October 15, 2026 2:06 AM

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कृषि छात्रों के भविष्य पर सरकार का बड़ा ऐलान!

फर्जी कृषि कॉलेजों पर लगेगी लगाम, जल्द गठित होगी एग्रीकल्चर काउंसिल: शिवराज सिंह चौहान

एग्रीविज़न के 10वें राष्ट्रीय अधिवेशन में कृषि शिक्षा की गुणवत्ता, किसानों की आय और आधुनिक तकनीक पर जोर; 10 वर्षों में खाद्यान्न उत्पादन 49 प्रतिशत बढ़ने का दावा

नई दिल्ली: देश में कृषि शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित करने, फर्जी कृषि कॉलेजों पर अंकुश लगाने और कृषि स्नातकों के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए केंद्र सरकार जल्द एग्रीकल्चर काउंसिल के गठन की दिशा में कदम उठाएगी। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने दिल्ली के पूसा परिसर में एग्रीविज़न के 10वें राष्ट्रीय अधिवेशन को संबोधित करते हुए यह बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि कृषि शिक्षा के नाम पर केवल डिग्रियां बांटने वाले संस्थानों को मनमानी करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

कृषि मंत्री ने कहा कि सरकार का उद्देश्य कृषि शिक्षा को अधिक गुणवत्तापूर्ण, व्यावहारिक और रोजगारोन्मुख बनाना है, ताकि कृषि में बीएससी और एमएससी जैसी डिग्री हासिल करने वाले युवाओं की पढ़ाई का वास्तविक लाभ उन्हें मिल सके। उन्होंने कृषि छात्रों, वैज्ञानिकों और विशेषज्ञों से ऐसी नीतिगत सिफारिशें देने का आह्वान किया, जिनसे कृषि क्षेत्र की चुनौतियों का समाधान किया जा सके।

कृषि शिक्षा में गुणवत्ता और जवाबदेही पर जोर

देश में कृषि महाविद्यालयों की बढ़ती संख्या के बीच उनकी शैक्षणिक गुणवत्ता, आधारभूत सुविधाओं और मानकों को लेकर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में एग्रीकल्चर काउंसिल के गठन की घोषणा को कृषि शिक्षा के नियमन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। हालांकि, काउंसिल के गठन की समयसीमा, अधिकारों और नियामक ढांचे का विस्तृत ब्योरा सामने आना अभी बाकी है।

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कृषि शिक्षा प्राप्त करने वाले युवाओं के भविष्य के साथ समझौता नहीं किया जा सकता। सरकार शॉर्ट टर्म और लॉन्ग टर्म रोडमैप तैयार करने पर काम करेगी, ताकि कृषि शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सके और डिग्रीधारकों को उनकी योग्यता के अनुरूप अवसर मिलें।

15 से 30 दिनों में फिर बैठक करने की तैयारी

अधिवेशन में कृषि नीति और किसानों से जुड़े मुद्दों पर विचार-विमर्श को महत्व देते हुए मंत्री ने कहा कि छात्र, वैज्ञानिक और कृषि संगठनों को अपने अनुभवों के आधार पर ठोस सुझाव देने चाहिए। उन्होंने कहा, “आप मंथन से अमृत निकालिए, हम उसे लागू करेंगे।”

उन्होंने संकेत दिया कि अधिवेशन में सामने आने वाले सुझावों पर आगे चर्चा के लिए अगले 15 दिनों से एक महीने के भीतर प्रतिनिधियों के साथ दोबारा बैठक की जाएगी। इस दौरान अल्पकालिक और दीर्घकालिक कार्ययोजना तैयार करने पर विचार होगा। इससे कृषि क्षेत्र की समस्याओं के समाधान के लिए विशेषज्ञों और सरकार के बीच संवाद को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।

खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि, अब भंडारण और बाजार पर ध्यान

भारत की कृषि उपलब्धियों का उल्लेख करते हुए केंद्रीय मंत्री ने कहा कि देश ने खाद्यान्न उत्पादन के क्षेत्र में लंबा सफर तय किया है। एक समय भारत को खाद्यान्न की जरूरतें पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन आज भारतीय किसानों के परिश्रम, कृषि अनुसंधान और सरकारी प्रयासों से देश खाद्यान्न उत्पादन में आत्मनिर्भरता की दिशा में मजबूत स्थिति में पहुंचा है।

मंत्री के अनुसार, वर्ष 2014 से 2024 के बीच देश का कृषि उत्पादन 49 प्रतिशत बढ़ा। उन्होंने चावल उत्पादन और निर्यात में भारत की वैश्विक स्थिति का भी उल्लेख किया तथा गेहूं उत्पादन में देश को दूसरे स्थान पर बताया।

उन्होंने कहा कि अब कृषि क्षेत्र के सामने चुनौती केवल उत्पादन बढ़ाने की नहीं है। उत्पादित अनाज का वैज्ञानिक तरीके से भंडारण, कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी, बेहतर आपूर्ति व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय बाजारों तक किसानों की उपज पहुंचाना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादन के साथ-साथ भंडारण, प्रसंस्करण, परिवहन और बाजार संपर्क मजबूत होने से किसानों को बेहतर मूल्य मिल सकता है। इससे खाद्यान्न की बर्बादी कम करने और कृषि उत्पादों की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाने में भी मदद मिलेगी।

