मत्स्य पालन बना किसानों की आय बढ़ाने का जरिया
नई दिल्ली, — देश में हर वर्ष 10 जुलाई को ‘राष्ट्रीय मत्स्य किसान दिवस’ (National Fish Farmers Day) के रूप में मनाया जाता है। यह दिन देश के उन लाखों मत्स्य पालकों और जल कृषि क्षेत्र में कार्यरत किसानों को सम्मानित करने और उनके योगदान को रेखांकित करने का एक अवसर होता है, जिन्होंने भारत को दुनिया के प्रमुख मत्स्य उत्पादक देशों में स्थापित करने में भूमिका निभाई है।
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मत्स्य पालन या ‘एक्वाकल्चर’ (Aquaculture) अब सिर्फ परंपरागत तालाबों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक तेजी से उभरता हुआ कृषि व्यवसाय बन चुका है। बदलते जलवायु और घटती खेती की लाभप्रदता के दौर में, यह क्षेत्र किसानों के लिए एक वैकल्पिक और लाभदायक स्रोत के रूप में सामने आया है।
राष्ट्रीय मत्स्य किसान दिवस का महत्व
यह दिवस प्रो. डॉ. हीरालाल चौधरी और डॉ. के.एच. अलीकुन्ही — की याद में मनाया जाता है, जिन्होंने 10 जुलाई 1957 को भारतीय मेजर कार्प्स (देशी मछलियों) में हाइपोफिसेशन तकनीक द्वारा कृत्रिम प्रजनन की दिशा में ऐतिहासिक सफलता प्राप्त की थी। इस नवाचार ने भारत में अंतर्देशीय जलीय कृषि क्षेत्र में क्रांति ला दी। आज भी, इस दिन देशभर में मछली पालकों को सम्मानित किया जाता है, सेमिनार व कार्यशालाएँ आयोजित की जाती हैं, और किसानों को नई तकनीकों की जानकारी दी जाती है।
मत्स्य पालन से लाभ की नई संभावनाएं
भारत के किसानों के लिए मत्स्य पालन आज कम लागत में अधिक मुनाफे का साधन बन चुका है। एक अनुमान के अनुसार, यदि 1 हेक्टेयर में वैज्ञानिक पद्धति से मछली पालन किया जाए, तो किसान 3 से 5 लाख रुपये वार्षिक आय प्राप्त कर सकता है। यह परंपरागत फसल उत्पादन की तुलना में कहीं अधिक लाभदायक है।
मत्स्य पालन में लगने वाला समय भी कम होता है। कुछ किस्मों की मछलियाँ जैसे रोहू, कतला, मृगल आदि 6 से 8 महीनों में बाजार में बिक्री के लिए तैयार हो जाती हैं। इसके अलावा, मत्स्य पालन में भूमि की उपजाऊता की अनिवार्यता नहीं होती, जिससे कम उपजाऊ भूमि पर भी इसका संचालन संभव है।
ग्लोबल नेतृत्व की ओर भारत
भारत आज झींगा (श्रिंप) निर्यात में अग्रणी देशों में शामिल है। समुद्री खाद्य निर्यात अब 60,500 करोड़ रुपये को पार कर गया है। पिछले दस वर्षों में झींगा उत्पादन में 270 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे न केवल लाखों रोजगार उत्पन्न हुए हैं, बल्कि मछुआरा समुदाय को भी सामाजिक और आर्थिक रूप से सशक्त बनाया गया है।
कहां हो रहा है अधिक उत्पादन?
आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, तमिलनाडु, बिहार और असम जैसे राज्य देश के प्रमुख मत्स्य उत्पादक हैं। अब उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, झारखंड और मध्य प्रदेश जैसे गैर-पारंपरिक राज्य भी इस क्षेत्र में तेजी से उभर रहे हैं। बायोफ्लॉक तकनीक ने इस बदलाव को और गति दी है, जिससे शहरी व सीमित क्षेत्रों में भी मछली पालन संभव हुआ है।
सरकारी सहायता और योजनाएं
भारत सरकार द्वारा प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) जैसे कई कार्यक्रमों के तहत किसानों को अनुदान, प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता दी जा रही है।
भारत सरकार ने मत्स्य पालन क्षेत्र को मजबूती देने और नीली क्रांति के तहत आर्थिक उन्नति की दिशा में कई महत्त्वपूर्ण पहल की हैं। वर्ष 2015 से अब तक सरकार ने इस क्षेत्र में 38,572 करोड़ रुपये का निवेश किया है, जिससे मत्स्य उत्पादन में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है।
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2013-14 में भारत का मछली उत्पादन 95.79 लाख टन था, जो 2024-25 में बढ़कर 195 लाख टन तक पहुंच गया — यानी 104 प्रतिशत की वृद्धि।
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विशेष रूप से अंतर्देशीय मत्स्य पालन और जलीय कृषि में 140 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है, जो भारत के जल संसाधनों और नवाचारों की उपयोगिता को दर्शाता है।
मत्स्य पालकों को बायोफ्लॉक तकनीक, आरएएस (Recirculatory Aquaculture System), और संकर प्रजातियों की मछलियों के पालन की ट्रेनिंग भी दी जा रही है। इसके साथ ही कोल्ड स्टोरेज, प्रोसेसिंग यूनिट और मछली मार्केटिंग में भी सहायता प्रदान की जा रही है।
किसानों के लिए सशक्त भविष्य की ओर कदम
मत्स्य पालन ने भारत के किसानों को सिर्फ कृषि पर निर्भरता से बाहर निकालने में मदद की है। यह ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, महिलाओं की भागीदारी और आय वृद्धि का सशक्त माध्यम बन रहा है।
राष्ट्रीय मत्स्य किसान दिवस का उद्देश्य न केवल इन वैज्ञानिक उपलब्धियों को स्मरण करना है, बल्कि मछलीपालकों, उद्यमियों और मछुआरों द्वारा देश के मत्स्य क्षेत्र के विकास में दिए गए योगदान को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना भी है। यह दिवस स्थायी जलीय कृषि और नीली अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए साझा विमर्श और रणनीतियों पर चर्चा करने का भी अवसर प्रदान करता है।
राष्ट्रीय मत्स्य किसान दिवस पर यह आवश्यक है कि किसानों को तकनीकी जानकारी, वित्तीय सहायता और बाजार तक सीधी पहुंच मिले, ताकि वे इस क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनें और भारत को ‘नीली क्रांति’ की ओर अग्रसर करें।
चित्र: प्रतीकात्मक