October 1, 2026 1:10 AM

Krishi Times

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रबी MSP में बड़ा इजाफा, जानिए किस फसल पर कितना बढ़ा भाव!

रबी फसलों के MSP में बढ़ोतरी: कुसुम, सरसों और मसूर को बड़ा फायदा, किसानों को लागत पर 50% से 106% तक लाभ का दावा

कैबिनेट का बड़ा फैसला, रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए सभी छह अधिदेशित फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में वृद्धि

नई दिल्ली। रबी फसलों की बुवाई शुरू होने से पहले केंद्र सरकार ने किसानों के लिए बड़ा फैसला लिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में आर्थिक मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (CCEA) ने रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए सभी छह अधिदेशित रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) में बढ़ोतरी को मंजूरी दे दी है। सरकार के अनुसार इस फैसले का उद्देश्य किसानों को उनकी उपज का लाभकारी मूल्य उपलब्ध कराने के साथ-साथ दलहन और तिलहन उत्पादन को बढ़ावा देना तथा फसल विविधीकरण को गति देना है।

कुसुम के MSP में सबसे बड़ी बढ़ोतरी

नई MSP व्यवस्था में सबसे अधिक वृद्धि कुसुम के लिए की गई है। कुसुम के MSP में 675 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी के बाद इसकी नई दर 7,215 रुपये प्रति क्विंटल हो गई है।

इसके बाद रेपसीड एवं सरसों के MSP में 413 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि हुई है और नई दर 6,613 रुपये प्रति क्विंटल निर्धारित की गई है। मसूर का MSP 390 रुपये बढ़कर 7,390 रुपये प्रति क्विंटल हो गया है।

चना, जौ और गेहूं के MSP में क्रमशः 83 रुपये, 136 रुपये और 25 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है।

छह रबी फसलों की नई MSP दरें

फसल MSP 2026-27 MSP 2027-28 वृद्धि
गेहूं ₹2,585 ₹2,610 ₹25
जौ ₹2,150 ₹2,286 ₹136
चना ₹5,875 ₹5,958 ₹83
मसूर ₹7,000 ₹7,390 ₹390
रेपसीड एवं सरसों ₹6,200 ₹6,613 ₹413
कुसुम ₹6,540 ₹7,215 ₹675

शिवराज सिंह चौहान: लागत पर 50 से 106 प्रतिशत तक मार्जिन

केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण तथा ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने MSP फैसले के बाद कहा कि सरकार की नीति किसानों को उनकी औसत उत्पादन लागत (A2+FL) पर कम से कम 50 प्रतिशत या उससे अधिक का लाभ उपलब्ध कराने की है।

उन्होंने बताया कि रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए तय MSP में अखिल भारतीय भारित औसत उत्पादन लागत के मुकाबले 50 प्रतिशत से 106 प्रतिशत तक का मार्जिन रखा गया है।

चौहान के अनुसार गेहूं पर लागत के मुकाबले सबसे अधिक 106 प्रतिशत, रेपसीड एवं सरसों पर 96 प्रतिशत और मसूर पर 92 प्रतिशत का मार्जिन है। चना पर यह मार्जिन 59 प्रतिशत, जौ पर 58 प्रतिशत और कुसुम पर 50 प्रतिशत है।

किसानों की आय के साथ फसल विविधीकरण पर जोर

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार के लिए केवल कृषि उत्पादन बढ़ाना ही लक्ष्य नहीं है, बल्कि किसानों को उनकी मेहनत का लाभकारी मूल्य दिलाना भी महत्वपूर्ण है।

MSP में इस बार जिस तरह दलहन और तिलहन फसलों को अपेक्षाकृत अधिक बढ़ोतरी मिली है, उससे सरकार की फसल विविधीकरण की रणनीति भी दिखाई देती है। इससे किसानों को गेहूं जैसी पारंपरिक रबी फसलों के साथ-साथ मसूर, चना, सरसों और कुसुम जैसी फसलों के विकल्प मिलते हैं।

MSP भुगतान 2.65 लाख करोड़ से बढ़कर 8.36 लाख करोड़ रुपये

कृषि मंत्री ने MSP खरीद के आंकड़ों का उल्लेख करते हुए कहा कि वर्ष 2004-05 से 2013-14 के दौरान छह प्रमुख रबी फसलों की MSP खरीद के लिए किसानों को कुल 2.65 लाख करोड़ रुपये का भुगतान किया गया था।

