जिला-स्तर पर कृषि विकास को गति देगी पीएम धन-धान्य कृषि योजना, 100 आकांक्षी जिलों में उत्पादकता बढ़ाने पर जोर
कृषि एवं ग्रामीण विकास | विशेष रिपोर्ट
भारत के कृषि क्षेत्र में उत्पादन बढ़ाने, किसानों की आमदनी में सुधार करने और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए जिला-स्तर पर केंद्रित विकास की जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। देश के कई कृषि प्रधान जिलों में उपज की कम उत्पादकता, सिंचाई सुविधाओं की कमी, संस्थागत ऋण तक सीमित पहुंच और फसल कटाई के बाद भंडारण एवं प्रसंस्करण की अपर्याप्त व्यवस्था किसानों की आर्थिक प्रगति में बाधा बनी हुई है। इन चुनौतियों को दूर करने के उद्देश्य से शुरू की गई प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना (PMDDKY) का जोर देश के 100 आकांक्षी कृषि जिलों की स्थानीय जरूरतों के अनुसार विकास कार्यों को आगे बढ़ाने पर है।
योजना के तहत कृषि उत्पादन बढ़ाने के साथ फसल विविधीकरण, टिकाऊ कृषि पद्धतियों, सिंचाई, कृषि ऋण, भंडारण, बेहतर बाजार संपर्क और सरकारी सेवाओं की प्रभावशीलता पर ध्यान दिया जा रहा है। इसकी खासियत यह है कि सभी जिलों के लिए एक जैसी रणनीति अपनाने के बजाय स्थानीय परिस्थितियों और कृषि संबंधी समस्याओं के आधार पर जिला कार्ययोजनाएं तैयार की गई हैं।
योजना ने 11 अक्टूबर 2026 को अपना पहला वर्ष पूरा किया। उपलब्ध प्रगति आंकड़ों के अनुसार, अप्रैल से अगस्त 2026 के बीच छह प्रमुख उद्देश्यों के तहत 100 जिलों का औसत स्कोर 18.85 से बढ़कर 46.89 हो गया। यह 28.04 अंकों का सुधार है। हालांकि, इस प्रगति को किसानों की वास्तविक आय, फसल उत्पादकता और कृषि लागत में बदलाव के साथ जोड़कर देखना भी महत्वपूर्ण होगा।
100 आकांक्षी कृषि जिलों के विकास पर विशेष ध्यान
केंद्र सरकार ने पीएम धन-धान्य कृषि योजना को 16 जुलाई 2025 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी दी थी। इसके बाद प्रधानमंत्री ने 11 अक्टूबर 2025 को योजना का औपचारिक शुभारंभ किया। वित्त वर्ष 2025-26 से शुरू हुई यह छह वर्षीय पहल वर्ष 2030-31 तक कृषि विकास के लिए जिला-केंद्रित कार्यों को आगे बढ़ाने के उद्देश्य से बनाई गई है।
योजना के तहत 100 ऐसे जिलों का चयन किया गया, जहां कृषि विकास की संभावनाओं के बावजूद कुछ बुनियादी कमियां बनी हुई हैं। जिलों के चयन में मुख्य रूप से तीन संकेतकों को आधार बनाया गया:
कम कृषि उत्पादकता: प्रति इकाई क्षेत्र में अपेक्षाकृत कम उत्पादन।
कम फसल सघनता: एक वर्ष में उपलब्ध कृषि भूमि पर कम फसलें उगाया जाना।
कृषि ऋण की सीमित उपलब्धता: किसानों की खेती संबंधी जरूरतों के लिए संस्थागत ऋण तक कम पहुंच।
इसके अतिरिक्त राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल कृषि क्षेत्र तथा परिचालन जोतों की हिस्सेदारी को भी चयन प्रक्रिया में ध्यान में रखा गया। प्रत्येक राज्य में कम से कम एक जिले को शामिल किया गया है, ताकि योजना का लाभ देश के विभिन्न कृषि क्षेत्रों तक पहुंच सके।
इन मानकों का उद्देश्य केवल कम उत्पादकता वाले जिलों की पहचान करना नहीं, बल्कि उन क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करते हुए विकास की बाधाओं को दूर करना भी है।
