गौतम बुद्ध नगर के किसानों ने बताईं खेती की चुनौतियां, IARI ने शुरू की आय बढ़ाने की नई पहल
गौतम बुद्ध नगर (उत्तर प्रदेश)। किसानों की वास्तविक जरूरतों, कृषि संबंधी समस्याओं और ग्रामीण आजीविका की संभावनाओं को समझने के उद्देश्य से आईसीएआर-भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), नई दिल्ली द्वारा संचालित फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के तहत दादरी ब्लॉक के रूपवास, अमका, वीरपुरा और बम्बावड़ गांवों में किसान गोष्ठी एवं सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन (Participatory Rural Appraisal-PRA) कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में किसानों ने खेती से जुड़ी अनेक चुनौतियों को सामने रखा, वहीं वैज्ञानिकों ने क्षेत्र में कृषि एवं पशुपालन आधारित आय बढ़ाने के नए अवसरों की पहचान की।
जल प्रदूषण, रोग और आवारा पशु बने किसानों की बड़ी चिंता
गोष्ठी के दौरान किसानों ने बताया कि क्षेत्र में जल प्रदूषण, धान और गेहूं की फसलों में बढ़ते रोग तथा आवारा पशुओं द्वारा फसलों को होने वाला नुकसान कृषि उत्पादन को प्रभावित कर रहा है। किसानों का कहना था कि बढ़ती लागत और प्राकृतिक चुनौतियों के बीच फसलों की सुरक्षा एक बड़ी समस्या बनती जा रही है।
वैज्ञानिकों ने किसानों से विस्तार से चर्चा कर उनकी समस्याओं को दर्ज किया और खेतों का भ्रमण कर फसलों की वर्तमान स्थिति का आकलन किया। इसके साथ ही गांवों में पाले जा रहे गाय एवं भैंसों, विशेष रूप से देशी नस्ल के पशुओं का भी अवलोकन किया गया ताकि पशुपालन को आय के अतिरिक्त स्रोत के रूप में मजबूत किया जा सके।
कृषि के साथ पशुपालन और मत्स्य पालन में दिखी संभावनाएं
सहभागी ग्रामीण मूल्यांकन के दौरान यह सामने आया कि क्षेत्र में केवल पारंपरिक खेती ही नहीं, बल्कि सुअर पालन, मत्स्य पालन और मधुमक्खी पालन जैसी गतिविधियों में भी बेहतर संभावनाएं मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसानों को तकनीकी मार्गदर्शन और बाजार से जोड़ने की व्यवस्था मिले तो ये गतिविधियां ग्रामीण परिवारों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।
विशेषज्ञों ने कहा कि कृषि क्षेत्र में आय वृद्धि के लिए केवल फसल उत्पादन पर निर्भर रहने के बजाय बहुआयामी कृषि प्रणाली अपनाना समय की मांग है। इससे किसानों को जोखिम कम करने और अतिरिक्त आमदनी प्राप्त करने में मदद मिल सकती है।
FPO के माध्यम से बीज हब और सामूहिक विपणन पर जोर
कार्यक्रम के दौरान किसानों की आय बढ़ाने के लिए किसान उत्पादक संगठन (FPO) आधारित मॉडल पर भी चर्चा की गई। वैज्ञानिकों ने सुझाव दिया कि गांवों में बीज हब विकसित कर उच्च गुणवत्ता वाले बीजों का स्थानीय स्तर पर उत्पादन किया जा सकता है।
इसके अलावा कृषि उत्पादों में मूल्य संवर्धन (Value Addition) और सामूहिक विपणन (Collective Marketing) को बढ़ावा देकर किसानों को बेहतर बाजार और अधिक लाभ दिलाया जा सकता है। विशेषज्ञों ने बताया कि संगठित प्रयासों से छोटे और सीमांत किसान भी बाजार में बेहतर स्थिति हासिल कर सकते हैं।
मशरूम, मधुमक्खी पालन और प्राकृतिक खेती में प्रशिक्षण की मांग
किसानों ने गोष्ठी में स्पष्ट रूप से कहा कि वे आधुनिक और लाभकारी कृषि गतिविधियों को अपनाना चाहते हैं, लेकिन इसके लिए प्रशिक्षण और तकनीकी सहायता की आवश्यकता है। किसानों ने विशेष रूप से मशरूम उत्पादन, मधुमक्खी पालन, जैविक खेती और प्राकृतिक खेती पर प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने की मांग रखी।
विशेषज्ञों ने भरोसा दिलाया कि फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के तहत किसानों को नई तकनीकों, वैज्ञानिक खेती और उद्यमिता विकास से जोड़ने के लिए नियमित प्रशिक्षण आयोजित किए जाएंगे।
रबी सीजन के लिए वितरित किए गए उन्नत बीज
रबी मौसम की तैयारियों को ध्यान में रखते हुए कार्यक्रम में किसानों को पूसा सरसों-30 और पूसा विजय जैसी उन्नत किस्मों के गुणवत्ता युक्त बीज उपलब्ध कराए गए। साथ ही आईएआरआई द्वारा विकसित उन्नत किस्मों की रबी सब्जी बीज किट भी वितरित की गई।
इन बीज किटों में प्याज, सरसों का साग तथा अन्य मौसमी सब्जियों के बीज शामिल थे। वैज्ञानिकों ने किसानों को उन्नत बीजों के उपयोग, समय पर बुवाई और वैज्ञानिक प्रबंधन संबंधी जानकारी भी दी।
वैज्ञानिकों और किसानों की साझेदारी से होगा ग्रामीण विकास
कार्यक्रम का संचालन कृषि प्रसार संभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. सत्यप्रिय के नेतृत्व में किया गया। इसमें परियोजना की प्रधान अन्वेषक डॉ. सुभाश्री साहू, वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुकन्या बरुआ, तकनीकी कर्मचारी सत्य प्रकाश और छोटे लाल मीणा, रूपवास के सरपंच संजीव प्रेमी, गौतम बुद्ध नगर के सेवानिवृत्त कृषि विभागीय जिला अधिकारी डॉ. अम्बा प्रकाश शर्मा तथा लगभग 50 किसानों ने भाग लिया।
अगले पांच वर्षों तक चलेगा विकास कार्यक्रम
फार्मर फर्स्ट कार्यक्रम के अंतर्गत चयनित गांवों में अगले पांच वर्षों तक किसानों की सक्रिय भागीदारी के साथ कृषि, पशुपालन और अन्य आजीविका गतिविधियों को सुदृढ़ करने पर कार्य किया जाएगा। इसके तहत नई कृषि तकनीकों का प्रदर्शन, कौशल विकास, उद्यमिता प्रोत्साहन और आय के विविधीकरण पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि वैज्ञानिक संस्थानों और किसानों के बीच मजबूत साझेदारी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाने तथा किसानों की आय बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। ऐसी पहलें खेती को अधिक लाभकारी, टिकाऊ और भविष्य उन्मुख बनाने में सहायक सिद्ध होंगी।

























