खुले समुद्र में मछली पकड़ने को मिली मंजूरी, मछुआरों की आय और निर्यात बढ़ाने की पहल!
उपराष्ट्रपति बोले- समुद्री संसाधनों के संरक्षण के साथ विकास भी जरूरी, युवाओं के लिए मत्स्य क्षेत्र में नए अवसर
भुवनेश्वर। भारत के समुद्री मत्स्य क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए उपराष्ट्रपति सी.पी. राधाकृष्णन ने खुले समुद्र (हाई सीज़) में संधारणीय मत्स्य दोहन के लिए प्राधिकार पत्र (एलओए) जारी करने के राष्ट्रीय कार्यक्रम का शुभारंभ किया। इस अवसर पर ओडिशा डीप सी फिशिंग मिशन के मसौदे का भी विमोचन किया गया तथा देश के विभिन्न राज्यों के 10 मत्स्य उत्पादक संगठनों (एफपीपीओ) और मछुआरों को खुले समुद्र में मछली पकड़ने के लिए प्राधिकार पत्र प्रदान किए गए।
समुद्री इतिहास में नया अध्याय
कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने कहा कि यह पहल भारत के समुद्री इतिहास में एक नए अध्याय की शुरुआत है। इसके माध्यम से भारतीय मछुआरे अब देश के विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र (ईईजेड) और खुले समुद्र में मौजूद विशाल मत्स्य संसाधनों का वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीके से उपयोग कर सकेंगे। उन्होंने कहा कि यह कदम केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और मछुआरा समुदायों की साझा प्रतिबद्धता का प्रतीक है, जिसका उद्देश्य मत्स्य क्षेत्र को अधिक समृद्ध और आधुनिक बनाना है।
24 लाख वर्ग किलोमीटर समुद्री क्षेत्र में अपार संभावनाएं
उपराष्ट्रपति ने बताया कि भारत के पास 11 हजार किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा और लगभग 24 लाख वर्ग किलोमीटर का विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र है। इस विशाल समुद्री क्षेत्र में मछली संसाधनों की बड़ी क्षमता मौजूद है, जिसका अभी तक पूरी तरह उपयोग नहीं हो पाया है। उन्होंने कहा कि अब भारतीय मछुआरे ट्यूना जैसी उच्च मूल्य वाली मछलियों के लिए गहरे समुद्र तक पहुंच सकेंगे, जिससे उनकी आय में उल्लेखनीय वृद्धि की संभावना है।
मत्स्य क्षेत्र बना करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार
भारत की मत्स्य अर्थव्यवस्था की उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि देश आज दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक राष्ट्र है और वैश्विक मछली उत्पादन में उसका योगदान लगभग 8 प्रतिशत है। यह क्षेत्र करीब तीन करोड़ मछुआरों और मत्स्य पालकों की आजीविका से जुड़ा हुआ है। पिछले वित्तीय वर्ष में समुद्री खाद्य उत्पादों का निर्यात 73 हजार करोड़ रुपये से अधिक रहा, जो इस क्षेत्र की बढ़ती आर्थिक ताकत को दर्शाता है।
रोजगार और निर्यात को मिलेगा बढ़ावा
उपराष्ट्रपति ने कहा कि हाई सीज़ मत्स्य दोहन की नई व्यवस्था से केवल मछली पकड़ने तक ही लाभ सीमित नहीं रहेगा, बल्कि प्रसंस्करण, कोल्ड चेन, परिवहन, पैकेजिंग, लॉजिस्टिक्स और निर्यात सेवाओं में भी बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे। इससे तटीय क्षेत्रों की अर्थव्यवस्था को नई गति मिलेगी और भारत की समुद्री खाद्य निर्यात क्षमता भी मजबूत होगी।
मछुआरा संगठनों को प्राथमिकता
नई व्यवस्था के तहत प्राधिकार पत्र जारी करने में मत्स्य सहकारी समितियों, मत्स्य उत्पादक संगठनों और पारंपरिक मछुआरों को प्राथमिकता दी गई है। उन्होंने कहा कि इससे तटीय समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और सामुदायिक भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी।
संरक्षण और विकास साथ-साथ
उपराष्ट्रपति ने जोर देते हुए कहा कि संधारणीय मत्स्य दोहन केवल आर्थिक गतिविधि नहीं, बल्कि एक नैतिक जिम्मेदारी भी है। समुद्री संसाधनों का संरक्षण और उनका संतुलित उपयोग भविष्य की पीढ़ियों के लिए जरूरी है। उन्होंने डिजिटल प्राधिकरण प्रणाली, पोत ट्रैकिंग, अंतरराष्ट्रीय मानकों के पालन तथा अवैध और अनियमित मत्स्य दोहन पर सख्ती की आवश्यकता बताई।
युवाओं से आधुनिक मत्स्य क्षेत्र से जुड़ने का आह्वान
युवाओं को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि मत्स्य क्षेत्र अब केवल पारंपरिक व्यवसाय नहीं रहा, बल्कि विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नवाचार और वैश्विक बाजार से जुड़ा आधुनिक पेशा बन चुका है। उन्होंने युवाओं से इस क्षेत्र में आगे आने और नई तकनीकों के माध्यम से देश की समुद्री अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का आह्वान किया।
क्यों महत्वपूर्ण है यह पहल?
खुले समुद्र में वैज्ञानिक तरीके से मत्स्य दोहन की अनुमति मिलने से भारत को ट्यूना और अन्य उच्च मूल्य वाली समुद्री प्रजातियों के दोहन में बढ़त मिलेगी। इससे तटीय राज्यों में आय बढ़ेगी, निर्यात मजबूत होगा और “ब्लू इकोनॉमी” के लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी। साथ ही, संसाधनों के टिकाऊ उपयोग से समुद्री जैव विविधता की रक्षा भी सुनिश्चित की जा सकेगी।






























