किसानों को फसल सुरक्षा के लिए तकनीकी सलाह, संतुलित यूरिया उपयोग और नियमित निगरानी पर जोर!
जबलपुर। धान की फसल में रोग और कीटों के बढ़ते प्रकोप को देखते हुए किसान कल्याण तथा कृषि विकास विभाग और जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय के संयुक्त दल ने मझौली और सिहोरा विकासखंड के कई गांवों में खेतों का निरीक्षण किया। कलेक्टर राघवेंद्र सिंह के निर्देश पर पहुंची टीम ने किसानों से फसल की स्थिति की जानकारी ली और मौके पर रोग-कीट की पहचान कर उनके नियंत्रण के उपाय बताए।
पांच गांवों में पहुंची कृषि वैज्ञानिकों की टीम
संयुक्त दल ने ग्राम कैलवास, गांधीग्राम, देवनगर, घुटना और खजुरी में धान के खेतों का निरीक्षण किया। किसानों की मौजूदगी में पौधों और पत्तियों की स्थिति का जायजा लिया गया। निरीक्षण के दौरान कुछ खेतों में बैक्टीरियल ब्लाइट यानी जीवाणु झुलसा तथा लीफ फोल्डर यानी पत्ती मोड़क कीट का प्रकोप पाया गया।
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी कि धान की फसल में रोग और कीट की शुरुआती पहचान होने पर समय रहते नियंत्रण उपाय अपनाना जरूरी है। इससे फसल को होने वाले नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है।
जीवाणु झुलसा की स्थिति में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की सलाह
कृषि वैज्ञानिकों ने जीवाणु झुलसा का प्रकोप अधिक होने की स्थिति में कॉपर ऑक्सीक्लोराइड 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर छिड़काव करने की सलाह दी। साथ ही किसानों को फसल की नियमित निगरानी करने को कहा गया, ताकि रोग के फैलाव की स्थिति का समय पर पता लगाया जा सके।
वैज्ञानिकों ने किसानों को यह भी समझाया कि किसी भी रोग या कीट के नियंत्रण के लिए दवा का इस्तेमाल अनुशंसित मात्रा और आवश्यकता के अनुसार ही किया जाना चाहिए। बिना पहचान के बार-बार रासायनिक दवाओं का प्रयोग करने से लागत बढ़ने के साथ फसल और पर्यावरण पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
पत्ती मोड़क कीट की शुरुआती अवस्था में अपनाएं सरल उपाय
धान में पाए गए पत्ती मोड़क कीट के नियंत्रण के लिए वैज्ञानिकों ने प्रारंभिक अवस्था में मुड़ी हुई पत्तियों को खेत से एकत्र कर नष्ट करने की सलाह दी। इससे शुरुआती प्रकोप को बढ़ने से रोकने में मदद मिल सकती है।
यदि कीट का प्रकोप अधिक हो तो किसानों को क्लोरान्ट्रानिलिप्रोल 18.5 प्रतिशत एससी 0.3 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी अथवा एमामेक्टिन बेंजोएट 5 एसजी 0.4 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करने की सलाह दी गई।
खेत में अनावश्यक पानी न भरने की सलाह
कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को धान के खेतों में अनावश्यक रूप से लगातार पानी भरा रखने से बचने की सलाह दी। खेत की स्थिति और फसल की आवश्यकता के अनुसार सिंचाई एवं जल प्रबंधन करने पर जोर दिया गया।
इसके साथ ही नाइट्रोजन प्रबंधन को भी फसल स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण बताया गया। किसानों से यूरिया का संतुलित और अनुशंसित मात्रा में उपयोग करने को कहा गया। जरूरत से अधिक नाइट्रोजन देने से फसल की बढ़वार तो अधिक हो सकती है, लेकिन कुछ परिस्थितियों में रोग और कीटों की समस्या बढ़ने की आशंका रहती है।
सुबह या शाम छिड़काव करने का सुझाव
किसानों को कीटनाशक और फफूंदनाशक का छिड़काव प्रातःकाल या सायंकाल करने की सलाह दी गई। आवश्यकता होने पर स्थिति के अनुसार 10 से 12 दिन के अंतराल के बाद दोबारा छिड़काव करने का सुझाव दिया गया।
कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों से कहा कि दवा का छिड़काव करने से पहले फसल में मौजूद रोग या कीट की सही पहचान करना जरूरी है। साथ ही दवा के लेबल पर दिए गए निर्देशों और स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह का पालन किया जाना चाहिए।
नियमित खेत निरीक्षण से समय पर होगी पहचान
कृषि वैज्ञानिकों ने कहा कि धान की फसल में रोग और कीटों की समस्या को नियंत्रित करने के लिए केवल दवा का छिड़काव ही पर्याप्त नहीं है। नियमित खेत निरीक्षण, संतुलित पोषण, उचित जल प्रबंधन और शुरुआती स्तर पर रोग-कीट की पहचान फसल सुरक्षा की महत्वपूर्ण कड़ियां हैं।
किसानों को सलाह दी गई कि वे सप्ताह में नियमित रूप से खेतों का निरीक्षण करें और पत्तियों के रंग, धब्बों, मुड़ने तथा पौधों की सामान्य स्थिति में होने वाले बदलाव पर नजर रखें। समस्या दिखाई देने पर कृषि विभाग या कृषि वैज्ञानिकों से सलाह लेकर ही नियंत्रण उपाय अपनाएं।
संयुक्त दल में ये अधिकारी रहे शामिल
निरीक्षण दल में कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार गुप्ता, मनीषा पटेल, अनुविभागीय अधिकारी कृषि सिहोरा तथा कृषि विस्तार अधिकारी प्राची बर्मन और जया पालीवाल शामिल रहे। टीम ने किसानों को धान की फसल में पाए गए रोग और कीटों की पहचान तथा उनके नियंत्रण से संबंधित तकनीकी जानकारी भी दी।

























