October 14, 2026 12:37 AM

Krishi Times

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छोटे किसानों के लिए विश्व बैंक और IFAD की बड़ी पहल!

ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मिलेगी नई रफ्तार, छोटे किसानों और युवाओं के लिए बढ़ेगा निवेश; विश्व बैंक और IFAD ने किया समझौता

कृषि, खाद्य प्रणालियों और ग्रामीण रोजगार को मजबूत करने के लिए दोनों संस्थाएं मिलकर करेंगी निवेश | जल सुरक्षा, जलवायु अनुकूल खेती और बाजार से जुड़ाव पर रहेगा जोर

बैंकॉक, – ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने, छोटे किसानों की आय बढ़ाने और कृषि आधारित रोजगार के नए अवसर पैदा करने की दिशा में विश्व बैंक समूह और अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास कोष (IFAD) ने सहयोग बढ़ाने का महत्वपूर्ण कदम उठाया है। दोनों संस्थाओं ने ग्रामीण क्षेत्रों के आर्थिक बदलाव, कृषि एवं खाद्य प्रणालियों के विकास और निवेश को गति देने के लिए एक नए सह-वित्तपोषण रूपरेखा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। इस पहल का उद्देश्य ग्रामीण समुदायों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना, कृषि को अधिक उत्पादक और जलवायु के अनुकूल बनाना तथा युवाओं के लिए रोजगार और उद्यमिता के अवसर तैयार करना है।

यह समझौता बैंकॉक में 2026 की अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और विश्व बैंक समूह की वार्षिक बैठकों के दौरान किया गया। ऐसे समय में इस सहयोग को महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जब दुनिया के अनेक देशों में आर्थिक विकास की रफ्तार धीमी पड़ रही है, अनिश्चितता बढ़ रही है और बड़ी संख्या में युवा रोजगार की तलाश में श्रम बाजार में प्रवेश कर रहे हैं। कृषि एवं उससे जुड़े कारोबार को रोजगार सृजन, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण आय बढ़ाने के एक महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में विकसित करना इस साझेदारी का प्रमुख लक्ष्य है।

छोटे किसानों की उत्पादकता और बाजार तक पहुंच बढ़ाने पर जोर

विश्व बैंक समूह और IFAD की साझेदारी का प्रमुख उद्देश्य छोटे और सीमांत किसानों को केवल खेती तक सीमित न रखते हुए उन्हें व्यापक कृषि मूल्य शृंखला से जोड़ना है। इसके अंतर्गत उत्पादन बढ़ाने, आधुनिक तकनीक अपनाने, बाजार तक पहुंच मजबूत करने, निजी निवेश आकर्षित करने और कृषि आधारित उद्यमों को प्रोत्साहित करने पर ध्यान दिया जाएगा।

छोटे किसानों के सामने अक्सर गुणवत्तापूर्ण बीज, उन्नत कृषि तकनीक, सिंचाई, सस्ती वित्तीय सहायता, भंडारण, प्रसंस्करण और बेहतर बाजार मूल्य जैसी चुनौतियां रहती हैं। इन समस्याओं के समाधान के लिए वित्तीय निवेश के साथ तकनीकी सहयोग और संस्थागत क्षमता निर्माण जरूरी है। दोनों संस्थाओं का संयुक्त ढांचा इन क्षेत्रों में योजनाओं को अधिक व्यवस्थित तरीके से विकसित करने में मदद कर सकता है।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था में निवेश का लाभ तभी व्यापक होगा, जब किसान उत्पादन के साथ-साथ प्रसंस्करण, पैकेजिंग, परिवहन और विपणन से भी जुड़ेंगे। इससे गांवों में कृषि आधारित सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों के विकास की संभावनाएं बढ़ सकती हैं। डेयरी, पशुपालन, मत्स्य पालन, खाद्य प्रसंस्करण और कृषि सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भी रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सकते हैं।

