October 14, 2026 8:14 PM

Krishi Times

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रांची में पांच दिवसीय डेयरी प्रशिक्षण कार्यक्रम!

डेयरी पशुपालकों को आधुनिक पशु प्रबंधन का प्रशिक्षण, स्वच्छ दूध उत्पादन और पशु स्वास्थ्य पर जोर

एनडीडीबी के सिलीगुड़ी केंद्र ने रांची में आयोजित किया पांच दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम, पशुओं के पोषण से लेकर डेयरी बीमा और डिजिटल प्रसार तक दी गई जानकारी

डेयरी क्षेत्र में दूध उत्पादन बढ़ाने, पशुओं के स्वास्थ्य में सुधार लाने और पशुपालकों की आय को बेहतर बनाने के उद्देश्य से राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (एनडीडीबी) के पूर्वी क्षेत्रीय प्रदर्शन एवं प्रशिक्षण केंद्र, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल) ने पांच दिवसीय डेयरी पशु प्रबंधन प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया। यह कार्यक्रम एनडीडीबी प्रबंधित झारखंड दुग्ध के प्रायोजन में रांची में संपन्न हुआ। झारखंड दुग्ध का ब्रांड ‘Medha – Taazgi Jharkhand Ki’ है।

प्रशिक्षण में डेयरी पशुपालन से जुड़े विभिन्न तकनीकी और व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान दिया गया। इसका उद्देश्य पशुपालकों एवं प्रतिभागियों को वैज्ञानिक पशु प्रबंधन के तरीकों से परिचित कराना और उन्हें ऐसी तकनीकों की जानकारी देना था, जिनसे पशुओं की उत्पादकता बढ़ाने के साथ दूध की गुणवत्ता और डेयरी व्यवसाय की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार किया जा सके।

पशु स्वास्थ्य, पोषण और प्रजनन प्रबंधन पर प्रशिक्षण

कार्यक्रम के दौरान पशु प्रजनन, संतुलित पोषण, रोगों की रोकथाम और स्वच्छ दूध उत्पादन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर जानकारी दी गई। प्रतिभागियों को बताया गया कि डेयरी व्यवसाय में बेहतर परिणाम हासिल करने के लिए पशुओं को उचित आहार, समय पर स्वास्थ्य देखभाल और वैज्ञानिक प्रबंधन उपलब्ध कराना जरूरी है।

प्रशिक्षण में बछड़ों, गाभिन गायों और दूध देने वाले पशुओं की अलग-अलग जरूरतों के अनुसार देखभाल करने पर भी जोर दिया गया। इसके साथ पशु आवास की उचित व्यवस्था, डेयरी पशु बीमा और सहकारी सिद्धांतों की जानकारी दी गई। इन विषयों का उद्देश्य पशुपालकों को पशुओं की देखभाल के साथ-साथ डेयरी संचालन के आर्थिक और संगठनात्मक पहलुओं को समझने में मदद करना था।

व्यावहारिक प्रशिक्षण से तकनीकी दक्षता बढ़ाने पर जोर

कार्यक्रम में सैद्धांतिक जानकारी के साथ व्यावहारिक गतिविधियों को भी प्रमुखता दी गई। प्रतिभागियों ने साइलेज निर्माण, मिश्रित पशु आहार तैयार करने, पशुओं का शारीरिक भार मापने और गाय के मलाशय का तापमान जांचने जैसी गतिविधियों में सक्रिय भागीदारी की।

साइलेज निर्माण और संतुलित पशु आहार की जानकारी विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि गुणवत्तापूर्ण चारे की उपलब्धता डेयरी पशुओं के पोषण और दूध उत्पादन को प्रभावित करती है। इसी तरह, पशुओं के वजन और शरीर के तापमान की निगरानी से उनकी शारीरिक स्थिति का आकलन करने तथा स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं की पहचान में सहायता मिल सकती है।

डेयरी विकास में महिलाओं और डिजिटल माध्यमों की भूमिका

प्रशिक्षण में डेयरी व्यवसाय में महिलाओं की भूमिका, डिजिटल प्रसार साधनों और सहकारी व्यवस्था के महत्व पर भी चर्चा की गई। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं पशुओं को चारा देने, दूध निकालने और उनकी देखभाल जैसे कार्यों में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। ऐसे में उन्हें वैज्ञानिक प्रशिक्षण और तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराना डेयरी व्यवसाय की उत्पादकता तथा ग्रामीण आजीविका को मजबूत करने में उपयोगी हो सकता है।

डिजिटल माध्यमों के जरिए पशुपालकों तक पशु स्वास्थ्य, पोषण, प्रजनन और सरकारी योजनाओं से संबंधित जानकारी पहुंचाने की संभावनाओं पर भी जोर दिया गया। इसके अतिरिक्त प्रतिभागियों को भारत में डेयरी क्षेत्र के विकास में एनडीडीबी की भूमिका से अवगत कराया गया।

डेयरी क्षेत्र के लिए प्रशिक्षण क्यों महत्वपूर्ण?

डेयरी व्यवसाय में केवल पशुओं की संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। बेहतर नस्ल, संतुलित आहार, समय पर स्वास्थ्य देखभाल, स्वच्छ दूध उत्पादन और वैज्ञानिक आवास प्रबंधन का संयुक्त प्रभाव दूध उत्पादन तथा पशुपालन की लागत पर पड़ता है। इसलिए इस तरह के प्रशिक्षण कार्यक्रम पशुपालकों को पारंपरिक अनुभव के साथ आधुनिक तकनीकों को अपनाने में मदद कर सकते हैं।

कृषि एवं ग्रामीण अर्थव्यवस्था के नजरिए से, वैज्ञानिक डेयरी प्रबंधन छोटे और सीमांत पशुपालकों के लिए विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है। यदि प्रशिक्षण में प्राप्त जानकारी को नियमित पशु देखभाल और डेयरी संचालन में अपनाया जाए, तो इससे पशुओं के स्वास्थ्य, दूध की गुणवत्ता और व्यवसाय की स्थिरता में सुधार की संभावनाएं बढ़ सकती हैं।

एनडीडीबी के सिलीगुड़ी केंद्र और झारखंड दुग्ध की यह पहल डेयरी क्षेत्र में तकनीकी क्षमता निर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। ऐसे कार्यक्रमों का व्यापक लाभ सुनिश्चित करने के लिए प्रशिक्षण के बाद भी पशुपालकों को तकनीकी मार्गदर्शन, स्थानीय स्तर पर सहायता और वैज्ञानिक पशुपालन पद्धतियों को अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना उपयोगी होगा।