11 मंत्रालयों की 36 योजनाओं का होगा समन्वय
पीएमडीडीकेवाई को लागू करने के लिए अलग से समानांतर व्यवस्था खड़ी करने के बजाय केंद्र और राज्य सरकारों की मौजूदा योजनाओं के बीच तालमेल पर जोर दिया गया है। योजना के अंतर्गत 11 मंत्रालयों एवं विभागों की 36 केंद्रीय योजनाओं के साथ राज्य सरकारों की योजनाओं और निजी क्षेत्र की भागीदारी को जोड़ा जा रहा है।
इस व्यवस्था के माध्यम से जिले की जरूरत के अनुसार कृषि से जुड़ी विभिन्न सुविधाओं को एक साथ आगे बढ़ाया जा सकता है। उदाहरण के लिए, जिस जिले में सिंचाई की कमी है, वहां जल प्रबंधन और सूक्ष्म सिंचाई से जुड़े कार्यक्रमों को प्राथमिकता दी जा सकती है। वहीं, जहां किसान उत्पादन तो कर रहे हैं, लेकिन भंडारण या बाजार तक पहुंच की कमी से उचित मूल्य नहीं मिल रहा, वहां गोदाम, प्रसंस्करण और किसान उत्पादक संगठनों (FPO) को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा सकता है।
इस तरह योजना का उद्देश्य उपलब्ध सरकारी संसाधनों का बेहतर समन्वय करना और विकास कार्यों को स्थानीय कृषि जरूरतों से जोड़ना है।
तीन स्तरों पर होगी योजना की निगरानी
योजना की सफलता के लिए प्रशासनिक जवाबदेही और नियमित समीक्षा को महत्वपूर्ण माना गया है। इसके लिए जिला, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर निगरानी एवं क्रियान्वयन का ढांचा बनाया गया है।
जिला स्तर पर: जिला कलेक्टर या जिलाधिकारी की अध्यक्षता में जिला धन-धान्य कृषि योजना समिति गठित की गई है। यह समिति जिले की कृषि संबंधी चुनौतियों का आकलन करती है, जिला कार्ययोजना तैयार करती है और उसके क्रियान्वयन की निगरानी करती है।
राज्य स्तर पर: मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली राज्य धन-धान्य कृषि योजना समिति जिला कार्ययोजनाओं की समीक्षा करती है। इसका उद्देश्य जिला स्तर पर तैयार योजनाओं को राज्य की प्राथमिकताओं और वार्षिक कार्ययोजनाओं के साथ जोड़ना है।
राष्ट्रीय स्तर पर: योजना की निगरानी के लिए दो प्रमुख समितियां बनाई गई हैं। राष्ट्रीय कार्यकारी समिति की अध्यक्षता केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री करते हैं, जबकि राष्ट्रीय निगरानी समिति की अध्यक्षता कृषि एवं किसान कल्याण विभाग (DA&FW) के सचिव करते हैं।
इस ढांचे से योजना के क्रियान्वयन में विभिन्न स्तरों के बीच समन्वय बनाने और समस्याओं का समय पर समाधान करने में मदद मिलने की अपेक्षा है।
जिला कार्ययोजना में स्थानीय जरूरतों को प्राथमिकता
पीएमडीडीकेवाई के अंतर्गत जिला कार्ययोजना (District Action Plan—DAP) को क्रियान्वयन का प्रमुख आधार बनाया गया है। ये योजनाएं संबंधित जिलों की मौजूदा स्थिति के आधारभूत आंकड़ों और कृषि संबंधी समस्याओं के विश्लेषण के आधार पर तैयार की जाती हैं।
जिला कार्ययोजनाओं में उन क्षेत्रों की पहचान की जाती है, जहां हस्तक्षेप की सबसे अधिक जरूरत है। इसके बाद संबंधित केंद्रीय और राज्य योजनाओं को आपस में जोड़कर विकास के लक्ष्य निर्धारित किए जाते हैं।
