सजावटी मत्स्य पालन से बढ़ेंगे ग्रामीण रोजगार और किसानों की आय, मदुरै क्लस्टर का केंद्रीय सचिव ने किया दौरा
कृषि एवं ग्रामीण उद्यमिता को नई दिशा देने की क्षमता रखता है सजावटी मत्स्य पालन
मदुरै, – भारत में सजावटी मत्स्य पालन को एक लाभकारी ग्रामीण उद्यम के रूप में विकसित करने की दिशा में केंद्र सरकार ने वैज्ञानिक उत्पादन, गुणवत्तापूर्ण प्रजनन सामग्री और बाजार संपर्कों को मजबूत करने पर जोर दिया है। इसी क्रम में मत्स्य पालन विभाग, भारत सरकार के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने 12 अक्टूबर को तमिलनाडु के मदुरै जिले के मुक्कम्पट्टी गांव स्थित पदिमुनेश्वर एकीकृत सजावटी मछली फार्म का दौरा किया। इस दौरान उन्होंने प्रगतिशील मछली पालकों और उद्यमियों से बातचीत कर सजावटी मत्स्य पालन की संभावनाओं, चुनौतियों और विकास की रणनीति पर चर्चा की।
भारत सरकार ने प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (पीएमएमएसवाई) के अंतर्गत मदुरै जिले को सजावटी मत्स्य पालन क्लस्टर के रूप में अधिसूचित किया है। इस पहल का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर मछली उत्पादन और प्रजनन को बढ़ावा देने के साथ-साथ रोजगार, उद्यमिता, तकनीकी दक्षता और विपणन व्यवस्था को मजबूत करना है।
वैज्ञानिक प्रजनन और गुणवत्तापूर्ण बीज पर जोर
दौरे के दौरान डॉ. अभिलक्ष लिखी ने सजावटी मछली पालकों के साथ विभिन्न प्रजातियों के प्रजनन, गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता, पानी की गुणवत्ता, जलीय जीवों के स्वास्थ्य, मछलियों के सुरक्षित परिवहन और बाजार तक पहुंच जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की।
उन्होंने कहा कि सजावटी मत्स्य पालन को टिकाऊ और प्रतिस्पर्धी व्यवसाय बनाने के लिए वैज्ञानिक प्रजनन तकनीकों, बेहतर पालन प्रबंधन और जैव सुरक्षा उपायों को अपनाना आवश्यक है। मछलियों की मृत्यु दर कम करने, उनकी गुणवत्ता बनाए रखने और बाजार की मांग के अनुरूप उत्पादन करने के लिए पानी की नियमित जांच, उचित पोषण तथा रोग नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना होगा।
सजावटी मछलियों के कारोबार में गुणवत्तापूर्ण प्रजनन सामग्री और स्वस्थ मछली बीज की अहम भूमिका होती है। यदि पालकों को समय पर अच्छी गुणवत्ता का बीज उपलब्ध हो, तो उत्पादन में स्थिरता लाने और कारोबार के विस्तार में मदद मिल सकती है। इसके साथ ही उच्च मूल्य वाली स्वदेशी सजावटी मछली प्रजातियों के वैज्ञानिक प्रजनन को बढ़ावा देने से भारतीय उद्यमियों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं।
सचिव ने तकनीकी संस्थानों, वित्तीय संस्थाओं और बाजार से जुड़े पक्षों के बीच समन्वय बढ़ाने की आवश्यकता पर भी बल दिया, ताकि छोटे मछली पालकों को प्रशिक्षण, आधुनिक तकनीक, संस्थागत ऋण और बेहतर विपणन सुविधाएं मिल सकें।
25 लाख रुपये की लागत से स्थापित हुआ एकीकृत फार्म
मदुरै के मुक्कम्पट्टी गांव में स्थित पदिमुनेश्वर एकीकृत सजावटी मछली फार्म पीएमएमएसवाई के अंतर्गत 25 लाख रुपये की परियोजना लागत से स्थापित किया गया है। यह इकाई सजावटी मछलियों के प्रजनन और पालन के माध्यम से स्थानीय स्तर पर मत्स्य उद्यमिता का उदाहरण प्रस्तुत करती है।