भारत को ग्लोबल फूड आपूर्ति का प्रमुख केंद्र बनाने का लक्ष्य

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि भारत को केवल घरेलू खाद्यान्न जरूरतें पूरी करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वैश्विक खाद्य आपूर्ति में भी बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। उनका जोर किसानों की आजीविका बेहतर बनाने के साथ भारत को दुनिया के प्रमुख खाद्य आपूर्तिकर्ताओं में शामिल करने पर रहा।

इसके लिए कृषि उत्पादन की गुणवत्ता, खाद्य प्रसंस्करण, आधुनिक भंडारण, निर्यात संबंधी सुविधाओं और किसानों को बाजार से जोड़ने वाली व्यवस्थाओं को मजबूत करना जरूरी होगा। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कृषि उत्पाद तैयार करने और मूल्यवर्धन पर ध्यान देना भी महत्वपूर्ण है।

छोटे किसानों की आय बढ़ाने के लिए एकीकृत खेती जरूरी

देश में छोटे और सीमांत किसानों की बड़ी संख्या को देखते हुए मंत्री ने एकीकृत कृषि प्रणाली यानी इंटीग्रेटेड फार्मिंग को किसानों की आय बढ़ाने का महत्वपूर्ण माध्यम बताया। उन्होंने औसत कृषि जोत लगभग 0.96 हेक्टेयर होने का उल्लेख करते हुए कहा कि सीमित जमीन पर केवल एक फसल के सहारे परिवार की आय बढ़ाना कई किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण है।

ऐसे में फसल की पैदावार के साथ बागवानी, फल-सब्जियों की खेती, औषधीय पौधों, पशुपालन, डेयरी, मत्स्य पालन, मधुमक्खी पालन और प्राकृतिक खेती जैसी गतिविधियों को जोड़ना उपयोगी हो सकता है। इससे किसान एक ही आय स्रोत पर निर्भर रहने के बजाय सालभर आमदनी के अलग-अलग अवसर विकसित कर सकते हैं।

एकीकृत खेती की सफलता के लिए स्थानीय जलवायु, पानी की उपलब्धता, बाजार की मांग, पशुओं के लिए चारे और निवेश क्षमता को ध्यान में रखकर मॉडल तैयार करना जरूरी है। कृषि विज्ञान केंद्रों, कृषि विश्वविद्यालयों और संबंधित विभागों की मदद से किसानों को क्षेत्र के अनुकूल तकनीक तथा प्रशिक्षण उपलब्ध कराया जा सकता है।

खेती में एआई, मशीन लर्निंग और रोबोटिक्स की भूमिका

कृषि को अधिक आधुनिक और उत्पादक बनाने के लिए कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), मशीन लर्निंग और रोबोटिक्स जैसी तकनीकों को अपनाने पर भी जोर दिया गया। इन तकनीकों के माध्यम से मौसम संबंधी जानकारी, फसल में रोगों की पहचान, सिंचाई प्रबंधन, कीट नियंत्रण और कृषि मशीनों के बेहतर इस्तेमाल में सहायता मिल सकती है।

हालांकि, छोटे किसानों तक इन तकनीकों का लाभ पहुंचाने के लिए सस्ती सेवाएं, डिजिटल प्रशिक्षण, स्थानीय भाषा में जानकारी और साझा कृषि उपकरणों की उपलब्धता महत्वपूर्ण होगी। किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), सहकारी समितियों और कृषि संस्थानों के माध्यम से ऐसी सुविधाओं को अधिक किसानों तक पहुंचाया जा सकता है।

कृषि युवाओं और वैज्ञानिकों की भागीदारी महत्वपूर्ण

एग्रीविज़न के 10वें राष्ट्रीय अधिवेशन में देश के विभिन्न हिस्सों से आए कृषि वैज्ञानिकों, शोधार्थियों और छात्र-छात्राओं ने भाग लिया। कार्यक्रम के दौरान संगठन की दस वर्षों की यात्रा पर आधारित विशेष पुस्तिका का विमोचन भी किया गया।

अधिवेशन का प्रमुख संदेश कृषि शिक्षा में सुधार, शोध को खेतों तक पहुंचाने, किसानों की आय के नए स्रोत विकसित करने और तकनीक आधारित खेती को बढ़ावा देने से जुड़ा रहा। कृषि क्षेत्र में दीर्घकालिक बदलाव के लिए नीतिगत घोषणाओं के साथ उनका प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी होगा।

कृषि क्षेत्र के लिए आगे की राह

भारत की कृषि व्यवस्था के सामने अब उत्पादन बढ़ाने के साथ किसानों को लाभकारी मूल्य दिलाने, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने, कृषि शिक्षा में गुणवत्ता सुनिश्चित करने और युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा करने की चुनौती है। एग्रीकल्चर काउंसिल के गठन की प्रस्तावित पहल और अधिवेशन से प्राप्त सुझावों पर आगे की कार्रवाई इस दिशा में महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। वास्तविक बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि घोषित योजनाओं को किस तरह लागू किया जाता है और उनका लाभ किसानों, कृषि छात्रों तथा ग्रामीण उद्यमियों तक कितनी प्रभावी ढंग से पहुंचता है।