युवाओं के लिए कृषि बनेगी रोजगार और उद्यमिता का माध्यम

IFAD के अध्यक्ष अल्वारो लारियो ने कहा कि विश्व बैंक और IFAD के पास ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं तथा कृषि-खाद्य प्रणालियों में बदलाव लाने के लिए आवश्यक पहुंच, विशेषज्ञता और निवेश क्षमता है। उनके अनुसार, नया समझौता साझा लक्ष्यों को अधिक निवेश, रोजगार के अवसरों, बेहतर खाद्य सुरक्षा और मजबूत ग्रामीण अर्थव्यवस्थाओं में बदलने में मदद करेगा।

विश्व बैंक समूह के अध्यक्ष अजय बंगा ने कहा कि अगली पीढ़ी को अवसरों की जरूरत है और कृषि रोजगार, आर्थिक विकास तथा खाद्य सुरक्षा का एक शक्तिशाली माध्यम बन सकती है। उन्होंने बताया कि विश्व बैंक समूह की वित्तीय क्षमता और वैश्विक पहुंच को IFAD के ग्रामीण समुदायों तथा कृषि-खाद्य प्रणालियों के अनुभव के साथ जोड़कर छोटे किसानों की उत्पादकता बढ़ाने, उन्हें बाजारों से जोड़ने और निजी निवेश आकर्षित करने में मदद मिल सकती है।

यह दृष्टिकोण विशेष रूप से उन ग्रामीण क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण है, जहां युवाओं को स्थानीय स्तर पर पर्याप्त रोजगार नहीं मिल पाता। यदि कृषि को आधुनिक तकनीक, डिजिटल सेवाओं, प्रसंस्करण और उद्यमिता से जोड़ा जाए, तो ग्रामीण युवा कृषि-उद्यमी, कृषि सेवा प्रदाता, खाद्य प्रसंस्करण कारोबारी और तकनीकी समाधान विकसित करने वाले उद्यमी बन सकते हैं।

AgriConnect और Water Forward पहल को मिलेगा समर्थन

नया समझौता दोनों संस्थाओं की पहले से चल रही साझेदारियों को आगे बढ़ाएगा। इनमें AgriConnect और Water Forward जैसी पहलें शामिल हैं।

AgriConnect का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 30 करोड़ छोटे किसानों के लिए कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने में मदद करना है। इस पहल का व्यापक उद्देश्य छोटे किसानों की उत्पादकता और बाजार से जुड़ाव बढ़ाना, निवेश को प्रोत्साहित करना तथा कृषि को अधिक रोजगारपरक बनाना है।

वहीं, Water Forward पहल का लक्ष्य वर्ष 2030 तक एक अरब लोगों के लिए जल सुरक्षा में सुधार लाना है। कृषि में पानी की उपलब्धता और उसका कुशल उपयोग खाद्य उत्पादन, किसानों की आय तथा जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से निपटने के लिए महत्वपूर्ण है।

अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़ और भूजल पर बढ़ते दबाव के कारण कई देशों में खेती की लागत और उत्पादन संबंधी जोखिम बढ़ रहे हैं। ऐसे में जल संरक्षण, बेहतर सिंचाई प्रबंधन, मौसम आधारित कृषि सलाह और जलवायु अनुकूल खेती में निवेश ग्रामीण आजीविका को अधिक सुरक्षित बनाने में सहायक हो सकता है।

सह-वित्तपोषण में उल्लेखनीय वृद्धि

विश्व बैंक समूह, IFAD का सबसे बड़ा बहुपक्षीय विकास बैंक भागीदार है। दोनों संस्थाओं के बीच सहयोग सह-वित्तपोषण, नीतिगत संवाद और वैश्विक विकास पहलों तक फैला हुआ है।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, विश्व बैंक की अंतरराष्ट्रीय विकास संघ (IDA) के साथ IFAD का सह-वित्तपोषण वर्ष 2021 में लगभग 64.6 करोड़ अमेरिकी डॉलर था, जो 2025 में बढ़कर 1.56 अरब अमेरिकी डॉलर हो गया। इस प्रकार चार वर्षों में यह राशि दोगुने से भी अधिक हो गई।