फार्म में गप्पी, प्लैटी, मौली, स्वोर्डटेल, गोल्डफिश, कोई कार्प, सिक्लिड और फाइटर फिश सहित 30 से अधिक किस्मों की सजावटी मछलियों का प्रजनन एवं पालन किया जाता है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, यह इकाई साल में चार उत्पादन चक्र संचालित करती है और प्रतिवर्ष लगभग दो लाख सजावटी मछली बीज का उत्पादन करती है। इससे लगभग 3.75 लाख रुपये की वार्षिक आय अर्जित होने का अनुमान है। फार्म की ओर से तमिलनाडु और केरल के घरेलू बाजारों में सजावटी मछलियों की आपूर्ति की जाती है।
यह उदाहरण दिखाता है कि अपेक्षाकृत सीमित भूमि पर भी योजनाबद्ध तरीके से सजावटी मत्स्य पालन की इकाई स्थापित की जा सकती है। हालांकि, कारोबार को अधिक लाभकारी बनाने के लिए उत्पादन लागत, बिजली और पानी की उपलब्धता, मछलियों की मृत्यु दर, परिवहन खर्च तथा बाजार में मिलने वाली कीमतों का नियमित आकलन जरूरी है।
देशभर में विकसित किए जा रहे हैं 34 मत्स्य पालन क्लस्टर
डॉ. लिखी ने क्लस्टर आधारित विकास की रणनीति पर जोर देते हुए बताया कि देशभर में 34 अधिसूचित मत्स्य पालन क्लस्टरों को विकसित किया जा रहा है। इस मॉडल के तहत केवल उत्पादन बढ़ाने तक सीमित रहने के बजाय पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है।
इसमें प्रजनन सामग्री और इनपुट की आपूर्ति, उत्पादन सुविधाएं, बुनियादी ढांचा, प्रशिक्षण, प्रसंस्करण, मूल्यवर्धन, ब्रांडिंग, लॉजिस्टिक्स और बाजार संपर्क शामिल हैं।
क्लस्टर आधारित व्यवस्था से एक ही क्षेत्र में काम करने वाले मछली पालकों, उद्यमियों, आपूर्तिकर्ताओं और व्यापारियों के बीच सहयोग बढ़ाया जा सकता है। इससे तकनीकी जानकारी साझा करने, उत्पादन की गुणवत्ता सुधारने और परिवहन एवं विपणन की लागत कम करने की संभावनाएं बनती हैं।
सजावटी मत्स्य पालन में यह मॉडल विशेष रूप से उपयोगी हो सकता है, क्योंकि जीवित मछलियों को बाजार तक पहुंचाने के लिए उचित पैकिंग, ऑक्सीजन व्यवस्था, तापमान नियंत्रण और समयबद्ध परिवहन की जरूरत होती है। यदि क्लस्टर स्तर पर साझा सुविधाएं विकसित की जाएं, तो छोटे उत्पादकों को भी बेहतर बाजारों तक पहुंचने में मदद मिल सकती है।
197.75 लाख टन तक पहुंचा देश का मछली उत्पादन
भारत का मत्स्य पालन क्षेत्र खाद्य सुरक्षा, रोजगार, निर्यात और ग्रामीण अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है। उपलब्ध आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में देश का कुल मछली उत्पादन 197.75 लाख टन तक पहुंच गया।
वहीं, वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का समुद्री उत्पाद निर्यात बढ़कर 73,890 करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंचने की जानकारी दी गई है। यह उपलब्धि मत्स्य एवं समुद्री उत्पाद क्षेत्र की आर्थिक संभावनाओं को रेखांकित करती है।
हालांकि, सजावटी मत्स्य पालन का बाजार खाद्य मछली उत्पादन से अलग है। इसमें मछलियों की सुंदरता, रंग, प्रजाति की विशिष्टता, स्वास्थ्य, आकार और जीवित अवस्था में सुरक्षित आपूर्ति का विशेष महत्व होता है। इसलिए इस क्षेत्र के विकास के लिए सामान्य मत्स्य उत्पादन के साथ-साथ विशिष्ट प्रजनन तकनीकों, एक्वेरियम प्रबंधन और जीवित मछली परिवहन व्यवस्था पर निवेश करना जरूरी है।