इन योजनाओं में केवल गतिविधियों की सूची तैयार करना पर्याप्त नहीं माना गया है। इनमें परिणाम आधारित लक्ष्य, वार्षिक उपलब्धियां और विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत किए जाने वाले कार्य भी शामिल किए जाते हैं।
तैयार जिला कार्ययोजनाएं संबंधित राज्य विभागों को भेजी जाती हैं, ताकि उन्हें राज्य की वार्षिक कार्ययोजनाओं में शामिल किया जा सके। इससे जरूरी प्रशासनिक मंजूरी और धनराशि जारी करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने में मदद मिलती है।
योजना के तहत 36 योजनाओं की प्रगति को कुल 121 संकेतकों के माध्यम से मापा जा रहा है। इनमें 74 आउटपुट संकेतक और 47 आउटकम संकेतक शामिल हैं।
आउटपुट संकेतक यह बताते हैं कि किसी योजना के तहत कितने कार्य हुए या कितनी सुविधाएं विकसित की गईं। दूसरी ओर, आउटकम संकेतकों का उद्देश्य यह समझना है कि इन गतिविधियों से कृषि क्षेत्र में क्या बदलाव आया।
जिलों के आउटपुट संकेतकों के आधार पर मासिक प्रदर्शन रैंकिंग पीएमडीडीकेवाई डैशबोर्ड पर जारी की जाती है।
डैशबोर्ड: https://pmddky.niti.gov.in/
पहले साल में सभी 100 जिलों की कार्य योजनाएं लागू
योजना की शुरुआत के बाद पहले वर्ष में जिला स्तर पर कार्ययोजनाओं को तैयार करने, निगरानी व्यवस्था स्थापित करने और आंकड़ों के नियमित संकलन पर विशेष ध्यान दिया गया।
अक्टूबर 2025 के अंतिम सप्ताह में पीएमडीडीकेवाई डैशबोर्ड शुरू किया गया। नवंबर 2025 से आउटपुट संकेतकों के आधार पर मासिक रैंकिंग की प्रक्रिया शुरू हुई। इससे 100 जिलों में प्रगति की नियमित समीक्षा के लिए एक साझा मंच उपलब्ध हुआ।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार:
सभी 100 जिलों ने अपनी जिला कार्ययोजनाएं तैयार कर ली हैं और उनके क्रियान्वयन की प्रक्रिया जारी है।
राज्य, जिला और राष्ट्रीय स्तर पर समीक्षा एवं निगरानी समितियां गठित की गई हैं।
सभी 100 जिलों ने अगस्त 2026 तक आउटपुट संकेतकों से संबंधित आंकड़े जमा किए।
वित्त वर्ष 2025-26 के लिए सभी 100 जिलों ने आउटकम संकेतकों के आंकड़े भी उपलब्ध कराए।
केंद्रीय नोडल अधिकारी नियमित रूप से जिलों की प्रगति की समीक्षा कर रहे हैं और आवश्यक मार्गदर्शन दे रहे हैं।
इसके अतिरिक्त, सार्वजनिक उद्यम विभाग ने वित्त वर्ष 2026-27 और 2027-28 के लिए केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (CPSEs) द्वारा कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) गतिविधियों के अंतर्गत धन-धान्य जिलों को अपनाने का प्रावधान शामिल किया है।
यदि इस व्यवस्था के माध्यम से कृषि से संबंधित स्थानीय जरूरतों के लिए अतिरिक्त संसाधन जुटाए जाते हैं, तो सिंचाई, भंडारण, प्रशिक्षण, तकनीक और ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा देने में सहायता मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव संबंधित परियोजनाओं, निवेश और स्थानीय स्तर पर उनके क्रियान्वयन पर निर्भर करेगा।
छह प्रमुख उद्देश्यों में औसत स्कोर 28.04 अंक बढ़ा
योजना के पहले वर्ष की प्रगति को समझने के लिए अप्रैल और अगस्त 2026 के बीच छह प्रमुख उद्देश्यों के औसत स्कोर की तुलना की गई है।
| प्रमुख उद्देश्य | अप्रैल 2026 | अगस्त 2026 |
|---|---|---|
| कृषि उत्पादकता बढ़ाना | 1.50 | 8.08 |
