October 14, 2026 3:02 PM

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वल्लभ अश्वगंधा-1: टिकाऊ खेती का स्मार्ट विकल्प!

औषधीय खेती में किसानों के लिए नई उम्मीद बनी ‘वल्लभ अश्वगंधा-1’

आईसीएआर द्वारा विकसित उन्नत किस्म से बढ़ेगी किसानों की आय, कम लागत में मिलेगा बेहतर पैदावार!

आनंद। बदलते कृषि परिदृश्य में औषधीय फसलों की खेती किसानों के लिए अतिरिक्त आय का मजबूत माध्यम बनकर उभर रही है। इसी दिशा में ICAR-Directorate of Medicinal and Aromatic Plants Research द्वारा विकसित ‘वल्लभ अश्वगंधा-1’ अश्वगंधा की एक उन्नत एवं व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त किस्म के रूप में किसानों के बीच तेजी से लोकप्रिय हो रही है। यह किस्म बेहतर उत्पादन, आसान पहचान और बाजार में बढ़ती मांग के कारण किसानों के लिए लाभकारी विकल्प साबित हो सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार आयुर्वेदिक दवाओं, हेल्थ सप्लीमेंट्स और वेलनेस उत्पादों में अश्वगंधा की मांग लगातार बढ़ रही है। घरेलू बाजार के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी हर्बल उत्पादों की लोकप्रियता बढ़ने से किसानों को औषधीय खेती में बेहतर अवसर मिल रहे हैं। ऐसे में ‘वल्लभ अश्वगंधा-1’ किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ आय का नया स्रोत प्रदान कर सकती है।

प्रति हेक्टेयर 589.4 किलोग्राम सूखी जड़ उत्पादन

इस किस्म की सबसे बड़ी विशेषता इसका उच्च सूखी जड़ उत्पादन है। ‘वल्लभ अश्वगंधा-1’ से औसतन 589.4 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर सूखी जड़ प्राप्त होती है, जिससे किसानों को अधिक आर्थिक लाभ मिलने की संभावना रहती है। अश्वगंधा की जड़ों का उपयोग प्रमुख रूप से आयुर्वेदिक औषधियों और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले उत्पादों में किया जाता है।

सौजन्य आईसीएआर

नारंगी रंग के फलों से आसान पहचान

यह किस्म खेत में अपने विशिष्ट नारंगी रंग के फलों (बेरीज) के कारण आसानी से पहचानी जा सकती है। इससे किसानों को किस्म की शुद्धता बनाए रखने और फसल प्रबंधन में सुविधा मिलती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यह किस्म स्वस्थ वृद्धि एवं स्थिर उत्पादन क्षमता के कारण व्यावसायिक खेती के लिए उपयुक्त मानी जा रही है।

इन राज्यों के लिए उपयुक्त

‘वल्लभ अश्वगंधा-1’ की खेती विशेष रूप से Gujarat, Rajasthan, Madhya Pradesh और Andhra Pradesh में खेती की जासकती है। इन राज्यों की जलवायु एवं मिट्टी इस फसल के बेहतर विकास और अधिक उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है।

कम लागत में टिकाऊ खेती का विकल्प

कृषि विशेषज्ञों के अनुसार अश्वगंधा की खेती पारंपरिक फसलों की तुलना में अपेक्षाकृत कम लागत और कम संसाधनों में की जा सकती है। यही कारण है कि यह फसल टिकाऊ कृषि प्रणाली को बढ़ावा देने में भी सहायक मानी जा रही है। जल संरक्षण और कम इनपुट आधारित खेती अपनाने वाले किसानों के लिए यह एक व्यवहारिक विकल्प बन सकती है।

औषधीय खेती से बढ़ेगा ग्रामीण रोजगार

जानकार मानते हैं कि औषधीय एवं सुगंधित पौधों की खेती ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और कृषि विविधीकरण को भी बढ़ावा दे सकती है। यदि किसानों को उचित प्रशिक्षण, गुणवत्ता बीज और बाजार उपलब्ध कराया जाए तो अश्वगंधा जैसी फसलें ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

स्वास्थ्य, समृद्धि और टिकाऊ भविष्य की ओर कदम

औषधीय खेती की बढ़ती संभावनाओं के बीच ‘वल्लभ अश्वगंधा-1’ किसानों के लिए स्वास्थ्य, समृद्धि और टिकाऊ कृषि भविष्य की दिशा में एक भरोसेमंद विकल्प के रूप में सामने आ रही है।

Source: icar