गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र में छिपी हैं आय और पोषण की नई संभावनाएं, सीआईआरजी में राष्ट्रीय कार्यशाला आयोजित!
मथुरा (उत्तर प्रदेश), 25 सितंबर। बकरी, भेड़, गदही और ऊँट के दूध को ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पोषण सुरक्षा और पशुपालकों की आय बढ़ाने का नया माध्यम बनाने पर जोर देते हुए भा.कृ.अ.प.-केंद्रीय बकरी अनुसंधान संस्थान (ICAR-CIRG), मखदूम में राष्ट्रीय पशुधन मिशन (NLM) के तहत “भारत में गैर-बोवाइन दूध की वर्तमान स्थिति एवं भविष्य की संभावनाएं” विषय पर एक दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला में वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, पशुपालकों, उद्यमियों और उद्योग प्रतिनिधियों ने गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र के विकास की रणनीतियों पर विस्तार से चर्चा की।
विशेषज्ञों ने कहा कि देश में डेयरी क्षेत्र का अधिकांश हिस्सा गाय और भैंस के दूध पर आधारित है, लेकिन बकरी, भेड़, ऊँट और गदही के दूध में पोषण, औषधीय गुणों और विशेष उत्पादों के विकास की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। यदि इस क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रसंस्करण और बाजार व्यवस्था को मजबूत किया जाए तो यह लाखों छोटे एवं सीमांत पशुपालकों की आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
छोटे पशुपालकों के लिए अवसरों का नया द्वार
कार्यशाला को संबोधित करते हुए डॉ. मनीष कुमार चेटली, निदेशक, आईसीएआर-सीआईआरजी ने कहा कि गैर-बोवाइन दूध भारतीय पशुधन अर्थव्यवस्था का ऐसा क्षेत्र है, जिसका अभी पूरी तरह दोहन नहीं हो पाया है। उन्होंने बताया कि बकरी, भेड़, गदही और ऊँट का दूध पोषण सुरक्षा के साथ-साथ ग्रामीण परिवारों को अतिरिक्त आय का स्रोत उपलब्ध करा सकता है।
उन्होंने कहा कि विशेष रूप से बकरी का दूध छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि बकरियां विभिन्न कृषि-जलवायु परिस्थितियों में आसानी से अनुकूलित हो जाती हैं और कम संसाधनों में भी बेहतर उत्पादन दे सकती हैं। उन्होंने अनुसंधान संस्थानों और उद्योगों के बीच मजबूत साझेदारी विकसित करने की आवश्यकता पर बल दिया, ताकि नवीन तकनीकों और मूल्यवर्धित उत्पादों को बाजार तक पहुंचाया जा सके।
वैज्ञानिक अनुसंधान और बाजार के बीच बेहतर तालमेल जरूरी
कार्यशाला के मुख्य अतिथि मेजर जनरल (डॉ.) श्रीकांत, पूर्व कुलपति, लुवास ने कहा कि पशुधन क्षेत्र में वैज्ञानिक अनुसंधान और जमीनी जरूरतों के बीच बेहतर समन्वय समय की मांग है। उन्होंने कहा कि गैर-बोवाइन दूध आधारित उत्पादों में नवाचार, उद्यमिता और संस्थागत सहयोग के जरिए नए व्यवसायिक अवसर पैदा किए जा सकते हैं।
भेड़ और ऊँट के दूध पर भी बढ़ रहा फोकस
आईसीएआर-सीएसडब्ल्यूआरआई, अविकानगर के निदेशक डॉ. ए.के. तोमर ने भेड़ पालन और भेड़ के दूध की उपयोगिता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उत्पादकता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन और तकनीकी हस्तक्षेप को बढ़ावा देना आवश्यक है।
वहीं, राष्ट्रीय ऊँट अनुसंधान केंद्र, बीकानेर के निदेशक डॉ. ए.के. पुनिया ने ऊँट के दूध की विशिष्टताओं और उसके स्वास्थ्य लाभों का उल्लेख करते हुए वैज्ञानिक प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और बाजार विस्तार पर जोर दिया।
नीतिगत समर्थन और निवेश की आवश्यकता
आईसीएआर-एनआईएपी, नई दिल्ली के डॉ. शिव कुमार ने कहा कि गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र के विकास के लिए उपयुक्त नीतिगत ढांचा, आर्थिक विश्लेषण और बाजारोन्मुखी दृष्टिकोण जरूरी है। वहीं, पशुपालन एवं डेयरी विभाग, भारत सरकार के डॉ. पी.के. कौशिक ने सरकारी योजनाओं, आधारभूत संरचना विकास और पशुधन आधारित उद्यमों को बढ़ावा देने में सरकारी सहयोग की भूमिका पर प्रकाश डाला।
मूल्य संवर्धन और प्रशिक्षण पर रहेगा जोर
कार्यशाला में विशेषज्ञों ने माना कि गैर-बोवाइन दूध से बने उत्पादों जैसे विशेष डेयरी उत्पाद, स्वास्थ्यवर्धक पेय, न्यूट्रास्यूटिकल्स और प्रीमियम खाद्य पदार्थों के लिए देश और विदेश में मांग बढ़ रही है। ऐसे में गुणवत्ता आश्वासन, उत्पाद मानकीकरण, पशुपालक प्रशिक्षण, तकनीकी हस्तांतरण और उपभोक्ता जागरूकता को प्राथमिकता देने की जरूरत है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिल सकती है नई मजबूती
विशेषज्ञों का मानना है कि गैर-बोवाइन दूध क्षेत्र का संगठित विकास ग्रामीण रोजगार, महिला उद्यमिता, पोषण विविधता और पशुपालकों की अतिरिक्त आय बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। कार्यशाला में अनुसंधान संस्थानों, विश्वविद्यालयों, सरकारी विभागों, उद्योग जगत और पशुपालकों के बीच समन्वित प्रयासों की आवश्यकता पर जोर दिया गया।
यह राष्ट्रीय कार्यशाला भारत में बकरी, भेड़, गदही और ऊँट के दूध की संभावनाओं को नई दिशा देने के साथ-साथ गैर-बोवाइन डेयरी क्षेत्र को वैज्ञानिक, तकनीकी और बाजार आधारित मॉडल पर विकसित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हुई।

