| फसल विविधीकरण और टिकाऊ कृषि | 4.08 | 10.18 |
| फसल कटाई के बाद भंडारण क्षमता | 2.14 | 5.19 |
| सिंचाई बुनियादी ढांचे में सुधार | 1.38 | 4.91 |
| अल्पकालीन और दीर्घकालीन कृषि ऋण तक पहुंच | 2.40 | 6.53 |
| बेहतर प्रशासन और सेवा वितरण | 7.41 | 12.05 |
स्रोत सामग्री में उपलब्ध योजना के औसत स्कोर; इन्हें सीधे प्रतिशत उपलब्धि या किसानों की आय में वृद्धि के रूप में नहीं समझना चाहिए।
छह उद्देश्यों के तहत 100 जिलों का संयुक्त औसत स्कोर अप्रैल 2026 के 18.85 से बढ़कर अगस्त 2026 में 46.89 हो गया। यह 28.04 अंकों की वृद्धि दर्शाता है।
इन आंकड़ों में कृषि उत्पादकता और फसल विविधीकरण से जुड़े स्कोर में उल्लेखनीय बढ़ोतरी दिखाई देती है। सिंचाई, भंडारण और कृषि ऋण के क्षेत्र में भी सुधार दर्ज किया गया है।
हालांकि, स्कोर में वृद्धि अपने आप में इस बात का अंतिम प्रमाण नहीं है कि सभी जिलों में किसानों की आय बढ़ गई है या खेती की लागत घट गई है। वास्तविक प्रभाव जानने के लिए फसलवार उत्पादन, सिंचित क्षेत्र, किसानों को मिले ऋण, भंडारण क्षमता के इस्तेमाल और बाजार में प्राप्त कीमतों जैसे आंकड़ों का अध्ययन भी जरूरी होगा।
एफपीओ संगम से किसानों को मिले अनुभव साझा करने का मंच
पीएमडीडीकेवाई के पहले वर्ष में किसान उत्पादक संगठनों को मजबूत करने और उनके बीच अनुभव साझा करने के लिए भी पहल की गई।
दिसंबर 2025 में आयोजित पीएमडीडीकेवाई एफपीओ संगम में 15 राज्यों और योजना के 33 जिलों के 72 से अधिक किसान उत्पादक संगठन शामिल हुए। कार्यक्रम में कृषि उत्पादकता बढ़ाने, बाजार तक पहुंच बनाने और किसानों की आय में सुधार से जुड़े अनुभव साझा किए गए।
इस आयोजन में प्राकृतिक खेती, तिलहन उत्पादन, मधुमक्खी पालन, संरक्षित खेती, सूक्ष्म सिंचाई, संस्थागत वित्त और डिजिटल कृषि जैसे विषयों पर चर्चा हुई।
एफपीओ छोटे और सीमांत किसानों के लिए विशेष महत्व रखते हैं। व्यक्तिगत किसान के लिए आधुनिक मशीनरी खरीदना, बड़े खरीदारों से सीधे संपर्क करना, उत्पादों की ग्रेडिंग और पैकेजिंग करना या भंडारण की सुविधा विकसित करना कठिन हो सकता है। लेकिन सामूहिक संगठन के माध्यम से किसान इन सुविधाओं का साझा इस्तेमाल कर सकते हैं।
एफपीओ की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि उन्हें नियमित बाजार, कार्यशील पूंजी, पेशेवर प्रबंधन, पारदर्शी लेखांकन और प्रसंस्करण सुविधाएं कितनी उपलब्ध हैं। ऐसे संगठनों को मजबूत करना जिला आधारित कृषि विकास का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है।
महाराष्ट्र के गढ़चिरौली में धान प्रसंस्करण से मूल्य संवर्धन
महाराष्ट्र के पीएमडीडीकेवाई जिले गढ़चिरौली में देसाईगंज फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड ने स्थानीय स्तर पर कृषि प्रसंस्करण की उपयोगिता का उदाहरण प्रस्तुत किया है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस एफपीओ से 800 किसान सदस्य जुड़े हैं। संगठन ने तीन टन प्रति घंटे की क्षमता वाली चावल प्रसंस्करण इकाई और 900 मीट्रिक टन क्षमता का गोदाम स्थापित किया है।
