राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के क्रियान्वयन में तेजी लाने की तैयारी, डेयरी सहकारिता से डिजिटल बैंकिंग तक प्राथमिकताएं तय
सहकारी संस्थाओं को आत्मनिर्भर बनाने, श्वेत क्रांति 2.0 को गति देने और सहकारी उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने पर जोर
नई दिल्ली। राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के प्रभावी क्रियान्वयन और देश में सहकारिता क्षेत्र को अधिक सशक्त, आधुनिक एवं आत्मनिर्भर बनाने के उद्देश्य से सहकारिता मंत्रालय ने इसके कार्यान्वयन की प्रगति की समीक्षा की। केंद्रीय सहकारिता राज्य मंत्री कृष्ण पाल गुर्जर और मुरलीधर मोहोल की सह-अध्यक्षता में हुई बैठक में सहकारी संस्थाओं की आर्थिक क्षमता बढ़ाने, संस्थागत ढांचे को मजबूत करने तथा नए क्षेत्रों में सहकारिता का विस्तार करने से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई।
बैठक में कृष्ण पाल गुर्जर ने प्रत्यक्ष रूप से भाग लिया, जबकि मुरलीधर मोहोल वर्चुअल माध्यम से शामिल हुए। उन्होंने एजेंडे में शामिल प्रमुख विषयों पर अपने सुझाव प्रस्तुत किए। बैठक में सहकारी क्षेत्र को देश की आर्थिक प्रगति, ग्रामीण विकास और रोजगार सृजन का मजबूत आधार बनाने पर विशेष जोर दिया गया।
डेयरी सहकारिता और श्वेत क्रांति 2.0 को मिलेगी गति
बैठक में श्वेत क्रांति 2.0 को आगे बढ़ाने के लिए डेयरी सहकारी समितियों की भूमिका को महत्वपूर्ण बताया गया। इसके तहत डेयरी क्षेत्र में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल, सहकारी संस्थाओं की कार्यक्षमता बढ़ाने और विकेंद्रीकृत बायोगैस उत्पादन को प्रोत्साहित करने जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
इस पहल का उद्देश्य दुग्ध उत्पादकों को सहकारी व्यवस्था से जोड़कर उनकी आय के अवसर बढ़ाना, ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती देना और कृषि एवं पशुपालन आधारित गतिविधियों में संसाधनों का बेहतर उपयोग सुनिश्चित करना है।
सहकारी उत्पादों की ब्रांडिंग और निर्यात पर जोर
सहकारी संस्थाओं के उत्पादों को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक पहुंचाने के लिए प्रभावी ब्रांडिंग, विपणन और निर्यात व्यवस्था विकसित करने पर भी विचार किया गया। इस दिशा में भौगोलिक संकेतक (GI टैग), बौद्धिक संपदा अधिकार (IPR), ‘एक जिला, एक उत्पाद’ (ODOP) पहल और ‘भारत’ अम्ब्रेला ब्रांड के माध्यम से सहकारी उत्पादों की पहचान मजबूत करने पर जोर दिया गया।
इस रणनीति से स्थानीय उत्पादों को व्यापक बाजार उपलब्ध कराने, उत्पादकों को बेहतर मूल्य दिलाने और सहकारी उद्यमों की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
सहकारी बैंकों और ऋण व्यवस्था को मजबूत करने की तैयारी
बैठक में सहकारी ऋण व्यवस्था के तीन स्तरीय ढांचे को सुदृढ़ बनाने पर विशेष चर्चा हुई। इसमें प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (PACS), जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (DCCBs) और राज्य सहकारी बैंक (StCBs) शामिल हैं।
प्रमुख प्राथमिकताओं में सहकारी बैंकों की शाखाओं का विस्तार, वित्तीय उत्पादों में विविधता, सरकारी कारोबार से जुड़ने के अवसर बढ़ाना तथा साइबर सुरक्षा और डिजिटल क्षमताओं को मजबूत करना शामिल रहा। शहरी सहकारी बैंकों को सशक्त बनाने के लिए राष्ट्रीय शहरी सहकारी वित्त एवं विकास निगम (NUCFDC) की भूमिका पर भी विचार किया गया।
कमजोर सहकारी समितियों के पुनरुद्धार पर ध्यान
बैठक में कमजोर सहकारी समितियों को पुनर्जीवित करने और उन्हें आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने की जरूरत पर बल दिया गया। इसके लिए राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम (NCDC) और राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) के सहयोग से बैंक योग्य परियोजनाओं को विकसित करने तथा वित्तीय सहायता के अवसर बढ़ाने पर चर्चा हुई।
इसके साथ ही कृषि, डेयरी, हथकरघा, हस्तशिल्प और लघु वनोपज जैसे क्षेत्रों में सहकारी गतिविधियों का विस्तार करने की प्राथमिकता सामने आई।
परिवहन, बायोगैस और ऐप आधारित सेवाओं में भी बढ़ेंगे अवसर
सहकारी संस्थाओं को पारंपरिक गतिविधियों तक सीमित न रखते हुए परिवहन, बायोगैस और ऐप आधारित सेवाओं जैसे उभरते क्षेत्रों में भी विस्तार के लिए प्रोत्साहित करने पर चर्चा की गई। इसका उद्देश्य सदस्यों के लिए आय के नए स्रोत विकसित करना, स्थानीय स्तर पर उद्यमिता को बढ़ावा देना और सहकारी संस्थाओं को बदलती आर्थिक जरूरतों के अनुरूप तैयार करना है।
‘सहकार से समृद्धि’ के लक्ष्य को आगे बढ़ाने पर जोर
बैठक में सहकारिता मंत्रालय ने राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 के प्रभावी क्रियान्वयन में तेजी लाने, संस्थागत क्षमता बढ़ाने और समावेशी विकास को प्रोत्साहित करने की प्रतिबद्धता दोहराई। लक्ष्य एक ऐसी सहकारी व्यवस्था विकसित करना है, जो आर्थिक रूप से सक्षम, तकनीकी रूप से आधुनिक, मजबूत और आत्मनिर्भर हो।
बैठक में सहकारिता मंत्रालय के सचिव डॉ. आशीष भूटानी, संयुक्त सचिव रमन कुमार तथा मंत्रालय के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहे।
क्या है व्यापक महत्व?
राष्ट्रीय सहकारिता नीति 2025 का प्रभावी क्रियान्वयन डेयरी उत्पादकों, किसानों, कारीगरों, ग्रामीण उद्यमियों और सहकारी संस्थाओं के लिए नए अवसर पैदा कर सकता है। डिजिटल सेवाओं, बेहतर वित्तीय पहुंच, मजबूत ब्रांडिंग और विविध व्यावसायिक गतिविधियों के माध्यम से सहकारिता क्षेत्र को ग्रामीण आय, रोजगार और स्थानीय आर्थिक विकास का अधिक प्रभावी माध्यम बनाने की दिशा में यह पहल महत्वपूर्ण है।





























