October 10, 2026 2:37 AM

Krishi Times

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RLBCAU कृषि विद्यार्थियों ने खेतों पर सीखी प्राकृतिक खेती!

झांसी: आरएलबीसीएयू के विद्यार्थियों ने खेत पर सीखी प्राकृतिक खेती की बारीकियां, जल संसाधन प्रबंधन का भी लिया प्रशिक्षण

झांसी। रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय (RLBCAU), झांसी की ओर से प्रथम वर्ष के बीएससी कृषि (B.Sc. Agriculture) और बीएफएससी (B.F.Sc. Fisheries Science) के विद्यार्थियों के लिए दीक्षारंभ (Deeksharambh) पाठ्यक्रम के अंतर्गत शैक्षणिक भ्रमण आयोजित किया गया। इस दौरान विद्यार्थियों ने चंद्रा गांव, बड़ागांव ब्लॉक स्थित इंदिरा कृषि फार्म और गढ़मऊ जलाशय का दौरा कर कृषि, मत्स्य पालन तथा प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन से जुड़ी व्यावहारिक जानकारियां हासिल कीं।

इस शैक्षणिक भ्रमण का उद्देश्य विद्यार्थियों को कक्षा में पढ़ाए जाने वाले सैद्धांतिक विषयों से आगे बढ़कर खेतों और प्राकृतिक संसाधनों के बीच वास्तविक परिस्थितियों को समझने का अवसर प्रदान करना था। कृषि एवं मत्स्य विज्ञान के विद्यार्थियों के लिए इस तरह के कार्यक्रम आधुनिक कृषि पद्धतियों, टिकाऊ उत्पादन और ग्रामीण आजीविका के आपसी संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

इंदिरा कृषि फार्म पर प्राकृतिक खेती की तकनीकों का प्रदर्शन

इंदिरा कृषि फार्म में वी.के. तिवारी ने विद्यार्थियों को प्राकृतिक एवं जैविक खेती की विभिन्न पद्धतियों की जानकारी दी। उन्होंने संरक्षित खेती (Protected Cultivation) की तकनीकों और कृषि उत्पादन में उनके उपयोग के बारे में भी बताया। संरक्षित खेती के माध्यम से प्रतिकूल मौसम के प्रभाव को कम करने, फसलों के अनुकूल वातावरण तैयार करने और उत्पादन की गुणवत्ता बेहतर बनाने की संभावनाओं को समझाया गया।

भ्रमण के दौरान विद्यार्थियों ने जीवामृत तैयार करने की प्रक्रिया भी देखी। जीवामृत प्राकृतिक खेती में इस्तेमाल होने वाला एक जैविक इनपुट है, जिसे मिट्टी में सूक्ष्मजीवों की गतिविधियों को प्रोत्साहित करने और मृदा स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उद्देश्य से उपयोग किया जाता है। विद्यार्थियों के लिए यह अनुभव इसलिए उपयोगी रहा, क्योंकि इससे उन्हें खेती में इस्तेमाल होने वाले जैविक इनपुट की तैयारी और उसके व्यावहारिक उपयोग को करीब से समझने का अवसर मिला।

प्राकृतिक खेती और जैविक कृषि पद्धतियों के संदर्भ में विद्यार्थियों ने यह भी जाना कि मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना, कृषि संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध सामग्रियों का इस्तेमाल करना टिकाऊ कृषि व्यवस्था के महत्वपूर्ण पहलू हैं। हालांकि, इन तकनीकों के परिणाम फसल, मिट्टी, जलवायु और प्रबंधन पद्धति के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

गढ़मऊ जलाशय में जल संसाधनों के महत्व को समझा

शैक्षणिक भ्रमण के अगले चरण में विद्यार्थियों ने गढ़मऊ जलाशय का दौरा किया। यहां उन्होंने कृषि सिंचाई, मत्स्य पालन, जैव विविधता और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखने में जल संसाधनों की भूमिका के बारे में जानकारी प्राप्त की।

कृषि क्षेत्र में जल की उपलब्धता फसलों की पैदावार और किसानों की आजीविका से सीधे जुड़ी है। वहीं, जलाशय और अन्य जलीय संसाधन मत्स्य उत्पादन के साथ-साथ अनेक जलीय जीवों एवं वनस्पतियों के लिए भी महत्वपूर्ण आवास उपलब्ध कराते हैं। बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रों में जल संरक्षण, वर्षाजल का बेहतर उपयोग और उपलब्ध जल संसाधनों का वैज्ञानिक प्रबंधन कृषि विकास की दृष्टि से विशेष महत्व रखते हैं।

बीएफएससी के विद्यार्थियों के लिए जलाशय का भ्रमण मत्स्य पालन और जलीय पारिस्थितिकी के व्यावहारिक पहलुओं को समझने का अवसर बना। वहीं, कृषि के विद्यार्थियों को सिंचाई, जल प्रबंधन और खेती की स्थिरता के बीच संबंधों को समझने में मदद मिली।

कृषि शिक्षा को व्यावहारिक अनुभव से जोड़ने पर जोर

दीक्षारंभ पाठ्यक्रम के अंतर्गत आयोजित इस भ्रमण ने कृषि एवं मत्स्य विज्ञान के विद्यार्थियों को विभिन्न विषयों के बीच आपसी संबंध समझने का अवसर दिया। प्राकृतिक खेती, संरक्षित कृषि, जैविक इनपुट निर्माण और जल संसाधन प्रबंधन जैसे विषय कृषि शिक्षा को केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित रखने के बजाय व्यावहारिक अनुभव से जोड़ते हैं।

आज कृषि क्षेत्र जलवायु परिवर्तन, मिट्टी की गुणवत्ता, जल उपलब्धता और उत्पादन लागत जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे में भावी कृषि विशेषज्ञों के लिए खेतों पर अपनाई जा रही तकनीकों, स्थानीय संसाधनों और टिकाऊ उत्पादन प्रणालियों की समझ विकसित करना आवश्यक है।

रानी लक्ष्मी बाई केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय का यह शैक्षणिक भ्रमण विद्यार्थियों को कृषि एवं मत्स्य क्षेत्र की वास्तविक परिस्थितियों से परिचित कराने की दिशा में एक उपयोगी पहल रहा। इस तरह के अनुभव विद्यार्थियों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करने और भविष्य में किसानों, कृषि संस्थानों तथा ग्रामीण समुदायों के साथ प्रभावी ढंग से काम करने की तैयारी में सहायक हो सकते हैं।