यह वृद्धि ग्रामीण विकास और कृषि क्षेत्र में बड़े स्तर पर संयुक्त निवेश की बढ़ती भूमिका को दर्शाती है। हालांकि, निवेश की वास्तविक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वित्तपोषित परियोजनाएं किसानों तक किस हद तक पहुंचती हैं, स्थानीय जरूरतों के अनुरूप कितनी प्रभावी होती हैं और उनसे रोजगार, आय तथा उत्पादकता में कितना सुधार आता है।

लेसोथो का उदाहरण: रोजगार, पोषण और जलवायु अनुकूल खेती

दोनों संस्थाओं के सहयोग का एक उदाहरण अफ्रीकी देश लेसोथो में चल रहा 7.05 करोड़ अमेरिकी डॉलर का राष्ट्रीय निवेश कार्यक्रम है। इस कार्यक्रम के तहत अब तक लगभग 1,500 रोजगार सृजित किए गए हैं और 2.17 लाख लोगों तक पोषण संबंधी शिक्षा पहुंचाई गई है।

इसके अलावा, 1.06 लाख से अधिक लोगों ने जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियां अपनाई हैं, जबकि कृषि-मौसम संबंधी सेवाओं का लाभ 9 लाख से अधिक लोगों तक पहुंचा है।

यह उदाहरण बताता है कि ग्रामीण विकास को केवल कृषि उत्पादन तक सीमित रखने के बजाय रोजगार, पोषण, मौसम संबंधी जानकारी और जलवायु अनुकूल तकनीकों के साथ जोड़ने से व्यापक लाभ हासिल किए जा सकते हैं। किसानों को समय पर मौसम संबंधी जानकारी मिलने से बुवाई, सिंचाई, उर्वरक उपयोग और फसल सुरक्षा से जुड़े फैसले बेहतर हो सकते हैं। इसी तरह पोषण शिक्षा ग्रामीण परिवारों में भोजन की गुणवत्ता और स्वास्थ्य संबंधी जागरूकता बढ़ाने में मदद कर सकती है।

हालांकि, इन परिणामों को अन्य देशों में दोहराने के लिए स्थानीय कृषि परिस्थितियों, संस्थागत क्षमता, बाजार की मांग और किसानों की जरूरतों को ध्यान में रखना होगा।

परियोजनाओं की तैयारी से क्रियान्वयन तक बेहतर तालमेल

नया सह-वित्तपोषण ढांचा दोनों संस्थाओं के बीच देश-स्तरीय निवेश परियोजनाओं को विकसित करने और लागू करने की प्रक्रिया को अधिक व्यवस्थित बनाएगा। इसका उद्देश्य परियोजना चक्र के विभिन्न चरणों में नए संयुक्त निवेश अवसरों की पहचान करना और मौजूदा सहयोग को आगे बढ़ाना है।

समझौते के अंतर्गत तकनीकी सहायता, खरीद प्रक्रिया, वित्तीय प्रबंधन, धनराशि वितरण तथा पर्यावरण और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े कार्यों में साझा व्यवस्थाओं को सुविधाजनक बनाया जाएगा। इससे परियोजनाओं की तैयारी और क्रियान्वयन में बेहतर समन्वय स्थापित करने की संभावना है।

विकास परियोजनाओं में केवल धन उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं होता। उनकी प्रभावशीलता के लिए पारदर्शी खरीद प्रक्रिया, समय पर भुगतान, मजबूत निगरानी, पर्यावरणीय सुरक्षा और स्थानीय समुदायों की भागीदारी भी जरूरी होती है। साझा प्रक्रियाओं से दो संस्थाओं के बीच प्रशासनिक तालमेल बेहतर हो सकता है, हालांकि परियोजना की सफलता प्रभावी निगरानी और जवाबदेही पर भी निर्भर करेगी।

2028–2030 की निवेश प्राथमिकताओं से जुड़ा समझौता

यह नया ढांचा IFAD के 14वें पुनर्भरण चक्र की प्राथमिकताओं को आगे बढ़ाने में भी मदद करेगा। यह चक्र 2028 से 2030 की अवधि के लिए निर्धारित है। इसके तहत ग्रामीण समुदायों की जलवायु एवं आर्थिक झटकों से निपटने की क्षमता बढ़ाने, आर्थिक अवसरों का विस्तार करने और ग्रामीण आजीविका में बदलाव लाने वाले निवेश को गति देने पर जोर रहेगा।