3,000 करोड़ रुपये के सजावटी मत्स्य उद्योग में अवसर
आईसीएआर-केंद्रीय मीठे पानी के मत्स्य पालन संस्थान की रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सजावटी मछली उद्योग का अनुमानित मूल्य लगभग 3,000 करोड़ रुपये है। इसमें सजावटी मछलियों के प्रजनन और पालन के अलावा एक्वेरियम उपकरण, जलीय पौधे, चारा, स्वास्थ्य उत्पाद तथा अन्य संबंधित कारोबार शामिल हैं।
भारत में मीठे पानी और समुद्री सजावटी मछलियों की व्यापक जैव विविधता मौजूद है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, देश में 374 से अधिक स्वदेशी मीठे पानी की सजावटी मछली प्रजातियां और 700 से अधिक स्वदेशी समुद्री सजावटी मछली प्रजातियां पाई जाती हैं।
यह जैव विविधता भारत को सजावटी मत्स्य पालन के क्षेत्र में विशिष्ट पहचान बनाने का अवसर प्रदान करती है। यदि स्वदेशी प्रजातियों का वैज्ञानिक और टिकाऊ तरीके से प्रजनन किया जाए, तो इससे घरेलू कारोबार को बढ़ावा मिलने के साथ निर्यात बाजार में भी संभावनाएं विकसित हो सकती हैं।
इस उद्योग की एक बड़ी विशेषता यह है कि इसे छोटे स्तर पर भी शुरू किया जा सकता है। ग्रामीण युवा, महिला स्वयं सहायता समूह, छोटे उद्यमी और स्टार्टअप सीमित स्थान में टैंक आधारित प्रजनन एवं पालन इकाइयां स्थापित कर सकते हैं। हालांकि, सफलता के लिए तकनीकी प्रशिक्षण, बाजार की समझ, नियमित देखभाल और शुरुआती निवेश का सही प्रबंधन आवश्यक है।
पीएमएमएसवाई से हजारों सजावटी मत्स्य इकाइयों को प्रोत्साहन
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत देशभर में 2,672 सजावटी मत्स्य पालन तथा एकीकृत प्रजनन एवं पालन इकाइयों को मंजूरी दी गई है। इनमें 2,465 पालन इकाइयां और 207 एकीकृत इकाइयां शामिल हैं।
इसके अतिरिक्त, वर्ष 2024-25 तक पांच मीठे पानी के सजावटी मछली प्रजनन बैंक और 144 मनोरंजक मत्स्य पालन इकाइयों को भी मंजूरी दी गई थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, इन पहलों के लिए कुल 230.45 करोड़ रुपये का निवेश स्वीकृत किया गया।
इन योजनाओं का उद्देश्य सजावटी मत्स्य पालन से जुड़ेबुनियादी ढांचे को मजबूत करना, उत्पादन क्षमता बढ़ाना और उद्यमियों को व्यवसाय स्थापित करने के अवसर उपलब्ध कराना है। योजना के अंतर्गत सहायता की पात्रता और शर्तें संबंधित घटक तथा लागू दिशा-निर्देशों के अनुसार निर्धारित होती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, योजनाओं का प्रभाव तभी अधिक व्यापक होगा, जब वित्तीय सहायता के साथ लाभार्थियों को तकनीकी प्रशिक्षण, रोग प्रबंधन, उत्पादन योजना और बाजार से जुड़ने में भी सहयोग मिले।
सजावटी मछली निर्यात में गुणवत्ता और परिवहन अहम
समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (एमपीईडीए) के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 59.73 टन सजावटी मछली उत्पादों का निर्यात किया, जिनका मूल्य 16.94 करोड़ रुपये था।
