा देने में भूमिका निभा रही हैं।
छह हिमालयी राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों पर फोकस
केंद्र सरकार के अनुसार, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में शीतजल मत्स्य पालन की व्यापक संभावनाएं हैं। यहां की नदियां, ऊंचाई पर स्थित झीलें और ठंडे पानी के प्राकृतिक स्रोत रेनबो ट्राउट सहित कई उच्च मूल्य वाली मछली प्रजातियों के अनुकूल हैं।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के अंतर्गत इन क्षेत्रों में रेसवे, हैचरी, फीड मिल, कोल्ड स्टोरेज और कटाई के बाद की सुविधाओं के विकास को समर्थन दिया गया है। विभागीय आंकड़ों के मुताबिक, इन राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में 5,600 से अधिक रेसवे, 54 हैचरी, 293 कोल्ड स्टोरेज और 260 फीड मिल स्वीकृत किए गए हैं।
इस बुनियादी ढांचे का उद्देश्य मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता, वैज्ञानिक पालन तकनीकों के प्रसार और बाजार तक उत्पाद पहुंचाने की व्यवस्था को बेहतर बनाना है।
उत्तराखंड में ₹170 करोड़ की ट्राउट प्रोत्साहन योजना
उत्तराखंड सरकार ने ट्राउट पालन को बढ़ावा देने के लिए ट्राउट प्रोत्साहन योजना शुरू की है। इसके लिए ₹170 करोड़ का प्रावधान किया गया है। योजना के तहत वर्ष 2028-29 तक 1,500 रेसवे, 100 मिनी हैचरी और 600 कोल्ड स्टोरेज सुविधाएं स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है।
इसके अतिरिक्त, राज्य में ₹317 करोड़ की मत्स्य परियोजनाएं स्वीकृत की गई हैं। इनमें आधुनिक मत्स्य बाजार, लैंडिंग सेंटर और सितारगंज में एकीकृत एक्वा पार्क जैसी सुविधाएं शामिल हैं। इन परियोजनाओं से उत्पादन के साथ-साथ मछली के संग्रहण, विपणन और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
नेपाल को ट्राउट निर्यात, आईटीबीपी से भी बाजार संपर्क
उत्तराखंड में ट्राउट मछली पालन को बाजार से जोड़ने के प्रयास भी आगे बढ़े हैं। उपलब्ध विभागीय जानकारी के अनुसार, राज्य ने जून 2026 में नेपाल को ट्राउट का पहला अंतरराष्ट्रीय निर्यात किया। इससे स्थानीय उत्पादकों के लिए सीमा पार व्यापार के नए अवसर खुले हैं।
इसके अलावा, उत्तराखंड सरकार और भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के बीच हुए समझौता ज्ञापन के तहत आईटीबीपी को ट्राउट की आपूर्ति की जा रही है। संस्थागत खरीदारों से जुड़ाव किसानों को बाजार की बेहतर उपलब्धता प्रदान कर सकता है और उत्पादन संबंधी निर्णयों में मददगार बन सकता है।
वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशिक्षण की अहम भूमिका
डॉ. लिखी ने भीमताल स्थित भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के केंद्रीय शीतजल मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान (ICAR-DCFR) की भूमिका की सराहना की। संस्थान ने मुनस्यारी में रेनबो ट्राउट पालन को बढ़ावा देने के साथ मछली बीज उत्पादन, रोग प्रबंधन और किसानों को प्रशिक्षण देने में वैज्ञानिक सहयोग प्रदान किया है।
वैज्ञानिक तकनीकों का उपयोग ट्राउट पालन में उत्पादन की गुणवत्ता बनाए रखने, मछलियों में रोगों का प्रबंधन करने और किसानों की लागत कम करने के लिहाज से महत्वपूर्ण है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में स्थानीय जलवायु के अनुरूप पालन पद्धतियों का विकास भी इस क्षेत्र के विस्तार में मदद कर सकता है।
आजीविका से आगे, पर्यटन और जैव विविधता को भी लाभ
शीतजल मत्स्य पालन का महत्व केवल मछली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इससे ग्रामीण और सीमावर्ती क्षेत्रों में स्वरोजगार, स्थानीय बाजार, परिवहन और पर्यटन से जुड़ी आर्थिक गतिविधियों को भी प्रोत्साहन मिल सकता है। ट्राउट फार्म को स्थानीय पर्यटन गतिविधियों से जोड़ने पर किसानों के लिए आय के अतिरिक्त अवसर विकसित हो सकते हैं।
इसके साथ ही, हिमालयी नदियों के पारिस्थितिक संतुलन और महाशीर जैसी महत्वपूर्ण मछली प्रजातियों के संरक्षण पर भी ध्यान देना जरूरी है। वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल मत्स्य प्रबंधन से उत्पादन बढ़ाने तथा प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के बीच संतुलन बनाने में मदद मिल सकती है।
मुनस्यारी का दौरा हिमालयी क्षेत्रों में शीतजल मत्स्य पालन की संभावनाओं को आगे बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। अब इस क्षेत्र की सफलता उत्पादन क्षमता के विस्तार, किसानों को नियमित बाजार उपलब्ध कराने, वैज्ञानिक प्रशिक्षण और टिकाऊ जल प्रबंधन के प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।





