धान उत्पादन वाले क्षेत्रों में कटाई के बाद उचित भंडारण और प्रसंस्करण की कमी के कारण किसानों को कई बार अपनी उपज जल्दी बेचनी पड़ती है। इससे बाजार में बेहतर कीमत प्राप्त करने की संभावनाएं सीमित हो सकती हैं।
देसाईगंज एफपीओ की प्रसंस्करण इकाई और गोदाम स्थानीय स्तर पर धान के मूल्य संवर्धन में मदद करते हैं। संगठन की खास जय श्री राम चावल किस्म के लिए यह व्यवस्था उपयोगी बताई गई है।
एफपीओ ने वित्त वर्ष 2025-26 में 1.24 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया। यह उदाहरण बताता है कि उत्पादन के साथ प्रसंस्करण और भंडारण को जोड़ने से किसान संगठनों के लिए व्यावसायिक गतिविधियों का विस्तार संभव हो सकता है।
हालांकि, कारोबार और किसानों की वास्तविक आय में अंतर होता है। संगठन की लागत, परिचालन खर्च, लाभ और सदस्यों को मिले भुगतान की जानकारी से ही किसानों को हुए प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ का आकलन किया जा सकता है।
कर्नाटक के तुमकुरु में नारियल उत्पादकों को बाजार से जोड़ने की पहल
कर्नाटक के पीएमडीडीकेवाई जिले तुमकुरु में तिप्तूर फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड ने नारियल आधारित कृषि कारोबार को बाजार से जोड़ने की दिशा में काम किया है।
इस एफपीओ से 750 किसान सदस्य जुड़े हैं। संगठन एक फ्रांसीसी बहुराष्ट्रीय कंपनी को बॉल कोपरा की आपूर्ति करता है। बॉल कोपरा नारियल के गूदे को सुखाकर तैयार किया जाने वाला उत्पाद है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न औद्योगिक और खाद्य उत्पादों में किया जाता है।
एफपीओ के माध्यम से किसानों को सामूहिक रूप से उत्पाद एकत्र करने और बड़े खरीदार तक पहुंच बनाने का अवसर मिलता है। इससे छोटे उत्पादकों के लिए बाजार में भागीदारी बढ़ाने की संभावनाएं बनती हैं।
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, संगठन ने वित्त वर्ष 2025-26 में 1.60 करोड़ रुपये का कारोबार दर्ज किया। वहीं, 12 सितंबर 2026 तक इसने 138 टन से अधिक कोपरा एकत्र किया, जिसका मूल्य 1.9 करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है।
यह उदाहरण दर्शाता है कि स्थानीय कृषि उत्पादों को संगठित आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ना किसानों के लिए नए व्यावसायिक अवसर पैदा कर सकता है।
इस तरह की व्यवस्था को लंबे समय तक सफल बनाए रखने के लिए गुणवत्ता मानकों का पालन, उत्पाद की नमी और ग्रेड की जांच, समय पर भुगतान, खरीदारों के साथ पारदर्शी अनुबंध और बाजार में कीमतों के उतार-चढ़ाव से सुरक्षा जैसे पहलुओं पर ध्यान देना आवश्यक है।
राजस्थान के जैसलमेर में सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई और जीरे की खेती
राजस्थान के पीएमडीडीकेवाई जिले जैसलमेर में कृषि विकास की रणनीति में पानी का कुशल इस्तेमाल महत्वपूर्ण है। शुष्क और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सिंचाई की उपलब्धता सीधे तौर पर फसल चयन, उत्पादन लागत और खेती के जोखिम को प्रभावित करती है।
जैसलमेर कृषि फेड प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड से 1,236 किसान सदस्य जुड़े हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह एफपीओ 2,000 एकड़ क्षेत्र में एकीकृत कीट प्रबंधन (Integrated Pest Management—IPM) आधारित जीरे की खेती करता है।