वहीं, वर्ष 2014-15 से 2025-26 के दौरान यह राशि बढ़कर 8.36 लाख करोड़ रुपये हो गई। सरकार इसे किसानों को MSP के माध्यम से किए गए भुगतान में बड़ी वृद्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

गेहूं की खरीद भी बढ़ी

सरकार के अनुसार 2014-15 से 2025-26 के दौरान गेहूं की खरीद 3715 लाख मीट्रिक टन रही, जबकि 2004-05 से 2013-14 के दौरान यह 2254 लाख मीट्रिक टन थी।

इसी अवधि में छह प्रमुख रबी फसलों की कुल खरीद भी 2302 लाख मीट्रिक टन से बढ़कर 3921 लाख मीट्रिक टन बताई गई है।

यह आंकड़े MSP व्यवस्था के तहत सरकारी खरीद की भूमिका को समझने के लिए महत्वपूर्ण हैं, हालांकि किसी किसान को वास्तविक लाभ उसके क्षेत्र में खरीद केंद्रों की उपलब्धता, मंडी व्यवस्था, गुणवत्ता मानकों और सरकारी खरीद में उसकी फसल की स्वीकार्यता पर भी निर्भर करता है।

‘राइस फॉलो एरिया’ में बढ़ेगी दलहन की खेती

शिवराज सिंह चौहान ने दलहन पैदावार बढ़ाने के लिए ‘राइस फॉलो एरिया’ की रणनीति का भी उल्लेख किया। ऐसे क्षेत्र जहां धान की कटाई के बाद खेत खाली रह जाते हैं, वहां रबी मौसम में दलहन की खेती को बढ़ावा देने की योजना है।

सरकार के अनुसार ऐसे किसानों को उन्नत बीज, तकनीकी सलाह और विभिन्न प्रकार की सहायता उपलब्ध कराने पर जोर दिया जा रहा है। इसका उद्देश्य खाली पड़ी कृषि भूमि का उपयोग बढ़ाने के साथ घरेलू दलहन उत्पादन को मजबूत करना है।

दालों के आयात पर निर्भरता कम करने की कोशिश

चौहान ने कहा कि भारत वर्तमान में बड़ी मात्रा में दालों का आयात करता है। उनके अनुसार घरेलू उत्पादन बढ़ाना और आयात निर्भरता कम करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल है।

इसी संदर्भ में मसूर और चना के MSP में वृद्धि को दलहन उत्पादन बढ़ाने की रणनीति से जोड़ा गया है। हालांकि MSP बढ़ना अपने आप में उत्पादन बढ़ने की गारंटी नहीं है। इसके लिए किसानों को गुणवत्तापूर्ण बीज, सिंचाई, तकनीकी सलाह, बाजार और प्रभावी खरीद व्यवस्था भी जरूरी होगी।

खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता के लिए सरसों और कुसुम पर जोर

भारत की खाद्य तेल जरूरतों का एक हिस्सा आयात से पूरा होता है। ऐसे में घरेलू तिलहन उत्पादन बढ़ाना कृषि नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

शिवराज सिंह चौहान ने बताया कि खाद्य तेलों के आयात बिल को कम करने और तिलहन में आत्मनिर्भरता बढ़ाने के उद्देश्य से रेपसीड एवं सरसों के MSP में 413 रुपये की वृद्धि की गई है।

कुसुम के MSP में 675 रुपये की वृद्धि को भी इसी व्यापक रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। कुसुम विशेष रूप से कम उपजाऊ और सीमित सिंचाई वाले क्षेत्रों में उगाई जाती है, इसलिए इसकी खेती को प्रोत्साहन देने से ऐसे क्षेत्रों के किसानों को वैकल्पिक फसल का विकल्प मिल सकता है।

जौ: कम पानी वाली फसल को बढ़ावा

कृषि मंत्री ने जौ के उत्पादन पर भी विशेष जोर दिया। उनके अनुसार भारत को वर्ष 2025-26 में लगभग 1.13 लाख मीट्रिक टन जौ का आयात करना पड़ा।