ग्रामीण परिवारों की आय अक्सर मौसम, फसल कीमतों और उत्पादन लागत में उतार-चढ़ाव से प्रभावित होती है। इसलिए आय के विविध स्रोत तैयार करना, स्थानीय उद्यमों को बढ़ावा देना, वित्तीय सेवाओं तक पहुंच बढ़ाना और कृषि से जुड़े जोखिमों को कम करना ग्रामीण विकास की महत्वपूर्ण प्राथमिकताएं हैं।

इस संदर्भ में महिला किसानों, स्वयं सहायता समूहों, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs), सहकारी संस्थाओं और ग्रामीण उद्यमियों की भागीदारी भी अहम हो सकती है। यदि इन समूहों को प्रशिक्षण, वित्त, तकनीक और बाजार उपलब्ध हों, तो ग्रामीण क्षेत्रों में उत्पादन से लेकर मूल्य संवर्धन तक स्थानीय आर्थिक गतिविधियों का विस्तार संभव है।

1978 से चली आ रही साझेदारी को नया स्वरूप

विश्व बैंक और IFAD के बीच सहयोग का इतिहास वर्ष 1978 से जुड़ा है। नया समझौता इसी लंबे सहयोग को आधुनिक वित्तीय और प्रशासनिक व्यवस्था के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास है।

इस रूपरेखा के तहत दोनों संस्थाओं की स्वतंत्र नीतियां, वित्तपोषण संबंधी निर्णय और जवाबदेही की आवश्यकताएं बरकरार रहेंगी। समझौता प्रारंभ में पांच वर्षों तक प्रभावी रहेगा और इसके बाद स्वतः अगले पांच वर्ष के लिए नवीनीकृत हो जाएगा।

भारत के किसानों के लिए क्या हैं संभावित मायने?

विश्व बैंक और IFAD के बीच यह समझौता वैश्विक स्तर पर ग्रामीण विकास और कृषि-खाद्य प्रणालियों में निवेश बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। भारत जैसे कृषि प्रधान देश के लिए इसकी प्रासंगिकता छोटे किसानों की उत्पादकता, जल प्रबंधन, जलवायु अनुकूल खेती, ग्रामीण उद्यमिता और कृषि मूल्य शृंखला को मजबूत करने जैसे क्षेत्रों में दिखाई देती है।

हालांकि, इस समझौते की घोषणा को भारत के लिए सीधे घोषित वित्तीय सहायता या किसी नई भारतीय योजना के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। भारत में इससे संबंधित किसी विशिष्ट परियोजना, निवेश राशि या लाभार्थियों की घोषणा उपलब्ध जानकारी में नहीं की गई है। इसका वास्तविक लाभ तभी सामने आएगा, जब संबंधित देशों और परियोजनाओं में ठोस निवेश, नीतिगत सहयोग और स्थानीय स्तर पर क्रियान्वयन के अवसर विकसित होंगे।

भारत में इस तरह के सहयोग मॉडल से सीख लेते हुए किसान उत्पादक संगठनों, डेयरी सहकारी समितियों, कृषि स्टार्टअप, खाद्य प्रसंस्करण इकाइयों और ग्रामीण उद्यमों के लिए निवेश एवं तकनीकी सहायता के बेहतर समन्वय पर विचार किया जा सकता है।

सारांश

विश्व बैंक और IFAD का नया सह-वित्तपोषण समझौता ग्रामीण विकास को केवल कृषि उत्पादन बढ़ाने की कवायद के रूप में नहीं, बल्कि रोजगार, उद्यमिता, जल सुरक्षा, पोषण और जलवायु अनुकूल आजीविका से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। अब इसकी सफलता इस बात से आंकी जाएगी कि संयुक्त निवेश किस हद तक छोटे किसानों की आय, ग्रामीण युवाओं के रोजगार और कृषि-खाद्य प्रणालियों की दीर्घकालिक मजबूती में वास्तविक बदलाव ला पाता है।