इसके अलावा, 500 एकड़ क्षेत्र में सौर ऊर्जा आधारित स्प्रिंकलर सिंचाई का इस्तेमाल किया जा रहा है।
स्प्रिंकलर सिंचाई में पानी को फुहारों के रूप में खेत में पहुंचाया जाता है। खेत की मिट्टी, फसल और मौसम के अनुसार इसका इस्तेमाल पानी के बेहतर प्रबंधन में मदद कर सकता है। सौर ऊर्जा से चलने वाली प्रणाली डीजल या बिजली आधारित सिंचाई पर निर्भरता घटाने की संभावना भी रखती है।
जीरा राजस्थान की प्रमुख मसाला फसलों में शामिल है। इसकी खेती में पानी का उचित प्रबंधन, खरपतवार नियंत्रण, रोग एवं कीट निगरानी और समय पर कृषि कार्य महत्वपूर्ण होते हैं।
एकीकृत कीट प्रबंधन के तहत फसल की नियमित निगरानी, जैविक एवं यांत्रिक उपायों और जरूरत पड़ने पर उचित कीटनाशक इस्तेमाल को मिलाकर कीट नियंत्रण की रणनीति अपनाई जाती है। इसका उद्देश्य अनावश्यक रासायनिक उपयोग को कम करते हुए फसल की सुरक्षा करना है।
जैसलमेर का यह उदाहरण दर्शाता है कि स्थानीय जलवायु और संसाधनों के अनुरूप तकनीक अपनाकर खेती को अधिक व्यवस्थित बनाने की दिशा में प्रयास किए जा सकते हैं। हालांकि, पानी की वास्तविक बचत और उत्पादन पर प्रभाव का आकलन करने के लिए पारंपरिक सिंचाई पद्धतियों के साथ तुलनात्मक आंकड़ों की जरूरत होगी।
योजना से किसानों को क्या मिल सकता है लाभ?
पीएमडीडीकेवाई का संभावित प्रभाव केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने तक सीमित नहीं है। यदि जिला कार्ययोजनाओं का प्रभावी क्रियान्वयन होता है, तो किसानों को कई स्तरों पर लाभ मिल सकता है।
1. प्रति हेक्टेयर उत्पादन में सुधार: बेहतर कृषि तकनीक, गुणवत्तापूर्ण बीज, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन और समय पर कृषि सलाह से उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिल सकती है।
2. सिंचाई सुविधाओं का विस्तार: सूक्ष्म सिंचाई, जल संरक्षण और सौर ऊर्जा आधारित पंप जैसी व्यवस्थाएं स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार खेती की सिंचाई जरूरतों को पूरा करने में सहायक हो सकती हैं।
3. फसल विविधीकरण को प्रोत्साहन: किसानों को स्थानीय बाजार और जलवायु के अनुकूल वैकल्पिक फसलों की ओर बढ़ने के अवसर मिल सकते हैं। इससे किसी एक फसल पर अत्यधिक निर्भरता कम करने की संभावना बनती है।
4. फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी: गोदाम, वैज्ञानिक भंडारण, ग्रेडिंग, पैकेजिंग और प्रसंस्करण की सुविधाएं उपलब्ध होने से उपज को बेहतर तरीके से सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
5. संस्थागत ऋण तक बेहतर पहुंच: कृषि ऋण की उपलब्धता बढ़ने से किसान बीज, उर्वरक, मशीनरी, सिंचाई और अन्य कृषि जरूरतों के लिए वित्त जुटा सकते हैं। इसके लिए समय पर ऋण वितरण और छोटे किसानों की पात्रता से जुड़ी समस्याओं का समाधान आवश्यक होगा।
6. बाजार और मूल्य संवर्धन के नए अवसर: किसान उत्पादक संगठनों के माध्यम से सामूहिक बिक्री, बड़े खरीदारों से संपर्क और प्रसंस्करण गतिविधियों में भागीदारी बढ़ सकती है।