उन्होंने जौ को कम पानी में तैयार होने वाली टिकाऊ फसल बताते हुए कहा कि इसके उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए MSP में 136 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि की गई है। नई MSP दर 2,286 रुपये प्रति क्विंटल है।

जल संकट वाले क्षेत्रों में कम पानी वाली फसलों का चयन आने वाले समय में किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। हालांकि स्थानीय मिट्टी, मौसम, बाजार और सिंचाई की स्थिति को ध्यान में रखकर ही फसल का चुनाव करना जरूरी होगा।

राज्यों के लिए अलग-अलग रबी कार्ययोजना

शिवराज सिंह चौहान ने यह भी बताया कि कृषि मंत्रालय ने राज्यों के साथ विचार-विमर्श के बाद State-Specific Rabi Plan तैयार किया है।

इस रणनीति में राज्यों की जल उपलब्धता, मौसम और कृषि परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे अपेक्षाकृत सूखा प्रभावित क्षेत्रों में कम पानी और सूखा सहन करने वाली फसलों पर जोर देने की बात कही गई है।

वहीं मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों के लिए उत्पादन बढ़ाने पर केंद्रित रबी रणनीति तैयार किए जाने की जानकारी दी गई है। चौहान ने राज्यों से स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रबी फसल योजना बनाने पर जोर दिया है।

उत्पादन लागत की गणना में क्या-क्या शामिल है?

MSP तय करने में जिस उत्पादन लागत को आधार बनाया जाता है, उसमें खेती में होने वाली कई तरह की लागतें शामिल होती हैं। इनमें किराए पर लिया गया मानव श्रम, मशीन या पशु श्रम, पट्टे की भूमि का किराया, बीज, उर्वरक, खाद, सिंचाई शुल्क, कृषि उपकरणों और भवनों का मूल्यह्रास, कार्यशील पूंजी पर ब्याज तथा डीजल-बिजली जैसी लागतें शामिल हैं।

इसके अलावा पारिवारिक श्रम के अनुमानित मूल्य को भी लागत गणना में शामिल किया जाता है।

किसानों के लिए फैसले का व्यावहारिक मतलब

रबी MSP में वृद्धि ऐसे समय हुई है जब किसान खरीफ फसल की कटाई के बाद गेहूं, चना, मसूर, सरसों, जौ और कुसुम जैसी फसलों की तैयारी करेंगे। नई MSP दरें किसानों को फसल चयन के समय एक मूल्य संकेत उपलब्ध कराती हैं।

हालांकि किसान के वास्तविक आर्थिक लाभ का निर्धारण केवल MSP दर से नहीं होता। फसल की उत्पादकता, खेती की लागत, स्थानीय मंडी में कीमत, सरकारी खरीद की उपलब्धता, भंडारण सुविधा और बाजार तक पहुंच भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

सरकार की रणनीति: उत्पादन के साथ पोषण और आयात निर्भरता पर फोकस

शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि सरकार का लक्ष्य खाद्य सुरक्षा के साथ पोषण सुरक्षा और कृषि क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को मजबूत करना है। उनके अनुसार छोटे और सीमांत किसानों की बड़ी संख्या को देखते हुए कृषि नीति में उत्पादन के साथ लाभकारी मूल्य पर भी ध्यान देना जरूरी है।

रबी MSP में इस बार दलहन और तिलहन फसलों को मिली अपेक्षाकृत बड़ी बढ़ोतरी इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण नीति संकेत है। आने वाले रबी सीजन में इस फैसले का वास्तविक असर इस बात पर निर्भर करेगा कि किसान कितने क्षेत्र में इन फसलों को अपनाते हैं और सरकारी खरीद तथा बाजार व्यवस्था उन्हें किस स्तर तक समर्थन देती है।

कुल मिलाकर, रबी विपणन सत्र 2027-28 के लिए MSP में वृद्धि ने गेहूं से लेकर कुसुम तक सभी छह अधिदेशित फसलों के मूल्य में बदलाव किया है। सबसे बड़ी वृद्धि कुसुम में 675 रुपये, सरसों में 413 रुपये और मसूर में 390 रुपये प्रति क्विंटल है। सरकार ने इसे किसानों को लाभकारी मूल्य देने के साथ दलहन-तिलहन उत्पादन, जल संरक्षण और फसल विविधीकरण की व्यापक रणनीति से जोड़ा है।