कपास की फसल से कैसे लें अधिक मुनाफा? जानिए सही तरीका

कपास की खेती: जानिए बीज, बोआई, उर्वरक और पैदावार की पूरी जानकारी

नई दिल्ली।  कपास न केवल भारत की कृषि अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ है, बल्कि यह लाखों किसानों की आजीविका का आधार भी है। वस्त्र उद्योग की रीढ़ माने जाने वाले इस फसल की पैदावार भारत में व्यापक स्तर पर किया जाता है। भारत विश्व में कपास उत्पादन में दूसरे स्थान पर है और ग्लोबल उत्पादन का लगभग 24% हिस्सा अकेले भारत से आता है। इसकी आर्थिक महत्ता को देखते हुए ही कपास को ‘सफेद सोना‘ कहा जाता है।

किसानों की आय को बढ़ाने और कपास उत्पादन को वैज्ञानिक तरीके से प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने कपास की खेती से जुड़ी विस्तृत जानकारी जारी की है। मंत्रालय द्वारा जारी यह दिशा-निर्देश कपास की उपयुक्त जलवायु, मिट्टी, बीज की मात्रा, किस्मों, उर्वरकों के संतुलित प्रयोग तथा बोआई की विधि को लेकर किसानों को जागरूक करने की दिशा में एक बड़ा कदम है।

कपास की खेती के लिए आवश्यक जलवायु और मिट्टी

कपास की अच्छी पैदावार के लिए उपयुक्त जलवायु और मिट्टी का चयन अत्यंत आवश्यक है। वैज्ञानिकों के अनुसार कपास की बोआई के समय तापमान कम से कम 16 डिग्री सेल्सियस होना चाहिए। विकास चरण में तापमान 21 से 27 डिग्री सेल्सियस और फूल आने के समय 27 से 32 डिग्री सेल्सियस अनुकूल माना गया है।

बारिश की बात करें तो कपास की अच्छी फसल के लिए न्यूनतम 50 सेंटीमीटर वर्षा आवश्यक है। मिट्टी की संरचना भी महत्वपूर्ण है। अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट मिट्टी कपास के लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसके साथ ही, मिट्टी का पीएच स्तर 5.5 से 6.0 के बीच हो तो सर्वश्रेष्ठ परिणाम मिलते हैं, हालांकि 8.5 तक की पीएच रेंज भी सहनीय है।

भारत में उगाई जाने वाली कपास की प्रमुख किस्में

भारत में मुख्यतः तीन प्रकार की कपास की किस्में उगाई जाती हैं:

  1. अमेरिकन कपास (Gossypium hirsutum)

  2. देसी कपास (Gossypium arboreum)

  3. हाईब्रिड कपास (संकर प्रजातियाँ)

इन किस्मों का चयन क्षेत्र, जलवायु और बाज़ार मांग के अनुसार करना चाहिए।

उर्वरकों का संतुलन बढ़ाएगा पैदावार

मंत्रालय ने किसानों को सलाह दी है कि वे मिट्टी परीक्षण के आधार पर उर्वरकों का प्रयोग करें, जिससे न केवल उपज में वृद्धि होगी, बल्कि भूमि की उर्वरता भी बनी रहेगी। विभिन्न प्रकार की कपास के लिए अलग-अलग मात्रा में उर्वरकों की आवश्यकता होती है:

देसी कपास
  • नाइट्रोजन: 50-70 किग्रा

  • फॉस्फोरस: 20-30 किग्रा

अमेरिकन कपास
  • नाइट्रोजन: 60-80 किग्रा

  • फॉस्फोरस: 30 किग्रा

  • पोटाश: 20-30 किग्रा

हाईब्रिड कपास
  • नाइट्रोजन: 150 किग्रा

  • फॉस्फोरस: 60 किग्रा

  • पोटाश: 60 किग्रा…बोआई के समय आधी नाइट्रोजन के साथ पूरा फॉस्फोरस और पोटाश देना चाहिए। शेष नाइट्रोजन फूल आने पर देनी चाहिए ताकि पौधों में उचित वृद्धि और बेहतर फली बन सके।

बीज की मात्रा: अच्छी फसल की पहली सीढ़ी

कपास की अच्छी पैदावार के लिए सही बीज मात्रा जरूरी है..

  • अमेरिकन कपास: 15-20 किग्रा प्रति हेक्टेयर

  • देसी कपास: 15-16 किग्रा प्रति हेक्टेयर

  • हाईब्रिड कपास: 2-2.5 किग्रा प्रति हेक्टेयर

अच्छे और प्रमाणित बीजों का उपयोग करने से रोगों से सुरक्षा मिलती है और उत्पादन भी अधिक होता है।

बोआई का समय, विधि और पौधों की दूरी

बोआई का सर्वोत्तम समय

  • अप्रैल-मई, यानी गेहूं की कटाई के बाद। यह समय खासतौर पर पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश के लिए उपयुक्त है।

बोआई की विधि:

  • बीज ड्रिल या फरोज़ (Furrow) विधि से बोआई करें ताकि बीजों की गहराई और दूरी संतुलित रहे।

पौधों की दूरी:

  • अमेरिकन/देसी कपास: 60×30 सेमी

  • हाईब्रिड कपास: 90×60 सेमी

सही दूरी रखने से पौधों को पोषक तत्व मिलते हैं और रोग फैलने की संभावना कम होती है।

सरकार का प्रयास: बीज से लेकर बाज़ार तक किसान के साथ

कृषि मंत्रालय ने “कपास की खेती: बीज से लेकर बाजार तक” नाम से एक जागरूकता अभियान शुरू किया है, जिसका उद्देश्य किसानों को आधुनिक तकनीक और वैज्ञानिक जानकारी से जोड़ना है। इस अभियान का उद्देश्य किसानों की लागत कम करना, उत्पादन बढ़ाना और फसल को अच्छे दामों पर बाज़ार तक पहुँचाना है।

किसानों से अपील की गई है कि वे किसी भी जानकारी के लिए किसान कॉल सेंटर 1800-180-1551 (प्रातः 6 बजे से रात 10 बजे तक) पर संपर्क करें और विशेषज्ञों से सलाह लें।

सारांश

कपास उत्पादन को लाभदायक बनाने के लिए यह आवश्यक है कि किसान पारंपरिक तरीकों के साथ वैज्ञानिक सिफारिशों को अपनाएं। केंद्र सरकार का यह अभियान “संकल्प, सहयोग और समृद्धि” के साथ किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल है।

चित्र सौजन्य:कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय और एआई

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