जलवायु संकट से निपटने को ओडिशा में नई कृषि रणनीति लागू !!
भुवनेश्वर -ओडिशा में बार-बार पड़ने वाले सूखे और जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए एक व्यापक और विज्ञान-आधारित पहल की शुरुआत की गई है। अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (ICRISAT), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के अधीन केंद्रीय शुष्क भूमि कृषि अनुसंधान संस्थान (ICAR-CRIDA) और अंतरराष्ट्रीय चावल अनुसंधान संस्थान (IRRI) ने ओडिशा सरकार के साथ मिलकर ओडिशा कृषि सूखा शमन कार्यक्रम (Odisha Agriculture Drought Mitigation Programme – OADMP) को धरातल पर उतारने की दिशा में कदम बढ़ाया है। इस कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत के अवसर पर भुवनेश्वर में राज्य स्तरीय इन्सेप्शन वर्कशॉप का आयोजन किया गया।
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सूखा प्रभावित कृषि को मिलेगा एकीकृत समाधान !!
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने इस बात पर सहमति जताई कि सूखा प्रबंधन के लिए अब पारंपरिक और अलग-अलग योजनाओं पर आधारित प्रयासों से आगे बढ़ने की जरूरत है। ICRISAT के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. शालंदर कुमार ने कार्यक्रम की रूपरेखा स्पष्ट करते हुए कहा कि कृषि में टिकाऊ बदलाव लाने के लिए एकीकृत प्रणाली आधारित दृष्टिकोण अपनाना अनिवार्य है। उन्होंने बताया कि रेजिलिएंट एग्रीकल्चर विलेज क्लस्टर (RAVCs) के माध्यम से गांवों के समूह को केंद्र में रखकर ऐसी कृषि प्रणालियां विकसित की जाएंगी, जो सूखे के प्रभाव को कम करने में सक्षम हों।
बड़े पैमाने पर समाधान लागू करने की जरूरत !!
डॉ. शालंदर कुमार ने कहा कि केवल छोटे स्तर पर हस्तक्षेप करने से अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। उन्होंने जोर दिया कि सूखा-प्रवण क्षेत्रों में किसानों की आय और आजीविका को सुरक्षित करने के लिए समाधानों को बड़े पैमाने पर लागू करना, कृषि उत्पादन को बाजार और मूल्य श्रृंखलाओं से जोड़ना तथा संसाधनों के कुशल उपयोग पर ध्यान देना आवश्यक है।
तकनीकी विशेषज्ञों ने साझा किया अनुभव !!
कार्यशाला के दौरान विभिन्न संस्थानों के विशेषज्ञों ने सूखा प्रबंधन, फसल विविधीकरण, बीज प्रणाली, मृदा एवं जल संरक्षण जैसे विषयों पर तकनीकी जानकारी साझा की। ICRISAT के डॉ. गजानन सावरगांवकर ने कृषि-प्रबंधन से जुड़े पहलुओं पर प्रकाश डाला, जबकि IRRI की डॉ. स्वाति नायक ने सूखा सहनशील बीजों और बीज प्रणाली को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया। वहीं ICAR-CRIDA के डॉ. के. वी. राव ने मृदा एवं जल संरक्षण तकनीकों की भूमिका को रेखांकित किया। संस्थान के निदेशक डॉ. वी. के. सिंह और वैज्ञानिक डॉ. जी. वेंकटेश्वरलु ने भी सूखा प्रभावित क्षेत्रों में वैज्ञानिक अनुसंधान के व्यावहारिक उपयोग पर अपने विचार रखे।
अंतरराष्ट्रीय अनुभव से राज्य को मिलेगा लाभ !!
ICRISAT के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक ने कहा कि OADMP इस बात का उदाहरण है कि किस प्रकार अंतरराष्ट्रीय अनुसंधान और विशेषज्ञता को राज्य की प्राथमिकताओं के अनुरूप उपयोग में लाया जा सकता है। उन्होंने बताया कि इस तरह की साझेदारियां न केवल सूखा शमन में मदद करती हैं, बल्कि दीर्घकालिक रूप से जलवायु-अनुकूल कृषि को भी बढ़ावा देती हैं।
जिला स्तर पर तैयारी और विभागीय समन्वय पर चर्चा !!
कार्यशाला में ओडिशा सरकार के वरिष्ठ अधिकारी, जिला प्रशासन के प्रतिनिधि, तकनीकी विशेषज्ञ और विभिन्न सहयोगी संस्थानों के प्रतिनिधि मौजूद रहे। इस दौरान जिला स्तर पर सूखा तैयारी, विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय तथा योजनाओं के प्रभावी क्रियान्वयन पर गहन चर्चा की गई। सामुदायिक संस्थाओं की अहम भूमिका कार्यक्रम में इस बात पर भी जोर दिया गया कि सूखा शमन की पहल को स्थायी बनाने में स्वयं सहायता समूहों (SHGs) और किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) जैसी सामुदायिक संस्थाओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होगी। इनके माध्यम से किसानों तक तकनीक, जानकारी और संसाधनों की पहुंच सुनिश्चित की जा सकेगी।
अन्य राज्यों के लिए बनेगा उदाहरण !!
विज्ञान आधारित योजना, संस्थागत समन्वय और समुदाय की भागीदारी को एक साथ जोड़ते हुए ओडिशा कृषि सूखा शमन कार्यक्रम को भविष्य में एक विस्तार योग्य मॉडल के रूप में देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस कार्यक्रम से मिले अनुभव और परिणाम न केवल ओडिशा बल्कि देश के अन्य सूखा प्रभावित राज्यों के लिए भी मार्गदर्शक सिद्ध हो सकते हैं।