7. ग्रामीण रोजगार और उद्यमिता: स्थानीय स्तर पर गोदाम, प्रसंस्करण इकाइयों, कृषि सेवाओं और आपूर्ति श्रृंखलाओं का विकास ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा कर सकता है।
इन संभावनाओं को वास्तविक लाभ में बदलने के लिए छोटे और सीमांत किसानों, महिला किसानों, भूमिहीन कृषि श्रमिकों तथा कमजोर कृषि क्षेत्रों की जरूरतों को भी जिला योजनाओं में पर्याप्त स्थान देना होगा।
आगे की चुनौती: आंकड़ों से जमीनी परिणाम तक
पीएमडीडीकेवाई का पहला वर्ष मुख्य रूप से जिला कार्ययोजनाएं तैयार करने, प्रशासनिक ढांचा स्थापित करने और प्रगति की निगरानी की व्यवस्था विकसित करने का रहा है। अब आने वाले वर्षों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि योजनाओं के तहत निर्धारित लक्ष्य खेतों और ग्रामीण बाजारों में कितनी प्रभावशीलता के साथ लागू होते हैं।
इसके लिए कुछ प्रमुख क्षेत्रों में निरंतर निगरानी जरूरी होगी।
जिलेवार फसल उत्पादकता और प्रति हेक्टेयर उत्पादन में बदलाव।
सिंचित क्षेत्र और जल उपयोग दक्षता में सुधार।
किसानों को मिलने वाले कृषि ऋण की मात्रा और समयबद्ध उपलब्धता।
भंडारण सुविधाओं की क्षमता के साथ उनके वास्तविक उपयोग की स्थिति।
एफपीओ के कारोबार, लाभ और किसान सदस्यों को हुए प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ का आकलन।
फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान तथा कृषि लागत में बदलाव।
महिला किसानों और छोटे एवं सीमांत किसानों की भागीदारी।
जलवायु परिवर्तन, सूखा, बाढ़ और अन्य प्राकृतिक आपदाओं के प्रति कृषि क्षेत्र की तैयारी।
मासिक रैंकिंग और डैशबोर्ड से प्रशासनिक प्रगति पर नजर रखने में मदद मिल सकती है, लेकिन बेहतर परिणामों के लिए आंकड़ों की गुणवत्ता और जमीनी सत्यापन भी जरूरी हैं। साथ ही, विभिन्न जिलों की जलवायु, मिट्टी, सिंचाई और फसल प्रणालियों में अंतर को ध्यान में रखकर लक्ष्य तय करना होगा।
निष्कर्ष: जिला-केंद्रित रणनीति से कृषि विकास को नई दिशा
प्रधानमंत्री धन-धान्य कृषि योजना देश के 100 आकांक्षी कृषि जिलों में स्थानीय जरूरतों के आधार पर विकास कार्यों को आगे बढ़ाने की पहल है। पहले वर्ष में सभी चयनित जिलों की कार्ययोजनाएं तैयार होने, निगरानी व्यवस्था स्थापित होने और संकेतक आधारित समीक्षा शुरू होने से इसके क्रियान्वयन की बुनियाद तैयार हुई है।
गढ़चिरौली में चावल प्रसंस्करण, तुमकुरु में कोपरा की बाजार आपूर्ति और जैसलमेर में सौर ऊर्जा आधारित सिंचाई जैसे उदाहरण दिखाते हैं कि कृषि विकास के लिए उत्पादन के साथ भंडारण, प्रसंस्करण, तकनीक और बाजार संपर्क को जोड़ना भी महत्वपूर्ण है।
आने वाले वर्षों में योजना की सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि इन प्रयासों से किसानों की शुद्ध आय कितनी बढ़ती है, खेती की लागत कितनी कम होती है, पानी और अन्य संसाधनों का कितना बेहतर इस्तेमाल होता है तथा ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के कितने नए अवसर बनते हैं।
कृषि विकास को जिला स्तर पर केंद्रित करना पहला कदम है; इसे किसानों की आय, उत्पादकता और आजीविका में मापने योग्य सुधार में बदलना अगली महत्वपूर्ण चुनौती होगी।
Source: PIB






