देश में विविध प्रजातियों की उपलब्धता के बावजूद, सजावटी मछली निर्यात को बढ़ाने के लिए कई क्षेत्रों में सुधार की जरूरत है। इनमें उच्च मूल्य वाली प्रजातियों का व्यावसायिक प्रजनन, स्वदेशी प्रजातियों का संवर्धन, गुणवत्ता आश्वासन, प्रमाणीकरण, प्रजातियों की पहचान और पता लगाने योग्य आपूर्ति व्यवस्था शामिल हैं।
जीवित मछलियों के निर्यात में परिवहन की गुणवत्ता भी महत्वपूर्ण होती है। पैकिंग में पर्याप्त ऑक्सीजन, पानी की उपयुक्त स्थिति, तापमान नियंत्रण और परिवहन में लगने वाले समय का ध्यान रखना आवश्यक है। खराब प्रबंधन से मछलियों की मृत्यु दर बढ़ सकती है, जिससे कारोबारियों को आर्थिक नुकसान होता है और विदेशी बाजारों में भरोसा कमजोर पड़ सकता है।
इसलिए उत्पादकों, निर्यातकों, तकनीकी संस्थानों और संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय बढ़ाने की जरूरत है। गुणवत्ता के एक समान मानक अपनाने और बाजार की मांग के अनुरूप प्रजातियों का उत्पादन करने से भारतीय सजावटी मछली कारोबार की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ सकती है।
ग्रामीण युवाओं और महिला उद्यमियों के लिए नई संभावनाएं
सजावटी मत्स्य पालन केवल मछली उत्पादन का कारोबार नहीं है, बल्कि इससे जुड़ी पूरी मूल्य श्रृंखला रोजगार के अनेक अवसर पैदा कर सकती है। मछली बीज उत्पादन, टैंक निर्माण, एक्वेरियम डिजाइन, चारा आपूर्ति, जलीय पौधों का उत्पादन, पैकिंग, परिवहन, खुदरा बिक्री और ऑनलाइन विपणन जैसे क्षेत्रों में छोटे उद्यम विकसित किए जा सकते हैं।
महिला स्वयं सहायता समूह सामूहिक रूप से छोटे प्रजनन केंद्र और एक्वेरियम कारोबार शुरू कर सकते हैं। वहीं, प्रशिक्षित ग्रामीण युवा डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ग्राहकों तक पहुंच बनाकर सजावटी मछलियों और संबंधित उत्पादों की बिक्री कर सकते हैं।
इसके लिए स्थानीय स्तर पर प्रशिक्षण कार्यक्रम, तकनीकी मार्गदर्शन, ऋण सुविधा और खरीदारों से संपर्क स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा। साथ ही, कारोबार शुरू करने से पहले संभावित बाजार, प्रजातियों की मांग, उत्पादन लागत और संचालन संबंधी जोखिमों का आकलन किया जाना चाहिए।
आगे की राह
मदुरै के सजावटी मत्स्य पालन क्लस्टर का दौरा इस बात को रेखांकित करता है कि मत्स्य क्षेत्र में विविधीकरण के जरिए ग्रामीण उद्यमिता और आय बढ़ाने की संभावनाएं मौजूद हैं। वैज्ञानिक प्रजनन, गुणवत्तापूर्ण बीज, जैव सुरक्षा, आधुनिक परिवहन और बाजार संपर्कों को एक साथ मजबूत करके सजावटी मत्स्य पालन को अधिक संगठित व्यवसाय बनाया जा सकता है।
यदि क्लस्टर स्तर पर साझा सुविधाएं, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और विपणन नेटवर्क प्रभावी ढंग से विकसित किए जाएं, तो छोटे उत्पादकों को भी बड़े बाजारों तक पहुंचने का अवसर मिल सकता है। इससे ग्रामीण युवाओं और महिला उद्यमियों के लिए रोजगार के नए रास्ते खुलने के साथ भारत के सजावटी मत्स्य उद्योग को घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजारों में आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है।






























